
आत्मोत्कर्ष के लिए किया गया संतुलित पुरुषार्थ
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गाड़ी दो पहियों के सहारे चलती है उनमें से एक गड़बड़ा जाय तो समझना चाहिए कि गतिरोध खड़ा हो गया और आगे चल सकने की बात समाप्त हुई। जीवन के सम्बन्ध में भी ठीक यही बात है। शरीर और प्राण इस जीवन रथ के दो साझीदार हैं जब तक दोनों भागीदार अपना-अपना कर्त्तव्य पालन करते हैं और एक दूसरे के हितों का पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं। जब एक भागीदार अनुचित लाभ उठाने लगता है और दूसरे को अभावग्रस्त स्थिति में रहना पड़ता है, पल्ले कुछ नहीं पड़ता और घाटा जेब से चुकाना पड़ता है तो समझना चाहिए कि अनीति का समावेश हो चला और यह व्यवसाय देर तक नफे में न चल सकेगा।
हम शरीरगत सुविधाओं के निमित्त बहुत कुछ करते हैं। बहुत कुछ क्यों यों कहना चाहिए कि सब कुछ करते हैं। प्रातः उठने से लेकर रात को सोते तक का समय पूरी तरह शरीरचर्या में ही लग जाता है। उठते ही नित्यकर्म, जलपान, सज्जा, शृंगार, पेट भरने के लिए आजीविका उपार्जन। शाम को थके माँदे लौटना, सायंकाल का नित्यकर्म, हँसी विनोद। इसके बाद गहरी नींद आ जाती है और दूसरे दिन सवेरे ही आँख खुलती है। यह क्रम थोड़ी उलट-पलट के साथ चलता रहता है। जन्म से लेकर मरण पर्यन्त तक की अवधि इसी प्रकार पूरी हो जाती है।
यह समस्त प्रयास तो सुविधा साधन शरीर के लिए ही जुटाता रहा न? दूसरे भागीदार आत्मा से तो नहीं पूछा गया कि तुम्हारी भी कोई आवश्यकता है क्या? तुम्हारा हित भी ध्यान में रखे जाने योग्य है क्या? यदि है तो उस पक्ष में कुछ किया जा रहा है? क्या दूसरे साझीदार के हितों को भी संरक्षण मिल रहा है? यह प्रश्न प्रतिदिन अपने आप से पूछे जाने चाहिए और देखना चाहिए कि एक साझीदार सब कुछ हड़प तो नहीं रहा है और दूसरे का सब कुछ अपहरण तो नहीं हो रहा है?
वस्तुतः आत्मा की भी कुछ आवश्यकताएँ हैं, उसके भी कुछ स्वार्थ हैं। यह शरीर उसे ही अपना लक्ष्य पूरा करने में सहायता करने के लिए मिला है। उसे उपकरण, औजार, साधन, वाहन की तरह उपयोग करने के लिए दिया गया है, ताकि इस सुर दुर्लभ अलभ्य अवसर का सही उपयोग हो सके।
कहते हैं-जीव नीची योनियों से भ्रमण करते हुए मनुष्य स्तर तक पहुँचा है और इसके उपयोग की पात्रता सिद्ध न कर पाने पर अयोग्य ठहराया जाता है और कुपात्र होने पर फिर उसी कुचक्र में घूमने के लिए लम्बी अवधि तक का दंड दुर्भाग्य वहन करना पड़ता है।
परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले छात्र ऊँची कक्षा में पढ़ते हैं। अच्छे नम्बर लाने वाले छात्रवृत्ति पाते हैं, किन्तु जो पिछड़ जाते हैं, चूक जाते हैं, परीक्षा के दिनों प्रमाद बरतते हैं उन्हें पीछे पश्चाताप ही करना पड़ता है? जो समय चला गया वह पीछे लौटता कहाँ है। हारा हुआ जुआरी जिस पर भीतर ही भीतर खीजता और स्वजन सम्बंधियों की भर्त्सना सहता है। उसी प्रकार उन्हें भी पछताना होता है, जो जीवन सम्पदा को उन कार्यों में गँवा देते हैं जिनका वस्तुतः कोई महत्व, कोई मूल्य आत्मा को भी लाभ मिलने के लिए नहीं है।
शरीर वाहन है उसके घाट पानी का प्रबंध तो होना चाहिए, पर वह कार्य इतना न फैला दिया जाय कि मालिक को घास खोदने, पानी खींचने, लीद बटोरने, सज्जा सजाने जैसे कार्यों में ही निरन्तर लगा रहना पड़े, यह याद भी न रहे कि इस पर बैठकर कहीं लम्बा सफर करना और लक्ष्य तक पहुंचना भी है क्या?
