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विज्ञान को शैतान बनने से रोकें:अनियंत्रित प्रगति अर्थात महामरण की तैयारी
सामान्य व्यक्ति का मस्तिष्क विकृत हो तो वह थोड़े ही व्यक्तियों का अहित कर सकता है। उसी तरह की दुर्बुद्धि वाले लोगों का एक समूह निकल पड़े, तो हानि की सँभावनाएँ निश्चित बढ़ती हैं। किंतु यदि यही रोग राजसत्ताओं में व्याप्त हो जाए, तब तो यह समझना चाहिए कि महायुद्ध, महामरण की सँभावनाएँ ही सुनिश्चित है।
राजसत्ता भी कोई जड़ वस्तु नहीं है, उस पर भी नियंत्रण मनुष्य का ही रहता है; चाहे वह राजतंत्र हो अथवा प्रजातंत्र। एक ओर मनुष्य की सुरसा की तरह बढ़ रही लालसाएँ और महत्त्वाकांक्षाएँ, अनियंत्रित विज्ञान का योगदान और उस पर भी निरंकुश-उद्धत। आज विश्व के रंगमंच पर यह परिस्थितियाँ पूरी तरह घटाटोप छाई हुई हैं। वह मारण अस्त्र तेजी से बनते चले जा रहे हैं कि सृष्टि का किसी क्षण विनाश संभव है। आइंस्टीन का यह कथन—...
होली
होली विशेषांक— 4
पुराणकालीन, आदर्शसत्याग्रही, भक्त प्रह्लाद के दमन के लिए हिरण्यकश्यप के छल-प्रपंच सफल न हो सके। उसे भस्म करने के प्रयास में होलिका जल मरी और प्रहलाद तपे कंचन बन गए। खीज-क्रोध से उन्मत्त हिरण्यकश्यप जब स्वयं उसे मारने दौड़ा, तो नृसिंह भगवान ने प्रकट होकर उसे समाप्त कर दिया। इस कथा की महान प्रेरणाओं को होली के यज्ञीय वातावरण में उभारा जाना उपयुक्त है।
यह राष्ट्रीय चेतना के जागरण का पर्व है। जहाँ वर्गभेद है, वहाँ समस्त साधन होते हुए भी क्लेश और अशक्तता ही रहेगी; जिनमें भ्रातृत्व सहकार है, वे अल्प साधनों में भी प्रसन्न और अजेय रहेंगे, इसलिए इसे समता का पर्व भी मानते हैं। कार्य-विभाजन के लिए किए गए चार प्रमुख वर्गों को महत्त्व देने की परंपरा रखी गई है। होली पर्व में शुद्र वर्ग को...
अपनों से अपनी बात- होली का संदेश
होली विशेषांक— 3
मातृभूमि की धूलि मस्तक पर लगाकर देशभक्ति की प्रतिज्ञा लेने का महापर्व है— होली। यह असमानता के अभिशाप को जला देने का पर्व भी है। यह पर्व यह संदेश देता है कि आर्थिक−सामाजिक असमानता के रहते हुए हम संतोष के साथ साँस न लें; मिटाकर ही दम लें। सभी इस पर्व पर गले मिलें व राष्ट्र को एक−अखंड बनाएँ। स्वयं उपार्जित नया अन्न तभी खाएँ, जब वह यज्ञ से— यज्ञीय जीवन की भावना से शुद्ध हो जाए, यह संदेश भी होली का नवशस्येष्टि महापर्व हमें देता है। हमने उसका स्वरूप आज न जाने क्या बना दिया है।
— अखण्ड ज्योति / 2011/ 03 / अपनों से अपनी बात- होली का संदेश (बॉक्स में)
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हमारी वसीयत और विरासत (भाग 151): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
इन आंदोलनों के एक लाख गाँवों में विस्तार हेतु शान्तिकुञ्ज ने पहला कदम बढ़ाया है। इसके लिए संचालनकेंद्रों की स्थापना की गई है। वहाँ चार-चार नई साइकिलें, चार छोटी बालटियाँ, बिस्तरबंद, संगीत उपकरण, साहित्य आदि साधन जुटाए गए हैं। इनके सहारे यात्रा की सभी आवश्यक वस्तुएँ एक ही स्थान पर मिल जाती हैं और कुछ ही दिनों की ट्रेंनिंग के उपरांत समयदानियों की टोली आगे बढ़ चलती है। कार्यक्रम की सफलता तब सोची जाएगी, जब कम-से-कम एक नैष्ठिक सदस्य उस गाँव में बने और समयदान और अंशदान नियमित रूप से देते हुए झोला पुस्तकालय चलाने लगे। यह प्रक्रिया जहाँ भी अपनाई जाएगी, वहीं एक उपयोगी संगठन बढ़ने लगेगा और उसके प्रयास से गाँव की सर्वतोमुखी प्रगति का उपक्रम चल पड़ेगा। यही है तीर्थ-भावना— तीर्थ-स्थापना। इसके लिए एक हजार ऐसे...
