हमारी एक सम्पदा जिसका मूल्याँकन कभी किया ही नहीं
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संसार की शोभा, सुषमा, सरसता में पानी का योगदान है। पानी न रहे तो वनस्पतियाँ सूख जायं और प्यासे प्राणी जीवित न रह सकें। ठीक यही बात शरीर संसार की है, उसकी सारी गतिविधियाँ उस जीवन उस पर निर्भर हैं, जिसे हम रक्त के नाम से जानते हैं। मोटे तौर पर यह लाल रंग का पानी है जो नस नाड़ियों में ऐसे ही मन मौजी घुमक्कड़ की तरह घूमता फिरता रहा है। यदि बारीकी से देखा जाय तो किसी देश या नगर की जल व्यवस्था की तरह रक्तसंचार प्रक्रिया भी अनेकानेक गुत्थियों को सुलझाती हुई व्यवधानों का निराकरण करती हुई ही गतिशील हो रही हैं। उसकी गतिविधियाँ देखकर आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है।
सारे शरीर में रक्त की एक परिक्रमा प्रायः डेढ़ मिनट में पूरी हो जाती है। हृदय और फेफड़े के बीच की दूरी पार करने में उसे मात्र 6 सेकेंड लगते हैं, जब कि उसे मस्तिष्क तक रक्त पहुँचने में 8 सेकेंड लग जाते हैं। रक्त प्रवाह रुक जाने पर हृदय भी 5 मिनट जी लेता है, पर मस्तिष्क तीन मिनट में ही बुझ जाता है। हृदय फेल होने की मृत्युओं में प्रधान कारण धमनियों से रक्त की सप्लाई रुक जाना ही होता है। औसत दर्जे के मनुष्य शरीर में पाँच से छः लीटर तक खून रहता है। इसमें 5 लीटर तो निरन्तर गतिशील रहता है। और एक लीटर आपत्ति कालीन आवश्यकता के लिए सुरक्षित रहता है। 24 घण्टे में हृदय 13 हजार लीटर खून का आयात निर्यात करना पड़ता है। 10 वर्ष में इतना खून फेंका समेटा जाता है जिसे यदि एक बारगी इकट्ठा कर लिया जाय तो उसे 400 फुट घेरे की 80 मंजिली टंकी में ही भरा जा सकेगा। इतना श्रम यदि एक बार ही करना पड़े तो उसमें इतनी शक्ति लगानी पड़ेगी जितनी कि दस टन बोझ जमीन से 50 हजार फुट उठा ले जाने में लगानी पड़ेगी। शरीर में जो तापमान रहता है, उसका कारण रक्त प्रवाह के कारण उत्पन्न होने वाली ऊष्मा ही है।
अपने चार वर्ण और चार आश्रमों की तरह रक्त के भी चार वर्ण हैं। भगवान मनु ने मनुष्य जीवन की क्रम व्यवस्था इन चार भागों में की थी। लेण्ड स्टीनर ने रक्त की चार श्रेणियों का रहस्योद्घाटन किया था। सब मनुष्यों का रक्त एक जैसा नहीं होता, इनके बीच कुछ रासायनिक भिन्नता रहती है। इसकी को ध्यान में रखते हुए उसे (1) ए॰ (2) बी॰ (3) ए॰ बी॰ (4) ओ॰ इन चार नामों से वर्गीकरण किया है। किसी की नसों में किसी का रक्त चढ़ाने से पहले यह विधि वर्ग मिला लिया जाता है अन्यथा भिन्न रक्त चढ़ा देने से रोगी भयंकर विपत्ति में फँस जायगा और मृत्यु संकट सामने आ खड़ा होगा।
हमारा रक्त लाल रंग का एक गाढ़ा तरल पदार्थ है जो हवा लगने पर जम जाता है उसे दो भागों में विभक्त कर सकते हैं। (1) तरल पदार्थ-प्लाज्मा (2) ठोस कण-सारतत्व। प्लाज्मा रक्त में 55 प्रतिशत होता है, इसे भूरे, पीले रंग के पानी जैसी शकल में देखा जा सकता है। उसमें नमक, ग्लूकोज, प्रोटीन आदि घुले रहते हैं। कुछ ठोस पदार्थ उसमें घुल नहीं पाते और तैरते रहते हैं। इन ठोस कणों को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं (1) एरिथ्रोसाइट खून के लाल कण (2) ज्यूकोसाइट-खून के सफेद कण (3) प्लेट-लेट-खून की पपड़ियाँ।
लाल कण शरीर के प्रत्येक अंश,-तंतु और कोप को आहार एवं आक्सीजन पहुँचाते हैं। मूल रूप निकली कार्बनडाइ आक्साइड गैस को ढोकर फेफड़ों तक ले जाते हैं, ताकि वहाँ से साँस द्वारा उसे बाहर निकाला जा सके।
