आत्मचिंतन के क्षण
आत्म निरीक्षण और विचार पद्धति का कार्य उसी प्रकार चलाना चाहिए जिस प्रकार साहूकार अपनी आय और व्यय का ठीक-ठीक खाता रखते हैं। हमारी दुर्बलताओं और कुचेष्टाओं का खर्च-खाता भी हो और विवेक सत्याचरण तथा आत्म परिष्कार का जमा-खाता भी होना चाहिये। बचत का ठीक-ठीक अनुमान तभी लग सकता है। यदि अपनी जमा अधिक है तो आप सुसंस्कार बढ़ा रहे है। खर्च की अधिकता आप के संस्कारों का दीवालियापन प्रकट करती है। संस्कारों रुची धन एकत्रित करने के लिये सदाचरण की पूँजी बढ़ाना नितान्त आवश्यक है।
जिसमें पूरी शक्ति से काम करने की दृढ़ लगन है उसके मार्ग में चाहे कितना प्रबल विरोध का प्रवाह आये, वह उसकी गति को अवरुद्ध नहीं कर सकता, पीछे नहीं हटा सकता। आप आगे बढ़ने का प्रयत्न जितनी दृढ़ता के साथ करेंगे। सफलता उतनी ही आपके समीप आती जायगी। पुरुषार्थ सब अभावों की पूर्ति करता है। इसीलिए कहा है- “उद्योगे नास्ति दारिद्रयम्” पुरुषार्थ करने पर दरिद्रता नहीं रहती।
आप में योग्यता की कितनी ही कमी हो, यदि आप में वह शक्ति है जो किसी भी निर्दिष्ट लक्ष्य से हटना नहीं जानती, जो कार्य आपने शुरू किया है उसे छोड़ना नहीं जानती तो आप एक दिन सफलता की मंजिल तक पहुँच ही जाएँगे। इसके विपरीत काफी योग्यता रखते हुए भी शिथिल प्रयत्न, अधूरे मन से काम में लगने वाले, असफल हों तो इसमें किसी का क्या दोष।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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