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Magazine - Year 1975 - Version 2

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प्रगति और परिवर्तन परस्पर अविभाज्य हैं।

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गति प्रकृति का अनिवार्य नियम है। इसी के आधार पर यह सारा संसार अपनी हलचलें जारी रख रहा है। पदार्थ की मूल इकाई द्रुतगति से दौड़ लगा रही है। पर वह क्रमबद्ध, व्यवस्थित और मर्यादित है। सूर्य परिवार जिसमें अपनी पृथ्वी भी सम्मिलित है किसी ध्रुव की ओर बढ़ रहा है। अणु से लेकर ब्रह्माण्ड तक पदार्थ की प्रत्येक इकाई सक्रिय है। जीवन न होते हुए भी क्रियाशीलता की दृष्टि से हर पदार्थ जीवित है। उसकी सुन्दरता, सामर्थ्य, उपयोगिता इसी कारण है। यदि हलचलें समाप्त हो जायें तो वस्तुएं इतनी भारी हो जायेंगी कि फिर एक तिनका उठाने के लिए भी आज की बड़ी क्रेनें अपर्याप्त सिद्ध होंगी।

जीवन गतिशील है। भ्रूण कक्ष में प्रवेश करने से लेकर मरण पर्यन्त प्राणी निरन्तर बढ़ता है। शारीरिक दृष्टि से भी और मानसिक दृष्टि से भी। आरम्भ में काया छोटी होती है फिर वह क्रमशः बढ़ती है। किशोरावस्था, यौवन, अधेड़, वृद्धता का विकासक्रम एक दिन वहाँ जा पहुँचता है जहाँ पुराना शरीर जीर्ण वस्त्र की तरह उतार फेंकना पड़ता है और नया धारण करने के लिए नया शिशु शरीर ग्रहण करना पड़ता है। मन का भी यह क्रम है। बच्चे की अपेक्षा किशोर का - किशोर की अपेक्षा तरुण का और तरुण जी अपेक्षा वृद्ध का मन कितनी केंचुल बदल चुका होता है। बच्चों की रुचि, आकाँक्षा और प्रसन्नता का तरुण के साथ कोई तालमेल नहीं।

वनस्पति वर्ग से लेकर प्राणी वर्ग तक सर्वत्र अपने अपने ढंग की हलचलें हो रही हैं। इस संदर्भ में जड़ और चेतन दोनों ही अपनी- अपनी पटरी पर अपनी अपनी गति से दौड़ रहे हैं। सभी के चरण प्रगति की दिशा में बढ़ रहे हैं। बादलों से लेकर नदियों तक सब का प्रवाह क्रम चल रहा है। जहाँ कहीं गति में अवरोध उत्पन्न होगा वहीं सड़न उत्पन्न होगी। तालाबों का पानी सड़ता है, पर झरने की पतली सी धारा भी अपनी स्वच्छता बनाये रहती है। शरीर के अवयव जिस क्षण अपनी गतिशीलता पर विराम लगाते हैं, उसी क्षण मरण सामने आ खड़ा होता है।

प्रगति के नियम को समझें, प्रकृति के सन्देश को सुनें और चलते हुए पवन से सीखें कि गतिशीलता की नीति अपनाये बिना किसी का गुजारा नहीं। जड़ता न अपनायें। पुरातन को जकड़ कर न बैठें। भूत अपने लिए अनेकों निष्कर्ष छोड़कर गया है उसके अनुभव भरे पृष्ठों से लाभ उठायें, पर दृष्टि भविष्य पर रखें। मुड़कर देखने से अनुभवों की संपदा तो बढ़ाई जा सकती है, पर उलटे पैरों दूर तक नहीं चला जा सकता है। आँखें आगे की ओर लगाई गई हैं, वे आगे ही देख सकती हैं। पंजों की बनावट आगे की ओर चल सकने योग्य है। यह संरचना बताती है कि जीवन की सार्थकता आगे की ओर देखने और आगे की ओर चलने में ही है। पिछली बातों को सोचते रहने और जो बीत चुका उसका भला - बुरा विश्लेषण करते रहने में ही समय गुजारना व्यर्थ है। जो चला गया वह अब कभी भी लौटकर आने वाला नहीं है। वास्ता तो भविष्य से पड़ना है इसलिए उसी के बारे में सोचें उसी की तैयारी करें यही बुद्धिमत्तापूर्ण है।

हर दिन, नई समस्याएं लेकर उदय होता है और वे समस्याएं नित नये समाधान माँगती हैं। खुला मस्तिष्क रखकर ही वे समाधान ढूंढ़े जा सकते हैं। आज की परिस्थिति आज है और वह आज के अनुरूप हल चाहती है। प्रस्तुत परिस्थितियों को ध्यान में रखकर हम भूतकालीन घटनाक्रमों के सहारे समाधान खोजेंगे तो भटक जायेंगे। बचपन की अनुभवों से युवावस्था में क्या काम चलेगा ? गतिशील जीवन-क्रम, चिन्तन के क्रम और क्रिया-कलापों में बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन चाहता है। सामयिक परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए चिन्तन में प्रगतिशीलता का समावेश किया ही जाना चाहिए।

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