वातावरण का मनुष्य पर प्रभाव
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मनुष्य पारदर्शी काँच की तरह है। वह जिस तरह के रंग के संपर्क में आता है, उसी रंग का दीखने लगता है। परिस्थितियाँ उसे जहाँ भी जैसे भी वातावरण में रखती हैं वह उसी स्तर का बनता जाता है। जहाँ ऊंचा उठाने वाली परिस्थितियों में रहकर व्यक्ति समुन्नत बनता है, वहाँ निष्कृष्ट परिस्थितियाँ उसे निरन्तर गिराती चली जाती है और उस स्थिति तक पहुँचा देती है जहाँ उसे नर-पिशाच की संज्ञा दी जा सके।
अंग्रेजी काल में एक भेड़िया मानव मध्य प्रदेश में पकड़ा गया था। नागपुर से जबलपुर जाने वाली सड़क पर एक गाँव था -’सन्त बावड़ी’। उसके आस-पास चोरों ने बहुत आतंक मचा रखा था। आसपास के गाँव आतंकित हो उठे थे और राहगीरों ने लूट के भय से उस रास्ते आना जाना बन्द ही कर दिया था।
सरकार ने उसकी रोकथाम के लिए लेफ्टिनेंट कवरले की ड्यूटी लगाई। उन्हें चारों के अतिरिक्त एक और आतंक भी छाया मिला कि रात को घरों से मनुष्य गायब हो जाते हैं और वे फिर कभी नहीं मिलते। कौन करता है-बाघ, भेड़िया भूत, राक्षस, डाकू , तान्त्रिक ? जो हो घटनाएं इतनी घट चुकी थी कि उनका पता लगाना भी आवश्यक था। लेफ्टिनेंट ने उस जाँच-पड़ताल को भी अपने कार्यक्रम में सम्मिलित कर लिया।
अनेक गुम हुए व्यक्तियों और ले जाये जाते समय उनके शरीर से टपके हुए रक्त को देखकर यह अनुमान लगाया गया कि यह कार्य किसी भेड़िये का है। किन्तु पैरों के निशान बड़े विचित्र थे उसे देखकर भूत, राक्षस, तान्त्रिक आदि की बात वहाँ के ग्रामीण कहते थे। ध्यान से देखने से यह समझ में आया कि यह किसी घुटने और कोहनी के बल पर चलने वाले मनुष्य के निशान हैं। क्या कोई मनुष्य और भेड़िये का सम्मिश्रित प्राणी यह कार्य करता है ? पदचिह्नों की अधिक खोज करने पर इसी बात की अधिक पुष्टि हुई।
खोज तेजी से आरम्भ कर दी गई और इस कार्य में आदिवासियों, शिकारियों और कुत्तों की एक बड़ी संख्या सुनियोजित ढंग से खोज करने के लिए नियुक्त कर दी गई। अन्ततः पता चल ही गया। भेड़ियों की एक माँद में मनुष्यों की अधखाई लाशें पाई गई ओर उन्हें गोली से उड़ा दिया गया। आश्चर्य तब हुआ जब उसी माँद में एक मनुष्य युवक भी पाया गया, जिसका जीवन-क्रम पूर्णतया भेड़ियों जैसा था। उसे जीवित पकड़ लिया गया और कई दिन तक बाँधकर रखकर देखा गया कि यह इस स्थिति में कैसा आ गया।
कोई प्रामाणिक सबूत तो नहीं मिले, पर अनुमान लगाया गया कि किसी मादा भेड़िया ने उसे कहीं से चुराया होगा और अपना बच्चा न रहने पर थनों का दूध हलका करने के लिए उसे पाल लिया होगा । बड़ा होने पर वह अपनी अतिरिक्त बुद्धि के कारण भेड़ियों की, मनुष्य के शिकार में सहायता करने लगा होगा और उन्हीं जैसे जीवन का अभ्यस्त हो गया होगा।
कई दिन तक उस नर भेड़िये को जंजीरों से बाँध कर रखा गया। कौतूहल पूरा करने के लिए दूर-दूर से लोग उसे देखने आये। पर अब प्रश्न यह उत्पन्न हुआ कि इसका क्या किया जाय ? वह भेड़िये की आदतें छोड़कर मनुष्य स्वभाव अपनाने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। लेफ्टिनेंट से उसे ईसाई मिशनरियों ने माँगा और उन्हें वह दे भी दिया गया। उन्होंने उसे फिर मनुष्य की आदत में लौटाने के लिए भरपूर प्रयत्न किया किन्तु वे सफल नहीं हो सके। एक वर्ष के भीतर ही वह लड़का मर गया। रुडर्याड किपलिंग ने सम्भवतः इसी घटना-क्रम को अपना कल्पना आधार बनाकर ‘वृक मानव’ नामक एक कहानी भी लिखी।
एक सभ्य देश और सभ्य परिवार में उत्पन्न हुई असभ्य वातावरण और असभ्य लोगों के बीच लम्बे समय तक रहने के पश्चात किस प्रकार निकृष्ट स्तर की बन गई इसकी रोमाँचकारी कथा नीचे की पंक्तियों में पढ़ने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वातावरण का कितना अधिक प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है।
