मनुष्य अनन्त शक्तियों का भाण्डागार है
मनुष्य अनन्त शक्तियों का भाण्डागार है। ये शक्तियाँ ही जीवन के उत्कर्ष का आधार हैं। शारीरिक, मानसिक, आत्मिक क्षमताओं का विकास, सफलता, सिद्धि, सुख और आनन्द की प्राप्ति सब इन्हीं आत्मशक्तियों के जागरण से संभव हो पाता है। इन शक्तियों के जागरण के लिए जीवन साधना और मनोनिग्रह की आवश्यकता होती है।
सामान्यत: आत्मशक्तियों का जागरण मानवीय उत्कर्ष के रूप में हर किसी के जीवन में परिलक्षित होता है, लेकिन कुछ दृष्टांत ऐसे भी हैं, जो चमत्कारिक होते हैं। आत्मशक्तियों के जागरण का ऐसा परिणाम भले ही हर किसी के लिए संभव न हो, लेकिन यह दृष्टांत जीवन साधना से आत्मशक्तियों के जागरण का उत्साह व संकल्प जगाते हैं। आत्मशक्तियों के जागरण से लोगों ने अपने व्यक्तित्व में आमूलचूल परिवर्तन किया है, अनेक सामाजिक क्रान्तियाँ करने में वे सफल हुए हैं। प्रस्तुत है-साधना के कुछ चमत्कारिक परिणामों की बानगी।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा
श्री रामकृष्ण परमहंस दक्षिणेश्वर में थे। एक दिन अनेक भक्तों के बीच उनका प्रवचन चल रहा था। तभी एक व्यक्ति उनके दर्शनों के लिये आया। रामकृष्ण परमहंस उसे ऐसे डाँटने लगे, जैसे उसे वर्षों से जानते हों। कहने लगे, ‘‘तू अपनी धर्मपत्नी को पीटकर आया है। जा पहले अपनी साध्वी पत्नी से क्षमा माँग, फिर यहाँ सत्संग में आना।’’
उस व्यक्ति ने अपनी भूल स्वीकार की और धर्मपत्नी से क्षमा माँगने लौट गया। उपस्थित लोग आश्रर्यचकित रह गये कि रामकृष्ण परमहंस ने बिना पूछे यह कैसे जान लिया कि उस व्यक्ति ने अपनी स्त्री को पीटा है। वे अपना आश्चर्य रोक न सके, तब परमहंस ने बताया कि मन की सामर्थ्य बहुत अधिक है। वह सैकेण्ड के भी हजारवें हिस्से में कहीं भी जाकर सब कुछ गुप्त रूप से देख-सुन आता है, यदि हम उसे अपने वश में किये हों।
गोरखनाथ ने कापालिक को रोका
गुरू गोरखनाथ से एक कापालिक बहुत चिढ़ा हुआ था। एक दिन उसका आमना-सामना हो गया। उस समय कापालिक के हाथ में कुल्हाड़ी थी, उसे ही लेकर वह तेजी से गोरखनाथ जी को मारने दौड़ा। पर अभी कुल दस कदम ही चला था कि वह जैसे का तैसा खड़ा रह गया। कुल्हाड़ी वाला हाथ ऊपर और दूसरा पेट में लगाकर हाय-हाय चिल्लाने लगा। वह इस स्थिति में भी नहीं था कि इधर-उधर हिल-डुल भी सके।
शिष्यों ने गोरखनाथ से पूछा, ‘‘महाराज, यह कैसे हो गया? उन्होंने बताया, ‘‘निग्रहीत मन बेताल की तरह शक्तिशाली और आज्ञाकारी होता है। मन की इस शक्ति से यह तो क्या, ऐसे सैकड़ों कापालिकों को मारण क्रिया के द्वारा एक क्षण में मार गिराया जा सकता है।’’
गुफा में से निकलीं गरम-गरम जलेबियाँ
