विराट् सत्ता की दर्शन झाँकी
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आँखों से प्रकृति पदार्थ दीखता है। इंद्रियों द्वारा भी वही अनुभव किये जाते है। ईश्वर चेतना है। वह निराकार होती है। साकार तो उसका कलेवर भर दीखता है। ईश्वर का दृश्य स्वरूप यह विराट ब्रह्माण्ड है। अर्जुन, यशोदा, काकभुशुण्डि, कौशल्या आदि का मान जब ईश्वर दर्शन के लिए व्याकुल हुआ तो उन्हें इसी रूप में दिव्य दर्शन कराये गये। इसके लिए दिव्य नेत्र दिये गये। कारण कि चर्म चक्षुओं से तो विराट् विश्व को एक बारगी नहीं देखा जा सकता। आँखों की देख सकने की परिधि तो बहुत छोटी है। फिर सुविस्तृत कैसे देखा जाये।
जिन्हें पूर्व कथानकों के अनुरूप दर्शन ही भक्ति भावना की सफलता का आधार दिखाई पड़ता है। उनके लिए प्रतिमा प्रतीकों का निर्धारण किया गया, यह प्रतिमाएँ भी मनुष्य क अपने कलेवर में नर या नारी जैसी होती है। जब व्यापक चेतना की सत्ता तो सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है। मात्र शरीरधारी आकार ही चाहिए तो फिर भगवान की आकृति किसी भी प्राणी के रूप में हो सकती है। पर यह परिकल्पना रास नहीं आती आरे मनुष्य शरीर अपना अभ्यास होने के कारण अधिक मनभावन प्रतीत होता है। इसलिए प्रतिमाओं में मनुष्याकृति को ही प्रमुखता दी गयी है। यों तत्वदर्शियों ने मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह आदि को भी भगवान के अवतार ही बताकर प्राणी मात्र में दिव्य सत्ता का दर्शन करने का संकेत दिया है। पर वह प्रतीक सब में प्रतिष्ठित न हो सकीं।
देवी देवताओं के वाहनों के रूप में पशु पक्षियों का चित्रण किया गया है ओर समझने का प्रयत्न हुआ कि प्राणी मात्र में भी देव सत्ता का आधार टिका हुआ माना जा सकता है। पर वह भी सम्मानास्पद रही बन सका, इष्ट देव का स्थान न पा सका चित्रों म प्रतिमाओं में देवी देवताओं का वाहन पशु पक्षी है तो पर उन्हें सेवक भर की मान्यता मिल सकी। आराध्य पद व न पा सके। यद्यपि निर्धारण कर्ताओं का अभिप्राय यही था कि प्राणिमात्र में ईश्वर की झाँकी की जाय ओर उनके साथी भी वैसा ही व्यवहार किया जाय जैसा कि दिव्य संरचना के हर घटक के साथ किया जाना उचित है। शिव का नन्दी, सरस्वती का रस, लक्ष्मी का हाथी, दुर्गा का सिंह तो प्राय चित्रण में आते ह। पर नवग्रहों तथा अन्य देव समुदाय के वाहनों की उपेक्षा होती है। भैरव के वाहन कुत्ते को, शीतला के वाहन गधे को कौन पूछता है? कौन पूजता है?
