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Magazine - Year 1975 - Version 2

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एकाँगी चिन्तन की भावुक आतुरता अहितकर

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चिंतन का एक भारी दोष, एक पक्षीय विचार करना है। हमें चाहिए कि हर कार्य के गुण-दोषों का उभय पक्षीय विचार करें और उसकी उपयोगिता-अनुपयोगिता पर समग्र विचार करने के उपरान्त किसी निर्णय पर पहुँचे।

प्रायः भावुकता एवं अत्युत्साह के आवेश में मनुष्य एक पक्षीय विचार क्षेत्र में इतना अधिक निमग्न हो जाता है कि दूसरा पक्ष सूझता ही नहीं और कुछ सोचा जा रहा था उसे ही उपयुक्त मान लिया जाता है। ऐसे मनुष्य अनुपयुक्त मान्यताएं बनाते हैं- अकारणीय कार्य करते हैं और पीछे जब वस्तुस्थिति सामने आती है तब अपने भूल का अनुभव करके पछताते हैं।

एकाँकी निर्णय एक प्रकार का अन्धापन है। स्वार्थान्ध, कामान्ध, क्रोधान्ध, मोहान्ध मनुष्यों को बौद्धिक दृष्टि से अपंग या असमर्थों की श्रेणी में गिना जाना चाहिए। उनमें समझ तो होती है, पर बुद्धि नहीं। बुद्धि का काम है गुण दोषों पर गम्भीर विवेचना करते हुए नीर-झीर विवेक की गहराई में उतरना-वास्तविकता, अवास्तविकता का विश्लेषण करना और तब किसी उपयुक्त निष्कर्ष पर पहुँचना।

कई बार अपनी भावुकता किसी पक्ष विशेष के समर्थन में इतनी अधिक प्रभावित हो जाती है कि मस्तिष्क में जमी हुई बात ही सर्वोत्तम या सर्वोपरि मालूम पड़ती है। उसमें लाभ ही लाभ दीखता है। अपनी मान्यता सर्वथा सत्य प्रतीत होती है। आवेश में यह दोष रहता है कि वह जिस भी भली-बुरी बात पर अड़ जाय उसी को सही और सर्वोत्तम मान लेता है। सोचने के लिए इतनी गुंजाइश रहती है नहीं कि विपरीत पक्ष, विरोधी तर्क या विकल्प पर भी विचार कर सके। हठी और दुराग्रही लोग अक्सर ऐसी ही आवेशग्रस्त भावुकता के शिकार होते हैं। वे बेईमानी से हठ नहीं करते उनकी मनःस्थिति की कुछ ऐसी विलक्षण होती है कि चिन्तन का जो प्रवाह मस्तिष्क में चल पड़ा है उससे भिन्न भी कुछ हो सकता है यह सोचने के लिए अवकाश ही नहीं रहता।

एक पक्षीय चिन्तन अधूरा और अनुपयुक्त होता है। उसमें गलत निर्णय करने- अवास्तविक निष्कर्ष पर पहुँचने ओर अवाँछनीय कार्य कर बैठने का पूरा-पूरा खतरा रहता है। यह एकाँगी चिन्तन कई बार ऐसी स्थिति में फंसा देता है जिसमें जीवन को नष्ट कर डालने जैसे जोखिम सामने आ खड़े होते हैं।