सफेद कण वस्तुतः कोषाणु हैं। उनकी संख्या कम ही होती हैं। 650 लाल कणों के पीछे एक। इन्हें शत्रु रोगाणुओं से लड़ने वाले सैनिक कहा जा सकता है। शरीर के किसी भाग में यदि रोग कीट हमला करदें तो यह श्वेत कण उनसे लड़ने को तत्काल जा पहुँचते हैं। आवश्यकता के समय अपनी जाति वृद्धि कर लेने की उनमें अद्भुत क्षमता है।
रोगों के कीटाणु हवा, पानी, आहार, छूत या चोट आदि के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। वे इतने भयंकर होते हैं कि देखते-देखते सारे शरीर पर कब्जा कर सकते हैं और किसी को भी रोग ग्रस्त करके मौत के मुँह में धकेल सकते हैं। ईश्वर को लाख धन्यवाद है कि इस रोग कीटाणुओं से भरे शत्रुओं के चक्रव्यूह में आत्मरक्षा करने के लिए हमें श्वेत कणों की सुदृढ़ सेना दी है। यदि यह न मिली होती तो पग-पग पर मृत्यु संकट सामने खड़ा रहता।
श्वेत कोषाणु रोग कीटाणुओं से अधिक प्रबल होते हैं और वे शत्रुओं को मार-काट कर धराशायी करने में प्रायः सफल ही रहते हैं। इस युद्ध में उनमें से भी बहुतों को शहीद होना पड़ता है। मृत श्वेत कणों के ढेर को सफेद पीव के रूप में देखा जा सकता है।, वह चमड़ी तोड़कर बाहर निकलता है। अपनी विशेषताओं के आधार पर उन श्वेत कणों की भी कई जातियाँ हैं यथा-न्यूट्रोफिल, ईओसिनोफिल, वेसोफिल, लिम्फोसाइट, मोनोसाइट आदि। इनकी आवश्यकता से अधिक बढ़ जाना या घट जाना भी चिन्ता का विषय है इनकी असाधारण वृद्धि ‘ल्यूकोसाइटोसिस’ और कभी ‘ल्यूकोपेनिया’ कहलाती हैं।
साधारणतया प्रति घन मिली मीटर रक्त में 5 से 10 हजार तक श्वेत कण होते हैं। पर कभी-कभी यह संख्या बढ़ कर ढाई लाख तक जा पहुँचती है तब यह वृद्धि आत्मघाती सिद्धि होती है। कैंसर की संभावना बढ़ जाती है।
रक्त रस-प्लाज्मा में 90 प्रतिशत जल और 10 प्रतिशत में चर्बी, हारमोन, नाइट्रोजन, आक्सीजन, कार्बनडाइ आक्साइड आदि पदार्थ मिले होते हैं। इस हल्के पीले रंग के तरल पदार्थ में लाल और श्वेत रक्त कणिकाएँ तथा विम्बाणु तैरा करते हैं। लाल रक्त कण इतने छोटे होते हैं। कि वे 3000 की संख्या में सीधे एक लाइन में रख दिये जायँ तो एक इंच से भी कम लम्बाई होगी। युवा मनुष्य के शरीर में 25,000,000,000,000 लाल रक्त कण होते हैं वे चार महीने जीवित रहकर मर जाते हैं और उनका स्थान लेने के लिए नये पैदा हो जाते हैं।
रक्त की चाल धमनियों में प्रति घण्टा 65 कि0 मी0 की है। रक्त कणिकाएँ लौह ओर आक्सीजन से मिलकर बने पदार्थ होमोग्लोबिन अपने साथ प्रोटीन, प्राण वायु आदि अपने पोषक पदार्थ अपने ऊपर लाद कर चलता है और उस खुराक को शरीर के कण-कण तक पहुँचाता है। उसे दुहरा काम करना पड़ता है। इधर से उपयोगी पदार्थों का पहुँचाना, उधर से कार्बनडाइ आक्साइड तथा दूसरी हानिकारक गन्दगियों को समेट कर फेफड़े द्वारा बाहर निकाल दिये जाने के लिए उन तक पहुँचाना यह दुहरी ढुलाई उसे करनी पड़ती है। अपने काम को रक्त द्रुत गति से करता है। पोषण पहुँचाने तथा गन्दगी साफ करने के रसोई महाराज और सफाई जमादार की दुहरी ड्यूटी देने में उसे कोई आपत्ति नहीं होती।
लाल रक्त कणिकाएँ प्रायः 4 महीने में लगभग 1500 चक्कर सारे शरीर के लगा देने के बाद बूढ़ी होकर मर जाती हैं। तिल्ली के जिम्मे उनका अंत्येष्टि संस्कार करना और लाश को तोड़-फोड़ कर मलद्वारों से बाहर निकालने की व्यवस्था उसी को जुटानी पड़ती है। हमारा छोटा सा शरीर वस्तुतः बहुत बड़ा है। एक पूरी पृथ्वी के बराबर जीवधारी उसमें रहते हैं। इसलिए उसके व्यवस्था कर्मचारियों की संख्या भी लगभग उसी अनुपात से रहती है। इन 2500 करोड़ लाल रक्त कणों को यदि एक सीधी पंक्ति में सटाकर बिठा दिया जाय तो इतना छोटा आकार रहते हुए भी वे इतनी बड़ी लाइन में होंगे जो समस्त पृथ्वी की चार बार परिक्रमा कर सकें।
