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Magazine - Year 1975 - Version 2

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साहस हो तो साधन भी हो जाते हैं

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साधन होने पर मनुष्य साहसिक सफलताएं प्राप्त कर सकता है या अन्तःक्षेत्र में प्रचण्ड इच्छाशक्ति रहने पर अद्भुत कार्य कर सकने की क्षमता एवं सुविधा जुटा सकता है। इस प्रश्न का अनेकों बार समाधान हो चुका है। मनुष्य ने असम्भव समझे जाने वाले कार्य हाथ में लिए हैं और पूरे कर दिखाये हैं। साधन होते हुए भी कितने ही व्यक्ति कोई महत्वपूर्ण कदम उठा नहीं पाते, मात्र उन्हें शौक-मौज में गुजारते रहते हैं किन्तु यदि लगन हो तो नहीं केवल क्षमता विकसित होती है, पर साधन सामग्री भी जुटती है, सहायक मिलते हैं और ऐसे काम सम्भव हो जाते हैं, जिन्हें सामान्य बुद्धि से देवी चमत्कार ही कह सकते हैं।

अब दक्षिणी ध्रुव जानना उतना कठिन नहीं रहा वहाँ की परिस्थितियों के बारे में बहुत कुछ जाना जा चुका है और उस प्रदेश में कुछ समय ठहरना हो तो उसके लिए आवश्यक साधनों का निर्माण तथा ले जाने का प्रबन्ध बन गया है- पर पिछली शताब्दी में वैसा करना तो दूर कल्पना करना भी कठिन था।

बर्फ से जमा समुद्र, अपने तटीय क्षेत्र तक भी जलयानों को पहुँचने की छूट देने को तैयार नहीं था। बर्फ का समतल मैदान होता तो भी एक बात थी। विचित्र प्रकार की चट्टानें, खाई, खड्ड जैसे पहाड़, भयंकर दर्रे, डरावनी गुफाएं, जहाँ-तहाँ लटकते हुए बर्फ के बन्दनबार, घाटियाँ शान्त ज्वालामुखियों के गहरे कुओं जैसे विवर, हड्डियों को कड़वा देने वाली सर्दी यही है उस क्षेत्र की माटी जानकारी जिसे समीप से देखने वालों में मौत से जूझने वाला साहस होना चाहिए।

पर इससे क्या उस क्षेत्र की अधिक जानकारी प्राप्त करना आवश्यक समझा गया ? विस्तार की दृष्टि से दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र इतना बड़ा है जिसमें कई रूस और कई अमेरिका बसाये जा सकते हैं। वहाँ न जाने कितनी उपजाऊ जमीन ओर न जाने कितनी खनिज सम्पदा पाई जा सकती है। इस क्षेत्र पर अधिकार कर दे वहाँ की सम्पदा को हस्तगत करके एक नई दुनिया बसा सकने जितने आधार उपलब्ध हो सकते हैं। इतनी बड़ी सम्भावना को आँख से ओझल कैसे किया जा सकता है। किन्तु वह सरल भी तो नहीं है। इस प्रदेश की खोज इतनी बड़ी चुनौती है जिसे प्राण संकट का जोखिम उठाकर ही स्वीकार किया जा सकता है।

मनुष्य के दैत्य का कोई अन्त नहीं, वह डरपोक, कायर और स्वार्थी भी परले दर्जे का है किन्तु सदा ही वैसा नहीं होता, सभी वैसे नहीं होते। जिन्हें अपने मानवी पौरुष का सम्मान भरा बोध होता हे वे विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अनादिकाल से भयंकर खतरे उठाते रहे हैं। सो भी डरते, सहमते किसी प्रलोभन या भय के कारण नहीं स्वेच्छापूर्वक का अवलंबन लेकर ऐसे दुस्साहसों को वरण करते रहे हैं जिनमें लोकहित के साथ-साथ उन्हें प्रखर पुरुषार्थ के प्रकटीकरण का अवसर मिल सके।