आतुर भावुकता सबसे अधिक ठगी का शिकार होती है। धूर्तों की चतुरता मनुष्य की इसी कमजोरी पर प्रहार करके उसे अपने चंगुल में फंसाती है। ’भेड़िये’ हिरन के बराबर नहीं दौड़ सकते पर उनमें यह चतुरता होती है कि एकाएक आक्रमण करके मुँह नोंचते हैं और उनकी आंखें फोड़ते हैं। अन्धा हिरन सहज ही उन भेड़ियों द्वारा दबोच लिया जाता है। शिकारी कुत्ते भी ऐसी ही धूर्तता करते हैं वे हिरन के अण्डकोषों को दाँतों से पकड़कर उन्हें आशक्त बना देते हैं और अपने से अधिक समर्थ होने पर भी शिकार करने में सफल होते हैं। ठगों का धन्धा यही होता है। वे अपनी दयनीय स्थिति बताकर भावुक लोगों की करुणा उभारते हैं और फिर उसकी हजामत उलटे उस्तरे से बनाते हैं। अनायास लाभ की मृग-मरीचिका में उलझा कर भी भोले लोगों को शिर मूंड़ा जाता है। वे आवेशग्रस्त मनःस्थिति में केवल एक पक्षीय बात सोचते हैं और ऐसे जाल में फंसते हैं कि जिसमें से निकलना बहुत भारी और कष्टसाध्य होता है।

संसार की धूर्तता से अपरिचित भावुक लड़कियाँ कामान्ध लोगों द्वारा वाग्-जाल में फंसा ली जाती है। जो कहा जा रहा है, जो आश्वासन जा रहे हैं वे आदि से अन्त तक फरेब हैं यह उन्हें विदित ही नहीं होता। कथनी और करनी में कुछ अन्तर भी हो सकता है, ऐसी आशंका जिन्हें नहीं रहती, वे भोली लड़कियाँ ऐसे जंजाल में फंस जाती है है फिर उनके भविष्य में अन्धकार के अतिरिक्त और कुछ शेष ही नहीं रहता। कुछ ही दिन में उन्हें पता चल जाता है कि उन्हें सिर्फ ठगा गया था। यह समझ जब आती है तब बहुत समय आगे बढ़ गया होता है और अपनी भूल पर पछताना ही हाथ रह जाता है।

बेशक दुनिया में सभी बुरे नहीं होते हैं- और विश्वास करके भी चलना पड़ता है पर किसी के भले-बुरे या विश्वस्त-अविश्वस्त होने की बात कड़ी कसौटी पर कसनी चाहिए और आग में तपाई जानी चाहिए। यदि यथार्थता असंदिग्ध दीखे तो ही विचार को कार्य का रूप देना चाहिए। दूसरों का सहयोग लेने या देने से पूर्व काफी शंकाशील रहने और तथ्यों का गहराई से पता लगाने की आवश्यकता है। यदि स्थिति संदिग्ध दिखाई पड़े तो सहयोग का आदान-प्रदान उतनी ही सीमा तक करना चाहिए, जिससे खतरे के बिन्दु तक न पहुँचा जाय।

कोई व्यक्ति न तो पूर्णतया बुरा है और न अच्छा। हर किसी में कुछ दोष पाये जाते हैं और कुछ गुण रहते हैं। जागरुकता का तकाजा यह है कि दोषों से बचते हुए उसके गुणों से ही लाभ उठाया जाय। किसी व्यक्ति को न तो पूरा देवता मान लेना चाहिए और न असुर। दोनों स्थितियों के समन्वय से जो कुछ बनता है उसी का नाम मनुष्य है। इसलिए उस पर न तो पूरी तरह अविश्वास किया जा सकता है और न विश्वास। इसी प्रकार किसी को सर्वथा उपयोगी या अनुपयोगी भी नहीं कहा जा सकता। हमें दूसरों से व्यवहार करते समय इस तथ्य को सतर्कतापूर्वक ध्यान में रखना चाहिए कि अमर्यादित निर्भरता के शिकार न बन जाय। गरम दूध से जलने का खतरा उन्हें कम ही उठाना पड़ता है जिनने छाछ को भी फूँककर पीना सीख लिया है। भावुकता के तूफान में फंसकर अपने अस्तित्व को संकट में डालने के खतरे से ऐसे विचारशील लोग सहज ही बच जाते हैं। ठगी के जाल में फंसकर वे अपनी उतनी हानि नहीं करते जितनी कि आतुर भावुकता से ग्रसित लोगों को उठानी पड़ती है।

