Back to Books
Cover image of Version 2

Version 2

Format TEXT Language HINDI
TEXT SCAN
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download Hindi or the required language voice data for the best listening experience.

Reading: मुक्ति-सन्देश (Kavita) · Page 51

मुक्ति-सन्देश (Kavita)

शाँति और संतोष छोड़, मृग तृष्णा मत पालो। बनू मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥1॥

परम पिता ने स्वतंत्रता से युक्त किया तुम को। जननी ने दे जन्म, धर्म से मुक्त किया तुमको॥

हो बंधन से मुक्त, गले में फंदे मत डालो। बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥2॥

साँसों की निर्मल सरिता को गंदी नहीं करो। लोभ, मोह के छल-छिन्दों में बंदी नहीं करो॥

मुक्त धरा पर, मुक्त गगन में, मुक्ति गान गालो॥ बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥3॥

बढ़ा महत्वाकाँक्षाएँ, मत नींद हराम करो। सादा जीवन-उच्च विचारों को आयाम करो॥

सादा रह लो, सादा पहनो, सादा ही खालो। बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥4॥

तृष्णाएँ उंगलियाँ पकड़कर, पोंचा पकड़ेंगी। जितनी छूट मिलेगी उनकों, उतना जकड़ेंगी॥

इन पर अंकुश रख कर, भावी-विपदाएँ टालो। बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥5॥

शक्ति और क्षमताएँ, अपने लिये नहीं केवल। कई अशक्त, अभाव ग्रसित हैं, उनकों दें संबल॥

जीवन-अर्घ्य लोक मंगल की प्रतिमा पर ढालो। बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥6॥

ख्

‘साधन-धाम’ मोक्षकर द्वारा जेल न बन जाये॥ सुर दुर्लभ-सम्पदा, स्वार्थ का खेल न बन जाये॥

शोषित, पीड़ित, दीन जनों को भी देखो भालों। बुन मकड़ी सा जाल, स्वयं को कैद न कर डालो॥7॥

मंगल विजय

*समाप्त*