हमारी वसीयत और विरासत (भाग 83): आराधना, जिसे निरंतर अपनाए रहा गया
इतने पर भी वे सेवाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। अब तक प्रज्ञा परिवार से प्रायः 24 लाख से भी अधिक व्यक्ति संबंधित हैं। उनमें से जो मात्र सिद्धांतों, आदर्शों से प्रभावित होकर इस ओर आकर्षित हुए हैं, वे कम हैं। संख्या उनकी ज्यादा है, जिनने व्यक्तिगत जीवन में प्रकाश, दुलार, सहयोग, परामर्श एवं अनुदान प्राप्त किया है। ऐसे प्रसंग मनुष्य के अंतराल में स्थान बनाते हैं। विशेषतया तब, जब सहायता करने वाला अपनी प्रामाणिकता एवं नि:स्वार्थता की दृष्टि से हर कसौटी पर खरा उतरता हो। संपर्क परिकर में मुश्किल से आधे-तिहाई ऐसे होंगे, जिन्हें मिशन के आदर्शों और हमारे प्रतिपादनों का गंभीरतापूर्वक बोध है। शेष तो हैरानियों में दौड़ते और जलती परिस्थितियों में शांतिदायक अनुभूतियाँ लेकर वापस लौटते रहे हैं। यही कारण है, जिससे इतना बड़ा परिवार बनकर खड़ा हो गया; अन्यथा मात्र सिद्धांतपरक ही सब कुछ रहा होता, तो आर्यसमाज, सर्वोदय की तरह सीमित सदस्य होते और व्यक्तिगत आत्मीयता-घनिष्ठता का जो वातावरण दीखता है, वह न दीखता। आगंतुकों की संख्या अधिक, समय-कुसमय आगमन, ठहराने, भोजन कराने जैसी व्यवस्थाओं का अभाव जैसे कारणों से इस दबाव का सर्वाधिक भार माताजी को सहन करना पड़ा है। पर उस असुविधा के बदले जितनों की, जितनी आत्मीयता अर्जित की है, उसे देखते हुए हम लोग धन्य हो गए हैं। लगता है, जो किया गया, वह ब्याज समेत वसूल होता रहा है। पैसे की दृष्टि से न सही, भावना की दृष्टि से भी यदि कोई कुछ कम ले तो वह उसके लिए घाटे का सौदा नहीं समझा जाना चाहिए।
आराधना के लिए— लोक-साधना के लिए— गिरह की पूँजी चाहिए। उसके बिना भूखा क्या खाए; क्या बाँटे? यह पूँजी कहाँ से आई; कहाँ से जुटाई? इसके लिए मार्गदर्शक ने पहले ही दिन कहा था— “जो पास में है, उसे बीज की तरह भगवान के खेत में बोना सीखा? उसे जितनी बार बोया गया, सौ गुना होता चला गया। अभीष्ट प्रयोजन में कभी किसी बात की कमी न पड़ेगी।” उनने बाबा जलाराम का उदाहरण दिया था, जो किसान थे। अपने पेट से बचने वाली सारी आमदनी जरूरतमंदों को खिलाते थे। भगवान इस सच्ची साधना से अतिशय प्रसन्न हुए और एक ऐसी अक्षय झोली दे गए, जिसका अन्न कभी निपटा ही नहीं और अभी भी वीरपुर (गुजरात) में उनका अन्न सत्र चलता रहता है, जिसमें हजारों भक्तजन प्रतिदिन भोजन करते हैं। जो अपना लगा देता है, उसे बाहर का सहयोग बिना माँगे मिलता है। पर जो अपनी पूँजी सुरक्षित रखता है; दूसरों से माँगता फिरता है, उस चंदा उगाहने वाले पर लोग व्यंग्य ही करते हैं और यत्किंचित् देकर पल्ला छुड़ाते रहते हैं।
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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