बड़ा इंसान (kavita)
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फूलों के संग तो सब ही मुस्का लेते हैं-
कांटों के संग हंसे- बड़ा इन्सान वही है।।
तट पर लहरों से सब ही खेला करते हैं-
बड़ा मजा आता है, किल्लोलें करने में।।
पर वह क्या जाने, कितनी मेहनत पड़ती है-
डाड़ चलाते हुए थपेड़ों को सहने में।।
किये बिना परवाह-अतल गहराई की जो-
पहुंचाये उस पार सही जलयान वही है।।
बौरायी-सी गंध, बड़ी मादक लगती है-
बैठ सभी लेते हैं, शीतल अमराई में।।
पर बसंत में याद जिन्हें पतझर रहता हो-
ऐसे अलि कितने होते हैं तरुणाई में।।
सूखी डालों को भी सींचे और सरसाये-
हर मौसम सह ले, अच्छा उद्यान वही है।।
जीवन पथ पर मिलते नित्य सैकड़ों राही-
दो क्षण संग रहते, फिर सभी बिछड़ जाते हैं।।
सच कहना? कितने होते हैं ऐसे सहचर-
संवेदनमय- स्नेह सने, जिनके नाते हैं।।
दुख में छोड़े नहीं- न सुख में करे ईर्ष्या-
साथ अन्त तक दे- सच्ची पहचान वही है।।
दिन गुजारते हंसी-खुशी के सब हंस-हंसकर-
रंगरलियों में हो जाते मदहोश सभी हैं।।
तब आते कब याद निराशा, कष्ट उदासी-
विपदाओं की आशंका होती न कभी है।।
संघर्षों, कष्टों को भी मुस्का कर झेले-
सच पूछे कोई- तो, व्यक्ति महान् वही है।।
कांटों के संग हंसे- बड़ा इन्सान वही है।।
-माया वर्मा
*समाप्त*