न्यायाधीश दोनों पक्ष की बातें ध्यानपूर्वक सुनता है। वादी और प्रतिवादी पक्ष के वकील अपने समर्थन और दूसरे के विरोध में दलीलें प्रस्तुत करते हैं। दोनों के प्रतिपादनों में कितना औचित्य है, कितना अनौचित्य इसका विवेचन विश्लेषण न्यायाधीश की निष्पक्ष बुद्धि करती है। मंथन के बाद ही नवनीत निकलता है। समर्थन और विरोध में जितना कुछ सामने आवेगा सही निर्णय पर पहुँचने में उतनी ही सरलता रहेगी। विवेचन की गहराई में उतरे बिना तथ्यों के मोती हाथ नहीं आते।

हम आज जो सोचते हैं, जिसे सही समझते या समर्थन करते हैं, उसके प्रतिपक्ष को दलीलों को, सामने रखना चाहिए और तुलनात्मक विश्लेषण करके वस्तुस्थिति समझने का प्रयत्न करना चाहिए। यही सत्य तक पहुँचने का सही तरीका है। यदि एक पक्ष की बात ही पकड़े रहा जाय और दूसरे पक्ष की बात सुनने से इनकार किया जाता रहे तो फिर हम पक्षपाती और दुराग्रही ही कहे जाते रहेंगे। सत्य के साथ अपना दूर का भी रिश्ता न रहेगा। यद्यपि प्रतीत वह दुराग्रह भी सत्य जैसा ही होगा।

जिस वातावरण में हम रहते है- जिस वंश, कुल या धर्म में पैदा होते हैं स्वभावतः उसकी मान्यताएं एवं परिस्थितियाँ अभ्यास में आ जाती हैं और अनुकूल लगती हैं। उन्हें ही सत्य, तथ्य एवं उपयुक्त माना जाने लगता है। सहज चेतना उसी का समर्थन करती है और उसी को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए औंधे-सीधे तर्क एवं प्रमाण गढ़ कर खड़े करती है। जो उसी स्थिति से सन्तुष्ट हैं, वे एक पक्षीय चिन्तन के शिकार रहेंगे और यदि सत्य उन मान्यताओं से भिन्न पड़ता होगा तो उस सत्य को भी असत्य ठहराने में न चूकेंगे। इससे आत्मतुष्टि भले ही हो जाय सत्य की पुष्टि नहीं हो सकती। आवश्यक नहीं कि अपने अभ्यास या संपर्क की मान्यताएं ही सही हों। हो सकता कि वे भी उतनी ही असत्य हो जितना कि आज हम प्रतिपक्षी विचारों को अमान्य ठहराते हैं।

दुराग्रह में कितने ही खतरे हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है कि हर वर्ग इस मूढ़ता का शिकार होकर अपनी ही बात पर अड़ेगा और दूसरों को उसे ही मारने के लिए विवश करेगा। इससे विग्रह भी बढ़ेगा और विद्वेष भी। भूतकाल में एक धर्म मान्यता को दूसरे धर्म वालों पर लादने के लिए कितने अत्याचार, बलात्कार किये गये हैं, इसके रोमाँचकारी विवरणों को पढ़ने से समूची धर्म सत्ता से ही घृणा होने लगती है और यह सोचना पड़ता है कि जिस धर्म के लिए इतनी नृशंसता बरती जा सकती है उसे अपनाकर भला किस का क्या हित साधन हो सकता है ? वस्तुतः यह अत्याचार धर्म के लिए आग्रह एवं पक्षपात के उन्माद में किये गये थे। धर्म इतना विस्तृत है कि उसमें जितना अंश अपनी मान्यताओं में है उतना ही प्रतिपक्षी के धर्म में भी हो सकता है। मधुमक्खी की तरह सब धर्मों में से सारभूत तत्व लेकर ही हम समग्र धर्मों के निकट पहुँच सकते हैं। इसके लिए दूरदर्शी विवेक विकास करना होगा। अन्यथा पक्षपाती मान्यताएं ही यथार्थता का छद्मवेश धारक करके हमारी आँखों पर पर्दा डालती रहेगी और बुद्धि को झुठलाती रहेगी।