भगवान की प्रतिमा एवं उनके प्रतीक मानने में भी निर्माताओं ने अपने मनोनुरूप ही उनकी आकृति का विनिर्मित किया है। दक्षिणी भारत की, उत्तर भारत की, असम, मणिपुर, की देव प्रतिमा वहाँ के निवासियों जैसे चेहरे की होती है, इससे स्पष्ट है कि ईश्वर की कोई नियम छवि नहीं है। वह भक्तजनों की मान्यता के अनुरूप बनी बदलती रहती हे। कृष्ण, शिव आदि के स्वरूप किशोरियां नव यौवन वाली वय के है यदि वे सचमुच मनुष्य आकृति में विकसित हुए होते तो उनका शरीर बाल किशोरों वृद्धों जैसा भी देखने को मिलता। पर ऐसा कही देखा नहीं जाता था वैसे चित्र ही मिलते हैं ओर न मूर्तियां ही इससे स्पष्ट है कि प्रतिमाएं अथवा तस्वीरें ईश्वर के वास्तविक स्वरूप की नहीं है, वरन् उन्हें साधकों ने अपनी प्रिय परिस्थिति के अनुरूप गढ़ा है। उन्हें वस्तु स्थिति का परिचायक नहीं माना जाना चाहिए।
भगवान को या देवताओं को, विशिष्टता ओर विचित्रता युक्त प्रतिपादित करने के पीछे भी संभवतः यही भाव रहा होगा कि उन्हें सामान्य जनों की तुलना में अधिक महत्ता देकर मान्यता दी जाय। उनकी विचित्रता ध्यान धारणा को अधिक आकर्षित करती रहे। ब्रह्मा के चार मुख विष्णु के चार हाथ दुर्गा के अनेक मुख ओर अनेक .... अपनी अपनी अभिरुचित एवं परिकल्पना है या जिनने आकृतियों के झंझट से बचना चाहा है उनने शिवलिंग या शालिग्राम जैसे सरलता पूर्वक सरिता व समुद्रतटीय क्षेत्रों में मिलने वाले गोल आकार वाले पत्थरों को ही भगवान के रूप में प्रतिष्ठित कर लिया है। इसमें उन्हें सरलता प्रतीत हुई ओर बिना भाग दौड़ के प्रतिमा मिल गई। कही कही तो गोबर से गोवर्धन भगवान की प्रतिमा बन गई। यह भक्तजनों की अपनी भावना का प्रतिबिम्ब है।
फिर ईश्वर दर्शन का लाभ, जो वास्तविक रूप में प्राप्त करना चाहता है उन्हें क्या सोचना ओर क्या करना चाहिए? इस प्रश्न के उत्तर में एक ही बात की जा सकती है कि ईश्वर का बसने का निकटवर्ती स्थान अपना अन्त करण समझना चाहिए। उसमें दिव्य संवेदना का उभार जब भी उभरे तब समझना चाहिए कि उतनी मात्रा में दिव्य चेतना का अवतरण आत्मसत्ता में हो रहा है। चेतना में जो उत्कृष्ट आदर्श वादिता के उभार है। उन्हीं से मनुष्य को परब्रह्म की अनुभूति हो सकती है।
क्रौंच पंखी के अवतरण को सुनकर जब अन्त करण की करुणा जागी तो महर्षि बाल्मीकि आदि कवि बन गये ओर उनकी लेखनी से अजस्र काव्य धारा प्रवाहित हो चली। इसी प्रकार की उच्च स्तरीय संवेदनाएँ जब भी उभरती हे। तब अपने ही अंतराल में भगवान का आँशिक अवतरण हुआ समझा जा सकता है।जब वे सद्भावनायें क्रिया रूप में परिणित होने के लिए मचल पड़े, लोभी मोह के बन्धनों से बँधने में इनकार करने लगें तो समझना चाहिए दिव्य अनुकम्पा का आवेश आत्म चेतना पर अपना अनुग्रह बरसाने लगा ऋषि व देवों में महामानव प्रायः प्रायः दिव्य प्रेरणाओं से अनुप्राणित ही कर ऐसा आदर्श उपस्थित करते है जिससे असंख्यों को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रगमन कर सकने का प्रकाश एवं साहस उपलब्ध हो सके। इस प्रकार के महामानवों के यदि ईश्वरीय प्रकार का उपलब्ध-कर्ता माना जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
शक्तियाँ सदा निराकार होती है। पवन का आकार कहाँ है? पर वह जब अंधड़ के साथ हुड़ जाता है। तो आँधी ही वायु के रूप में दर्शन देती है।
शब्द निराकार है जब जिह्वा, होंठ कर आदि के माध्यम से वाणी मुखर होती हो तो उन अंगों का परिचालन वाणी का साकार स्वरूप दीख पड़ता है। वाद्य यंत्र भी ध्वनि के उद्गम के रूप में दृष्टिगोचर होते है। कई बार तो वाद्य यंत्र ओर ध्वनि प्रवाह को पृथक करना तक समझ के लिए कठिन पड़ता है। इसीलिए उच्च उद्देश्यों में निरस्त महामानवों को भी बहुधा अवतार की, भगवान की संज्ञा दी जाने लगती है। श्रेष्ठ अभाव सम्वेदनाओं की तरह ही आदर्शवादी क्रिया कलाप भी दैवी अनुग्रह से गतिशील हुए माने जाने लगते है। जब प्रतिमाओं ओर तस्वीरों को भगवान का प्रतीक माना जाता है। तो भगवत् उद्देश्यों के लिए समर्पित आत्माओं के प्रति भी श्रद्धा क्यों न संजोई जाय? प्रतीक पूजन में इतना ही तथ्य है कि प्रतिमाओं को आधार तथा मनोनुरूप माध्यम बना कर उस निराकार सत्ता के प्रति सघनता भर स्थापित की जाती है। जो सर्वव्यापी, न्यायकारी एवं उत्कृष्टता का पक्षधर है।

