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Magazine - Year 1975 - Version 2

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श्रमयोग की साधना

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सृष्टि के साथ “श्रम” की भी रचना प्रजापति ने की है। सृष्टि रचना के समय-

“सहयज्ञा प्रणाँ सृष्टवा पुरोवाच प्रजापति”

प्रजापति ब्रह्म ने यज्ञायोजनों की व्यवस्था के निमित्त मनुष्य मात्र को “कर्म” करते रहने अर्थात् “श्रम” शील बने रहने का ही अनुदेश दिया था। “यज्ञ” और कुछ नहीं, वरन् हमारे शुभ कर्म ही हैं व शुभ कर्म श्रम के ही पर्याय हैं इससे “श्रम” का स्थान सृष्टि के अस्तित्व के लिए एक अनिवार्य तत्व के रूप में है।

मनुष्य शरीर ही एक ऐसा शरीर है जिसमें कार्य करने की अद्भुत क्षमता प्रभु ने दी है। ‘कुछ जीवों यथा-साँप , हाथी, कछुआ, कौआ आदि को छोड़कर मनुष्य सबसे अधिक दीर्घजीवी प्राणी है। औसतन 100 वर्ष की हमारी आयु होती है, इतनी बड़ी आयु के साथ ही देवी उपहार की तरह उसे श्रम करने की क्षमता की अद्भुत मिली है। एक मनुष्य 24 घण्टों में 8 घण्टे आराम आदि के बाद 16 घण्टे काम करता रहता है इसमें 8 घण्टे तो आजीविकोपार्जन की दृष्टि से व शेष 8 घण्टे व्यक्तिगत व पारिवारिक कामों में लगाता है। इस प्रकार अन्य प्राणियों की तुलना में दुगुना श्रम करने की क्षमता उसमें निहित है।

यह इतना सारा चमत्कार ‘श्रम’ का तो है परन्तु मात्र ‘श्रम’ तो गधे, घोड़े, बैल, मजदूर भी करते हैं परन्तु उनमें ‘मन’ व ‘योग’ नहीं होता वे मात्र यन्त्रवत् अपना श्रम करते रहते हैं अतः उनके श्रम को इस श्रम से भिन्न करना होगा। मानव द्वारा जो ‘श्रम’ किया जाता है व उसमें जो मानव मस्तिष्क लगता है, उस श्रम को हम इस प्रगति का श्रेय देते हैं। ‘श्रम’ में मन-मस्तिष्क के ‘योग’ को ही ‘श्रमयोग’ कहा जा सकता है।

मन-मस्तिष्क के चमत्कारी संस्थान की महिमा तो अवर्णनीय है। इसकी रचना ऐसी बुद्धिमता के साथ हुई है कि जिस ओर भी मनोयोग लगा दिया जाय उधर ही चमत्कार होने लगता है। संसार में जो अनेकों विवित्रताएं, विलक्षणताएं एवं विशेषताएं लक्षित हैं उनके मूल में मानवीय आकाँक्षा अभिरुचि एवं तत्परता ही काम करती है। मानव मन के इस मनोयोग पूर्ण श्रम का ही यह प्रतिफल हम देख रहे हैं कि प्रकृति की अनेकानेक शक्तियाँ यथा अग्नि, जल, वायु विद्युत अणु आदि मनुष्य ने अपने अधीन कर ली है कि मनुष्य को इस सृष्टि का स्वामी ही मानते को बाध्य होना पड़ता है। अब तक की हुई प्रगति व आगे की संभावनाओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है, मानवीय मस्तिष्क तक जीता जागता जादू है। जादूगर भी अपने मनोयोग से व अपनी कला से चमत्कार दिखाता है जिससे ऐसा लगने लगता है कि उसका काम जादू है परन्तु वास्तव में वह है उसकी जीवन कला उसका मनोयोग व श्रम।

हर तरह का श्रमयोग नहीं है हमें ‘श्रम’ में मानव मन को नियोजित रखते हुए पूर्ण तल्लीनता, उत्साह व पूरे मनोयोग से अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए उद्योग करना होगा तभी तो वह श्रम, श्रमयोग की श्रेणी में आ सकेगा। अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए अपने मन, बुद्धि एवं शक्ति को तथा समस्त चित-वृत्तियों को एक ही ओर लगा देने से जो कर्म होगा वह ‘कर्मयोग’ हुआ व इस कर्म में श्रम जुड़ा हुआ रहा तो व श्रमयोग हुआ। मनुष्य के लिए पूरे मनोयोग से कर्म अथवा श्रम करना ही भगवान से पूजा माना है। “योगः कर्मसु कौशलम्” में भगवान ने श्रमयोग की ओर की संकेत किया है कि हम अपने लिए निर्धारित कार्य अपने पूरे मनोयोग से करते जायं तो यही पूजा है, यही योग है।

एक किसान जो दिन भर गर्मी-सर्दी में अपने खेत पर श्रम करता है, एक मजदूर जो कारखाने में अपने पूर मन व मस्तिष्क से काम करता है, एक वैज्ञानिक जो अपनी प्रयोगशाला में अपने मन व मस्तिष्क को श्रम में नियोजित करता है वह सब श्रमयोग है, कर्मयोग है, भगवान की पूजा है, उपासना है। सृष्टि संचालन, शरीर संचालन के लिए यह श्रमयोग इतना अनिवार्य तत्व है।