ब्रह्मचारी व्यासदेव ने अपनी ‘आत्म-विज्ञान’ पुस्तक की भूमिका में बताया है कि उन्हें इस विज्ञान का लाभ कैसे हुआ। उस प्रस्तावना में उन्होंने एक घटना दी है, जो मन की ऐसी ही शक्ति का परिचय देती है। वह लिखते हैं, ‘‘मैं उन साधु के पास गया। मैंने कहा, भगवन! कुछ खाने को हो तो दो, भूख के कारण व्याकुलता बढ़ रही है।’’
साधु ने पूछा, ‘‘क्या खाएगा? आज तू जो भी, जहाँ की भी वस्तु चाहेगा, हम तुझे खिलायेंगे।’’
मुझे उस समय देहली की चाँदनी चौक की जलेबियों की याद आ गई। मैंने वही इच्छा प्रकट कर दी। साधु गुफा के अन्दर गये और एक बर्तन में कुछ ढककर ले आये। मैंने देखा, बिलकुल गर्म जलेबियाँ, स्वाद और बनावट बिलकुल वैसी ही जैसी देहली में कभी खाई थीं। गुफा में जाकर देखा, वहाँ तो एक फूटा बर्तन तक न था। मैंने पूछा, ‘‘भगवन! यह जलेबियाँ यहाँ कैसे आई?’’ तो उन्होंने हँसकर कहा, ‘‘योगाभ्यास से वश में किये हुए मन में वह शक्ति आ जाती है कि आकाश में भरी हुई शक्ति का उपयोग एक क्षण में कर ले और भारी से भारी पदार्थ का उलट-फेर कर दे।’’
स्वामी विवेकानन्द ने देखा तांत्रिक का कमाल
एक बार स्वामी विवेकानन्द हैदराबाद गये। उन्हें किसी ने एक ब्राह्मण तांत्रिक के बारे में बताया कि वह किसी भी समय कोई भी वस्तु कितनी ही मात्रा में चमत्कारिक ढंग से प्रस्तुत कर सकता है। तांत्रिक का कथन है कि मन में ऐसी शक्ति है कि वह संसार के किसी भी भाग के किसी भी पदार्थ को क्षण भर में आकर्षित करके वहाँ उपस्थित कर सकती है।
स्वामी विवेकानन्द ने इस प्रसंग का विवरण देते हुए लिखा है कि मैं स्वयं उस ब्राह्मण से मिलने गया। ब्राह्मण का लड़का बीमार था। जब मैंने उसे यह प्रयोग दिखाने को कहा तो उसने कहा, ‘‘पहले आप मेरे पुत्र के सिर पर हाथ रखें, जिससे उसका बुखार उतर जाये। बुखार उतर जाए तो मैं भी आपको यह चमत्कार दिखा सकता हूँ।’’
उसे किसी ने बताया था कि महापुरूष हाथ रखकर ही किसी भी बीमार को अच्छा कर सकते हैं। इसलिये उसने मुझसे ऐसा आग्रह किया था। मैंने उनकी शर्त मान ली। इसके बाद वह एक कम्बल ओढ़ कर बैठ गया। हमने उसका कम्बल अच्छी तरह देखा था, उसमें कुछ भी नहीं था। इसके बाद जो भी मेवा, फल उससे माँगा, उसने उस कम्बल के भीतर से निकाल कर दे दिया। हमने उससे ऐसी-ऐसी वस्तुएँ माँगीं, जो उस प्रांत में होती भी नहीं थीं। ब्राह्मण ने हमें सभी वस्तुएँ निकालकर दीं, वह भी इतनी मात्रा में कि हममें से कई के पेट भर गये। वह वस्तुयें खाने में वैसी ही स्वादिष्ट भी थीं। एक बार हमारे आग्रह पर उसने गुलाब के ताजे फूल, जिन पर ओस की बूँदें पड़ी हुई थीं, इतनी मात्रा में कम्बल से निकाल कर दीं, जितनी कम्बल में बँध भी नहीं सकती थीं। हम सब यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये।
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