गुरु पूर्णिमा पर्व पर गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में उमड़ा श्रद्धा, साधना और गुरुभक्ति का जनसैलाब
हरिद्वार, 29 जुलाई।
गुरु पूर्णिमा पर्व के पावन अवसर पर गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में प्रातःकाल से ही आध्यात्मिक उल्लास, श्रद्धा और साधना का अनुपम वातावरण व्याप्त रहा। प्रातः जागरण, आरती एवं ध्यान-साधना के पश्चात युगऋषि परम पूज्य पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं परम वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा के विशेष वीडियो संदेश का प्रसारण किया गया, जिससे उपस्थित साधकों एवं श्रद्धालुओं ने गुरु पूर्णिमा पर्व का प्रेरणाप्रद संदेश ग्रहण किया।
अखिल विश्व गायत्री परिवार की प्रमुख श्रद्धेया जीजी ने शांतिकुंज के मुख्य सभागार में गुरु वरण हेतु उपस्थित साधकों को गुरु मंत्र स्वरूप गायत्री मंत्र की दीक्षा प्रदान की। इसके उपरांत श्रद्धेयद्वय द्वारा विधि-विधानपूर्वक गुरु पूर्णिमा पर्व का पूजन संपन्न कराया गया।
श्रद्धेया जीजी ने अपने पर्व संदेश में कहा कि मनुष्य के विकास की तीन प्रमुख धाराएँ हैं। प्रथम माता, जिनके बिना जन्म संभव नहीं है। द्वितीय पिता, जिनसे व्यक्ति को अपनी पहचान और सामाजिक आधार प्राप्त होता है। तृतीय और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण धारा गुरु की है, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण कर उसे जीवन की दिशा प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि ऋषि-मुनियों ने अनुभव किया कि संसार में अच्छी की अपेक्षा बुरी प्रवृत्तियों का प्रभाव अधिक होता है, जिससे बालमन के विचलित होने की आशंका बनी रहती है। ऐसे में उन्होंने ऐसे व्यक्तित्व की कल्पना की, जो शिष्य के अंतर्मन की गहराइयों को समझ सके, उसकी कमियों का परिष्कार कर सके और उसे श्रेष्ठ जीवन की ओर अग्रसर करे। वही गुरु है। इस संदर्भ में उन्होंने संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा उद्धृत किया, "गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट। अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट॥"
श्रद्धेया जीजी ने परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीया माताजी से प्राप्त प्रत्यक्ष एवं परोक्ष संरक्षण, आशीर्वाद, अनुदान एवं वरदानों का स्मरण करते हुए अखिल विश्व गायत्री परिवार की ओर से संकल्प व्यक्त किया। उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में कहा, "अनुदान और वरदान प्रभु, जो माँगे उनको दे देना; गुरुदेव, हमें निज अंतर की पीड़ा में हिस्सा दे देना।"
गायत्री परिवार प्रमुख श्रद्धेय डॉ. साहब ने अपने उद्बोधन में कहा कि गुरु पूर्णिमा का वास्तविक उद्देश्य परम पूज्य गुरुदेव एवं परम वंदनीया माताजी को अपने अंतःकरण में प्रतिष्ठित करना है। इसके लिए उन्होंने उपस्थित साधकों को एक संक्षिप्त ध्यान-विधि का अभ्यास कराया। उन्होंने गुरु गीता के नवें श्लोक की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रबुद्ध आत्मा, परिष्कृत आत्मा और सद्गुरु, तीनों एक ही हैं। यह सत्य है, निस्संदेह सत्य है।
उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल श्रद्धा का ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान और आत्मबोध का भी पर्व है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है, जिसमें साधक आध्यात्मिक ज्ञान को ग्रहण करता है और अपनी श्रद्धा बढ़ता है। वस्तुतः गुरु पूर्णिमा शिष्यत्व के जागरण और आत्मपरिष्कार का महापर्व है।
पर्व संदेश के उपरांत गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में उपस्थित हजारों श्रद्धालुओं एवं आगंतुक परिजनों ने अखंड दीप दर्शन, गुरु पादुका प्रणाम, यज्ञ तथा विभिन्न संस्कारों में श्रद्धापूर्वक सहभागिता करते हुए गुरुचरणों के प्रति अपनी भावनात्मक श्रद्धांजलि अर्पित की। संपूर्ण परिसर दिनभर गुरुभक्ति, साधना और आध्यात्मिक चेतना से अनुप्राणित रहा।