दक्षिणी ध्रुव की खोज के विचार को कार्यान्वित करने की आवश्यकता ने एक मामूली से फिटर को एक अद्भुत आविष्कार करने का अवसर दिया। वह यह सोचता रहा कि बर्फ की मोटी सतह छेदकर समुद्र के गहरे जल में प्रवेश कर सकना और वहाँ की ठंडक को कम करके खोज के लायक तापमान उत्पन्न कर सकना कैसे सम्भव हो सकता है ? उस फिटर ने विज्ञान पढ़ा और समुद्र में पानी की ठंडी, गरम परतों के बारे में गहरा अध्ययन किया। इस जानकारी के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि बर्फ के नीचे ठंडा पानी और ठंडे पानी के नीचे गरम पानी की परतें हैं यही हाल आकाश में हवा का भी है। ठंडी गरम परतों के रूप में हवा भी ऊपर आकाश में फैली हुई हैं। समुद्र का भी यही हाल है। ऐसी दशा में यह सम्भव है कि नीचे के गरम पानी को ऊपर के ठंडे पानी के नीचे धकेलने का रास्ता बन सके तो दक्षिणी ध्रुव के समुद्र में गहरे गोते लगाये जा सकते और नीचे क्या कुछ भरा पड़ा है , इसका पता लगाया जा सकता है। ऊपर कई जगहें ऐसी हैं जहाँ सिर्फ 15 फुट मोटी बर्फ है उसमें छेद करके पानी में जाने का रास्ता बना लेना तो प्रस्तुत औजारों से ही हो सकता है। उसमें कुछ विशेष कठिनाई नहीं है।

आखिर इस प्रयोजन को सिद्ध करने वाली मशीन बना ही ली गई उसका नाम रखा गया ‘ऐकाथर्म’ इसका प्रयोग कई झीलों में और खुले समुद्रों में किया गया वह अपना प्रयोजन पूरा करने में समर्थ थी। इसे लेकर समुद्री गोताखोर जिमथार्न स्वयं इस क्षेत्र में पहुँचा। इसके लिए अमेरिकी जलसेना का एक जलयान एडिस्टोपर और एक हैलिकाप्टर प्राप्त कर लिया गया। आवश्यक उपकरण लेकर जो मंडली दक्षिणी ध्रुव से नई जानकारियाँ प्राप्त करने के लिए रवाना हुई उसमें ऐसे पाँच व्यक्ति थे जो शोधकार्य की आवश्यक योग्यता से सम्पन्न थे।

इन लोगों ने ध्रुव क्षेत्र की लम्बी यात्राएं कीं। बहुत कुछ ढूंढ़ा-खोजा और पाया। उसका विस्तृत विवरण देना यहाँ अशक्य और अनावश्यक है। हमें इतना जान लेना ही पर्याप्त है कि उन लोगों को पग-पग पर प्राण संकट सहने भरे काम करने पड़े। इन्हीं में एक कार्य सील मछली पर सवारी गाँठना भी शामिल था। ये खौफनाक विशालकाय मगर मच्छ कभी-कभी ध्रुवीय बर्फ में जहाँ-तहाँ पाये जाने वाले छेदों में होकर ऊपर उछल आती हैं और बर्फ पर धूप सेंकने का आनन्द लेती हैं। साधारण मनुष्य उनका नाम सुनते ही डर सकता है। पर जिमथार्न ने दौड़कर उनमें ऐ एक पर सवारी गाँठ ली और उस ऊंट की तरह बलबलाती मछली पर चढ़कर तब तक यात्रा की जब तक कि वह अपनी सुरंग के प्रवेश द्वार तक न पहुँच गई। ऐसे-ऐसे अनेक दृश्यों के चित्र और वहीं की परिस्थितियों के प्रमाण साधन ढूंढ़कर लाये जिनसे आगे चलकर उस क्षेत्र का सम्बन्ध में उन जानकारियों की शृंखला बन गई जो आगे चलकर समस्त मानव जाति की प्रगति के महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

मनुष्य पुरुषार्थ का पुतला है, उसकी शक्ति और सामर्थ्य का अन्त नहीं। वह बड़े से बड़े संकटों से लड़ सकता है और असम्भव के बीच सम्भव की अभिनव किरणें उत्पन्न कर सकता है शर्त यही है। कि वह अपने को समझे और अपनी सामर्थ्य को मूर्त रूप देने के लिए साहस को कार्यान्वित करे।

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