होली का संदेश (होली विशेषांक— 2)
अनावश्यक और हानिकार वस्तुओं को हटा देने और मिटा देने को हिंदू धर्म में बहुत ही महत्त्वपूर्ण समझा गया है। और इस दृष्टिकोण को क्रियात्मक रूप देने के लिए होली का त्यौहार बनाया गया है। रास्तों में फैले हुए काँटे, शूल, झाड़-झंखाड़ मनुष्य समाज की कठिनाइयों को बढ़ाते हैं; रास्ते चलने वालों को कष्ट देते हैं। ऐसे तत्त्वों को ज्यों-का-त्यों नहीं पड़ा रहने दिया जा सकता। उनकी ओर से न आँख बचाई जा सकती है और न उपेक्षा की जा सकती है। इसलिए हर वर्ष होली पर लोग मिल-जुलकर रास्तों में पड़े हुए कँटीले अनावश्यक झाड़ों को बटोरते हैं और उन्हें जलाते हुए उत्सव का आनन्द मनाते हैं। इसी प्रकार नाली, गड्ढे, कीचड़, धूलि कचरा आदि की सफाई करके जमी हुई गंदगी को हटाते हैं। गली-मुहल्लों के कोने-कोने को छान डाला जाता है कि कह...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 150): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
हर गाँव को एक तीर्थ रूप में विकसित करने के लिए तीर्थयात्रा टोलियाँ निकालने की योजना है। पदयात्रा को साइकिल यात्रा के रूप में मान्यता दी है। चार साइकिल सवारों का एक जत्था पीले वस्त्रधारण किए, गले में पीला झोला लटकाए, साइकिलों पर पीले रंग के कमंडलु टाँगे प्रवास-चक्र पर निकलेगा। यह प्रवास न्यूनतम एक सप्ताह के, दस दिन के, पंद्रह दिन के अथवा अधिक-से-अधिक एक महीने के होंगे। जिनका निर्धारण पहले ही हो चुका होगा। यात्रा जहाँ से आरंभ होगी, एक गोलचक्र पूरा करती हुई वहीं समाप्त होगी। प्रातःकाल जलपान करके टोली निकलेगी। रास्ते के सहारे वाली दीवारों पर आदर्शवाक्य लिखती चलेगी। छोटी बालटियों में रंग घुला होगा। सुंदर अक्षर लिखने का अभ्यास पहले से ही कर लिया गया होगा।1. हम बदलेंगे— युग बदलेगा। 2. हम सुधरेंगे— ...
हमारी होली (होली विशेषांक— 1)
मैं चाहता हूँ कि आप इस होली पर खूब आनंद मनाएँ और साथ ही यह भी चिंतन करें कि जिसकी यह छाया है, उस अखंड आनंद को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? मेरी युग-युग की प्यास कैसे बुझ सकती है? इस अँधेरे में कहाँ से प्रकाश पा सकता हूँ, जिससे अपना स्वरूप और लक्ष्य की ओर बढ़ने का मार्ग भली प्रकार देख सकूँ ? सच्चे अमृत को मैं कैसे और कहाँ से प्राप्त कर सकता हूँ ?