ऊपर कहा जा चुका है कि रक्त में तीन जाति के कण रहते हैं। लाल रक्त कणों की चर्चा हो चुकी है। अब शेष कर्मचारियों में 1 करोड़ 20 लाख श्वेत रक्ताणु और 50 लाख लाल रक्त विम्बाणु और रहते हैं। एक बूँद खून में प्रायः 11 हजार श्वेत कण होते हैं। इन का मुख्य कार्य शरीर में बाहर से प्रवेश करने वाले अथवा भीतर से ही पैदा होने वाले रोग कीटाणुओं से लड़कर उन्हें परास्त करना और उनके मृत शरीरों को देह से बाहर निकाल देना होता है। बीमारियाँ तभी प्रकट होती हैं जब ये श्वेत कण रोगाणुओं से हारते हैं। अन्यथा हमें पता भी नहीं चलता है और रोग निवारण का अधिकाँश कार्य इन श्वेत कणों द्वारा भीतर ही भीतर निपटा दिया जाता है। बाहरी रक्त शरीर में प्रवेश कराया जाय या किसी दूसरे व्यक्ति का कोई अंग किसी की देह में आरोपित कराया जाये तो यह श्वेत कणिकाएं ‘बाहरी पदार्थ के विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर देती हैं और लेने के देने पड़ जाते हैं। यही कारण है कि डाक्टर लोग किसी रोगी को वही रक्त चढ़ाते हैं जो उसके अपने रक्त का सजातीय हो। अंगों का आरोपण करते समय इन श्वेत कणों को मूर्छित करने की औषधियाँ देकर चुप कर दिया जाता है।
तीसरे किस्म के रक्त विम्बाणु कभी चोट आदि लगने पर बाहर बहते हुए रक्त को जमाने की भूमिका सम्पादित करते हैं। यह न हो तो आघात लगने पर रक्त बाहर बहता ही रहे और उसके न रुकने पर मृत्यु हो जाय। एक बूँद खून में इनकी संख्या 3 लाख के करीब होती है और प्रायः 10 घण्टे ही जीवित रहते हैं।
यदि रक्त में लाल कण कम पड़ जायें या होमोग्लोबिन की मात्रा घट जाये तो ‘एनीमिया’ रोग हो जाता है, शरीर थका-थका सा रहता है और सिर चकराता है।
रक्त के अभाव में हृदय तो पाँच मिनट भी अपना काम चला लेता है, पर मस्तिष्क तीन मिनट में ही निर्जीव हो जाता है।
बांई पसलियों में 9 वीं 10 वीं और 11 वीं के नीचे आमाशय के पीछे तिल्ली का स्थान है यह लाल बैंगनी रंग की है। इसमें रक्त एकत्रित रहता है। उसकी 12 सेन्टीमीटर लम्बाई तथा 7 सेन्टीमीटर चौड़ाई होती है। वजन 150 से 200 ग्राम तक। इसमें रक्त को एकत्रित करने और निकालने की विशिष्ट क्षमता है।
पुराने जर्जर लाल रक्त कण अक्सर इसी में समाधिस्थ होते रहते हैं। गर्भावस्था में उसे रक्त बनाने के एक विशेष कारखाने का काम करना पड़ता है। किसी दुर्घटना के समय रक्त अधिक निकल जाये अथवा मज्जा में कोई दोष उत्पन्न हो जाये तो तिल्ली को उस आपत्ति काल में विशेष कार्य करना पड़ता है और उस क्षति की पूर्ति वहीं से हो जाती है।
बाहरी रोग कीटाणुओं के आक्रमण से शरीर की रक्षा करना तिल्ली का मुख्य कार्य है। तपैदिक, टाइफ़ाइड, सिफलिस, कालाजार, मलेरिया आदि रोगों के विषाणुओं से लड़ने वाली फौज विशेषतया तिल्ली में ही तैयार होती है तब उसका वजन भी बढ़ जाता है। रक्त कैंसर - ल्यूकीमिया - में तो तिल्ली 20 गुना तक बढ़ जाती है और एक प्रकार से सारे पेट पर ही कब्जा कर लेती है।
रक्त संचार की दुनिया कितनी महत्वपूर्ण और कितनी सुव्यवस्थित है, फिर भी हम उसे देख समझ नहीं पाते और न रक्त शुद्धि के उपयुक्त रीति-नीति अपना कर परिपुष्ट सुविकसित दीर्घजीवन जी पाते हैं। अकेली रक्त सम्पदा के सम्बन्ध में ही क्या जीवन वैभव के साथ जुड़ी हुई अगणित विकृतियों के सम्बन्ध में हमारी अज्ञानता और उपेक्षा अत्यधिक गहरी है, इसी आत्म विस्मृति ने तो हमें हर क्षेत्र में दीन दयनीय बना रखा है।