मनुष्य जीवन एक बहुमूल्य सम्पदा है। वह धरोहर की तरह इसलिए मिला है कि इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करके दिखाया जाय। जो इस परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं उन्हें महान मानव, ऋषि देवात्मा, अवतार आदि बनने का उपहार मिलता है, वे ही स्वर्ग और भक्ति का आनंद लेते हैं। जो उपेक्षा बरतते और फेल होते हैं उन्हें अयोग्यता के फलस्वरूप यही दंड मिलता है कि फिर उसी छोटी कक्षा में रहें, फिर वही पाठ याद करें। चौरासी लाख योनियों का भ्रमण दंड भी है और इसलिए भी उन पाठों को याद करे जो मनुष्य जीवन की परीक्षा घड़ी आने से पूर्व ही पूरे कर लिए जाने चाहिए थे।
आत्मा को जब शरीर सौंपा गया है, तो उसे दो लक्ष्य पूरे करने के लिए कहा गया है। एक आत्म कल्याण जिसका अर्थ होता है संचित कुसंस्कारों का परिशोधन दूसरा लक्ष्य है लोक कल्याण जिसका तात्पर्य। इस विराट ब्रह्म विशाल विश्व को सुन्दर समुन्नत बनाना। यही दो प्रश्न पत्र हैं जो मनुष्य जीवन की सार्थकता सिद्ध करने के लिए मनुष्य को पूरे करने होते हैं।
इनकी उपेक्षा करके कोई और सीधी पगडंडी ढूँढ़ना चाहे तो उसे कँटीली झाड़ियों में ही भटकना पड़ेगा। पूजा के बहाने भगवान को फुसलाने की चेष्टा सर्वथा निरर्थक है। उससे किसी प्रकार के व्यक्तिगत पक्षपात की आशा करना व्यर्थ है। वह अपने को निष्पक्ष न्यायकारी पद से नीचे उतरने को किसी भी मूल्य पर तैयार नहीं हो सकता है। भले ही दिन भर भजन किया और रात भर कीर्तन गाया जाय। खुशामद, चापलूसी और रिश्वत के सहारे उल्लू सीधा करने की प्रथा अपनी इसी गंदी दुनिया में ही है। भगवान के दरबार में इनका प्रवेश नहीं हो सकता। वहाँ खरे खोटे की एक ही कसौटी है कि सौंपे गये दायित्वों को ठीक तरह पूरा किया गया या नहीं, सौंपी गई अमानत का सदुपयोग हुआ या नहीं।
शरीर यात्रा इतनी कठिन नहीं है कि जिसके लिए सारा समय और सारा मनोयोग लगा दिया जाय। यों वाहन और मालिक के दर्जे में बहुत अंतर है। वाहन मालिक के लिए है, न कि मालिक वाहन के लिए। शरीर यात्रा इतनी कठिन नहीं है जिसके लिए समस्त क्षमताओं को उसी हेतु नियोजित किये रखा जाय। थोड़ी समझदारी का उपयोग करने पर ऐसी विधि-व्यवस्था भली प्रकार बन सकती है जिसमें शरीर का पोषण करते हुए भी आत्मा के स्वार्थ साधनों हेतु पर्याप्त समय मिल सके।
आठ घंटा अर्थ उपार्जन के लिए, सात घंटा सोने के लिए, पाँच घंटा नित्यकर्म तथा अन्यान्य कामों के लिए लगाने पर किसी भी विचारशील की अभावग्रस्त होते हुए भी जीवनचर्या भली प्रकार चल सकती है और वह शेष चार घंटे बिना किसी कठिनाई के उन कार्यों के लिए बचाये जा सकते हैं, जो आत्मोत्कर्ष के लिए नितान्त आवश्यक हैं और जिसके बिना वह लक्ष्य हस्तगत नहीं हो सकता जिसके लिए यह शरीर मिला है।
इन दैनंदिन कार्यक्रमों को बनाने में विज्ञजनों को तनिक भी कठिनाई नहीं हो सकती। उपासना कृत्य चलते-फिरते भी हो सकता है या अधिक से अधिक एक घंटा उसमें सुनियोजित ढंग से लगाने में उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। शेष समय को सेवाधर्म के निर्वाह में लगाया जा सकता है।