व्यक्तिगत जीवन के चिन्तन और कर्तव्य को यथार्थता की कसौटी पर कसना चाहिए और अपने गुण, कर्म, स्वभाव को- अभिरुचि एवं आकाँक्षा को सत्य के अधिकतम निकट पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिए। मूढ मान्यताओं से अपना मस्तिष्क घिरा हो सकता है और अपनी आदतों, अभिरुचियों एवं आकाँक्षाओं में गहरी अवाँछनीयता घुसी हो सकती है। इसे समीक्षात्मक बुद्धि से ही जाना परखा जा सकता है। अन्यथा हर मूर्खता और दृष्टता का भी समर्थन करने के लिए कुछ न कुछ तर्क मस्तिष्क में गढ़े ही जाते रहेंगे। हमारा व्यक्तित्व कभी भी परिष्कृत न हो सकेगा। निष्पक्ष समीक्षा ही हमें सत्य के निकट पहुँचाती है और उसी को अपनाकर हम कल्याणकारी आधारों को उपलब्ध करते हैं।

समाज में प्रचलित अनेकों मान्यताएं ऐसी है जिनकी आज की स्थिति में कोई उपयोगिता नहीं रही फिर भी वे धर्म, संस्कृति, दर्शन अथवा राजनीति के स्तर पर अपना अड्डा जन-मानस में जमाये बैठी है। पृथक-पृथक जातियों, धर्मों, संस्कृतियों राष्ट्रों भाषाओं का विभेद मानव जाति के लिए अभिशाप बनकर ही रह रहा है। इन विभेदों को एकता के - एकरूपता के स्तर पर विकसित करना पड़ेगा। विज्ञान ने दुनिया को छोटे से गाँव, मुहल्ले के रूप में समीप ला दिया है अब हम एक मानव जाति के रूप में-एक प्रकार के आचार-व्यवहार को-अपनाकर ही सुख शान्ति से रह-

रूस के उपन्यासकार और नोबेल पुरस्कार विजेता डा0 बोरिस पास्तरनाक ने अपनी पुस्तक ‘डाक्टर जिवागो’ में एक स्थान पर लिखा है -” जो लोग स्वतन्त्र नहीं होते हैं वे अपनी गुलामी को ही आदर्श बना लेते हैं।” इस तथ्य को हम अपने चारों ओर बिखरा देखते हैं। जिन्हें ज्ञान की राह मालूम नहीं उनके लिए अज्ञान ही आदर्श है। जो सत्य से दूर है उनके लिए असत्य ही आग्रह बन जाता है।

सकते हैं। इस संदर्भ में पूर्व मान्यताओं, परम्पराओं एवं आग्रहों को इस कसौटी पर कसना होगा कि उनमें समय के अनुरूप औचित्य कितनी मात्रा में शेष है। सत्य तथ्य एवं औचित्य को ध्यान में रखकर हमें अपनी विचारणा, रीति-नीति, समाज व्यवस्था अभिरुचि एवं मान्यताओं का नवीनीकरण करना होगा। यह तभी सम्भव है जब पूर्व पक्ष और उतर पक्ष के गुण, दोषों की निष्पक्ष समीक्षा की जा सके और उचित निष्कर्ष पर पहुँचा जा सके। इसके लिए हमें आतुर भावुकता, पक्षपात, एकाँगी चिन्तन को तिलांजलि देनी पड़ेगी। इस प्रयोजन को जितनी जल्दी पूरा कर सकें उतना ही व्यक्ति और समाज का कल्याण है।

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