भगवान भुवन भास्कर अपने श्रम व कर्म में तनिक देरी कर दें, ढिलाई कर दें तो अनर्थ हो जाय, थोड़ी देर के लिए बिजली चली जाय तो जन-जीवन ठप्प हों जाय अतः प्रत्येक मनुष्य यदि आलस्य या प्रमादवश क्षणभर को कर्म विमुख हो श्रम से जी चुराले तो पूरी व्यवस्था बिगड़ने का डर रहता है। इस सृष्टि का हर जीवधारी इसका एक आवश्यक अंग है चाहे छोटा हो या बड़ा हम सब घड़ी के पुर्जे है यदि एक छोटे से पुर्जे ने भी काम करना बन्द कर दिया तो पूरी घड़ी बन्द हो जाती है।

इधर कुछ समय से ‘श्रम’ की गरिमा की अवहेलना सी हो रही है। ‘श्रम’ में ‘शरम’ महसूस होती है परन्तु ऐसा आलस्य, प्रमाद सा अज्ञान अधिक घर करता गया तो हमारी प्रगति अवरुद्ध होना निश्चित है। आलस्य की बढ़ती हुई प्रवृत्ति व श्रम से जी चुराने की आदत हमें ऐसी स्थिति में ले जावेंगी जहाँ जीवन जीना भी कठिन होगा। प्रगति की किसी भी दिशा में अग्रसर होने के लिए सबसे पहला साधन ‘श्रम’ ही है। जो जितना परिश्रमी होगा, उतना ही उन्नतिशील होगा। आलस्य व प्रमाद हमारे जीवन सूर्य के लिए राहू-केतु की तरह ‘ग्रहण’ है। इस ग्रहण की छाया मात्र से हमारा जीवन अंधकारमय ही जावेगा; अतः हमें श्रम के प्रति जागरुकता का भाव लिए आलस्य-प्रमाद से संघर्ष कर उन्हें दूर ही रखना होगा।

चलते रहना-श्रम की ओर गतिशील हो ना ही प्रगति है। बैठे रहना तो अवनति के गर्त में गिरना है। हमारी सफलता किसी मन्त्र, जाप का प्रतिफल, किसी देय की पूजा का प्रसाद व किसी भगवान् का अनुग्रह नहीं, वरन् हमारी कर्मठता, श्रमशीलता व हमारा मनोयोग ही है। हमारी भुजाओं में रहने वाला श्रमदेव व हमारे मन मस्तिष्क में रहने वाला हमारा विवेक ये दो ही देव ऐसे हैं कि इसकी आराधना से सारी समृद्धियां सुलभ हो जाती है। श्रम के देवता ने किसी को निराश नहीं किया है। श्रम व मनोयोग के इन दो देवताओं की पूजा व्यर्थ नहीं जाती। हम इन दो देवताओं को पूजे व दो असुरों आलस्य व प्रमाद जो राहू-केतु हैं- को दूर रखें तो हमें अपने कर्म में सफलता अवश्य मिलेगी।

हमें जीवन विकास के मूल तत्वों की ओर ही अपने को केन्द्रित करना होगा। ईश्वर के दिये शरीर और मन को हम सुव्यवस्थित रूप में ऐसा नियोजित करें कि निरन्तर श्रम व कर्म होता रहे व एक क्षण का समय ही व्यर्थ न जाय, जो श्रम हम करें वह भी ऐसा हो कि श्रम भी निष्फल न जाय, व्यर्थ न जाय। मनोयोग पूर्वक रुचि से जो भी श्रम करें ऐसा करें कि उससे एक निराली ही छटा बिखरे। सजीव ‘श्रम’ चाहे छोटे प्रकार का ही क्यों न हो वह श्रमिक के व्यक्तित्व व गौरव को बढ़ाने वाला होता है। सफलता की सीढ़ी चढ़ने में जो सफल हुए हैं उनका यही तरीका था, हम भी परिश्रमी बने, काम को रुचिपूर्वक मन लगाकर बिना आलस्य, प्रमाद के एक भी क्षण गंवाए- करें कि हमारा ”श्रम”-”योग” बन जाय तो अष्टसिद्धि नवनिधियाँ हमारा भी वरण करेगी। आलस्य व प्रमाद में समय गंवाने वालों पर कृपा होगी राहू-केतू की। श्रम योगियों पर कृपा होगी-सफलता की उत्कर्ष की कारण कि जहाँ भगवान् कृष्ण के रूप में “मनोयोग” है-जहाँ अर्जुन के रूप में “श्रम” है, जहाँ अर्जुन व कृष्ण के विचारों में साम्य है, जहाँ कृष्ण सम्मत अर्जुन है-जहाँ कर्तव्य कर्म में, सत्कर्म में सद्भाव सम्पन्न मनोयोगमय श्रम अर्थात् श्रमयोग है, वहीं विजय है, वही सफलता है, वही भगवान् हैं।

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