आइए, उस अखंड आनंद को प्राप्त करने के लिए हृदयों में होली जलावें। सच्चे ज्ञान की ऐसी उज्ज्वल ज्वाला हमारे अंतरों में जल उठे, जिसकी लपटें आकाश तक पहुँचें। अंतर के कपाट खुल जावें और उस दीप्त प्रकाश में अपना स्वरूप परख सकें। दूसरे पड़ोसी भी उस प्रकाश का लाभ प्राप्त करें। चिरकाल के जमा हुए झाड़-झंखाड़ इस होलिका की ज्वाला में जल जावें। विकारों के राक्षस, ...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 149): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का संकल्प पूरा करने में यदि प्रज्ञापरिजन उत्साहपूर्वक प्रयत्न करें तो इतना साधारण निश्चय इतने बड़े जनसमुदाय के लिए तनिक भी कठिन नहीं होना चाहिए। उसकी पूर्ति में कोई अड़चन दीखती भी नहीं है। उन्हें देवालय की प्रतिष्ठा दी जाएगी। बिहार के हजारी किसान ने हजार आम्र-उद्यान निज के बलबूते खड़े करा दिए थे, तो कोई कारण नहीं कि एक लाख अशोक वृक्ष लगाने का उद्देश्य पूरा न हो सके। इनकी पौध शान्तिकुञ्ज से देने का भी निश्चय किया गया है और हर प्रज्ञापुत्र को कहा गया है कि वह अशोक-वाटिका लगाने-लगवाने में किसी प्रकार की कमी न रहने दें। उसके द्वारा वायुशोधन का होने वाला कार्य शाश्वत शास्त्रसम्मत यज्ञ के समतुल्य ही समझें। अग्निहोत्र तो थोड़े समय ही कार्य करता है, पर यह पुनीत वृक्ष उसी कार्य क...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 148): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
जीवन की बहुमुखी समस्याओं का समाधान, प्रगति-पथ पर अग्रसर होने के रहस्य भरे तत्त्वज्ञान के अतिरिक्त इसी अवधि में भाषण, कला, सुगम संगीत, जड़ी-बूटी उपचार, पौरोहित्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, गृह-उद्योगों का सूत्र-संचालन भी सम्मिलित रखा गया है, ताकि उससे परोक्ष और प्रत्यक्ष लाभ अपने तथा दूसरों के लिए उपलब्ध किया जा सके।
अनुमान है कि अगले 14 वर्षों में एक लाख छात्रों के उपरोक्त प्रशिक्षण पर भारी व्यय होगा। प्रायः एक करोड़ भोजन-व्यय में ही चला जाएगा। इमारत की नई रद्दोबदल, फर्नीचर, बिजली आदि के जो नए खरच बढ़ेंगे, वे भी इससे कम न होंगे। आशा की गई है कि बिना याचना किए भारी खरच को वहनकर अब तक निभा व्रत आगे भी निभता रहेगा और यह संकल्प भी पूरा होकर रहेगा। 25 लाख का इस उच्चस्तरीय शिक्षण में सम्मिलित होना तनिक भी क...
हमारी वसीयत और विरासत (भाग 147): जीवन के उत्तरार्द्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्धारण
युगसंधि सन् 2000 तक है। अभी उसमें प्रायः 14 वर्ष हैं। हर साल इतने जन्मदिन भी मनाए जाते रहें, तो 1 लाख कार्यकर्त्ताओं के जन्मदिन 1 लाख यज्ञों में होते रहेंगे। देखा-देखी इसका विस्तार होता चले, तो हर वर्ष कई लाख यज्ञ और कई करोड़ आहुतियाँ हो सकती हैं। इससे वायुमंडल और वातावरण दोनों का ही संशोधन होगा, साथ ही जनमानस का परिष्कार करने वाली अनेक सत्प्रवृत्तियाँ इन अवसरों पर लिए गए अंशदान-समयदान संकल्प के आधार पर सुविकसित होती चलेंगी।
2. एक लाख को संजीवनी-विद्या का प्रशिक्षण— शान्तिकुञ्ज की नई व्यवस्था इस प्रकार की जानी है, जिसमें 500 आसानी से और 1000 ठूँस-ठूँसकर नियमित रूप से शिक्षार्थियों का प्रशिक्षण होता रह सकता है। इस प्रशिक्षण में व्यक्ति का निखार, प्रतिभा का उभार, परिवार सुसंस्कारिता, समाज में स...

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