अफ्रीका का एक देश काँगो द्वितीय महायुद्ध से पहले बेल्जियम का उपनिवेश था। युद्ध के बाद मित्र राष्ट्रों की नीति के अनुसार काँगो को भी स्वतन्त्रता मिली। पर खोजे गये गोरों ने वहाँ गृह-युद्ध करा दिया और ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसमें उन्हें शान्ति स्थापित करने के बहाने वहाँ से पैर जमाने का अवसर मिल सके।
गृह-युद्ध रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपनी सेनाएं भेजीं और एक ऐसा प्रतिनिधि मण्डल भी जो आपस में लड़ने वाले कवाइली लोगों को समझा-बुझाकर शान्ति और प्रगति का मार्ग अपनाने के लिए रजामन्द कर सके। इस प्रतिनिधि मण्डल के नेता थे-स्वीडन के कप्तान नेल्स वोहेमन। उन्होंने सुदूर क्षेत्र में फैले हुए कवाइली सरदारों की बस्तियों में जाने और उन्हें समझाने का कार्य हाथ में ले लिया। दौरे में उन्हें भयंकर जंगलों में रहने वाले नर-भक्षी आदिवासियों की बस्तियों में जाना पड़ा। सो उनकी सुरक्षा का प्रबन्ध था, पर एक जगह वे बाक्कटू लोगों के नर-भक्षी कवीले की पकड़ में आ गये और अपहरण करके वहाँ पहुँचा दिये गये जहाँ वे लोग नरबलि देने का उत्सव मनाया करते थे।
नेल्स वोहेमन को भी बलिवेदी पर प्रस्तुत किया गया। वहाँ के भयंकर वातावरण को देखकर वे समझ गये कि अब उनका अन्त निकट आ गया। रस्सों से वे इस कदर जकड़े हुए थे कि बचने की कोई सम्भावना दिखाई नहीं पड़ रही थी । सबसे बड़ा आश्चर्य उन्हें इस बात से हुआ कि इन नरमेधों का सूत्र संचालन और नेतृत्व करने वाली देवी काले कबीलों में से नहीं वरन् एक गोरी यूरोपियन युवती थी। उस देवी का नाम था ‘रुआना’।
सहसा उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ कि सभ्य देशों में उत्पन्न हुई अंग्रेजी और फ्रेंच अच्छी तरह बोल सकने वाली यह युवती आखिर इस भयंकर जंगल में किस प्रकार आ पहुँची और ऐसे नृशंस कृत्य कराने का नेतृत्व कैसे करने लगी।
कप्तान ने साहस बटोरा और मरने से पूर्व कुछ बातचीत का सिलसिला बनाकर यह जानने का प्रयत्न किया कि वह कैसे यहाँ आई, कैसे यह सब करने लगी। उतर में रुआना ने बताया था, वह फ्रेंच कुमारी है। उसका असली नाम है-’जानेटीफेव्रे’। जब वह 14 वर्ष की थी तब अपने माता-पिता के साथ काँगो सैर के लिए आई थी। नाव उलट जाने से माता-पिता तो डूब गये, पर वह बेहोश स्थिति में नदी नट पर पड़ी थी। संयोगवश कितने ही काले साँप उसके शरीर से लिपट गये। नर-भक्षियों ने मूर्च्छित सुन्दरी पर काले नागों का लिपटा होना, उसे देवी प्रकट होना मान लिया और उसे पवित्र देवी तथा स्वामिनी बना लिया। उसे उनकी मर्जी पर चलना पड़ा और रीति-रिवाजों को अपनाना पड़ा। जान बचाने के लिए कोई रास्ता न था। आरम्भ में तो आयेदिन की नरबलि उसे अखरी पर पीछे उसका मन अभ्यस्त हो गया और उन कृत्यों में ही मजा आने लगा । अब उसे नर बलि एक मनोरंजक और उत्साहवर्धक प्रथा लगती है। यहाँ से भागकर अन्यत्र जाने का उसका मन भी नहीं होता, वह अपनी वर्तमान स्थिति से पूर्णतया सन्तुष्ट है।
इतनी वार्ता के बाद कप्तान को आशा थी कि राष्ट्रसंघ के प्रतिनिधि और सभ्य गोरे होने के नाम पर वे अपने प्राणों की भिक्षा माँग सकेंगे और किसी प्रकार छुटकारा पा सकेंगे। पर इसके लिए बहुत प्रयास करने पर भी वे सफल नहीं हो सके। रुआना का मन पूर्णतया दया विहीन हो चुका था।
कप्तान ने मृत्यु से छुटकारे का अन्तिम प्रयास किया और वे किसी प्रकार अपनी पिस्तौल संभालने और गोली चलाने में सफल हो गये। उन्होंने रुआना को मार डाला-कवाइलियों में भगदड़ मच गई और वे वहाँ से भागने में सफल हो गये।

