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Magazine - Year 1989 - Version 2

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इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य

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वर्तमान की परिस्थितियों को देखकर मनुष्य भविष्य का अनुमान लगाता है। यदि समय का प्रवाह अनुपयुक्त हो तो यही सोचते बनता है कि अगले दिन कठिनाइयों और असफलताओं से भरे होंगे। प्रसन्नता, प्रगति और सफलता की सम्भावना के साथ जुड़ी रहती है। यह दुर्दिनों का माहौल बनता दीख पड़े तो उदासी एवं निराशा छा जाना स्वाभाविक है। कहना न होगा कि खिन्नता की मन स्थिति में हाथ पाँव फूल जाते हे। उत्साह ठण्डा हो जाता है। नए सिरे से नया साहस जुटाने का उल्लास भी शिथिल हो जाता है।

इन दिनों आम चर्चा परिस्थितियों की विपन्नता पर होती सुनी जाती हे। कुछ तो लोगों का स्वभाव ऐसा है कि आशंकाओं को बढ़ा चढ़ा कर कहने में सहज रुचि रहती है। कुछ वास्तविकतायें भी ऐसी है जो अगले दिनों के प्रति निराशा भरा चित्र खिंचती है। उत्साह उभारने के अनेक कारण भले ही गतिशील हो पर उन्हें साधारण मानने और उपेक्षा करने का स्वभाव ही प्रमुखता अपनाये हुए दीखता है।

भट्टियों से उभरता प्रदूषण हवा का आरे कारखानों का कचरा जलाशयों को दूषित करता हे। ईंधन के अधिक उपयोग से अन्तरिक्ष का बढ़ता तापमान ध्रुवों के पिघलने, समुद्र में ज्वार आने का संकेत करता है। ऊंचे अन्तरिक्ष में “ओजोन” की परत फटने से ब्रह्मांडीय किरणों के धरातल को भूनने की चर्चा है। युद्धोन्माद के लिए बढ़ते जा रहे अणु आयुधों की विभीषिका कम डरावनी नहीं। विकिरण की अभिवृद्धि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्यक्ष संकट है।

कटते जा रहे वन, वर्षा की कमी, भूक्षरण, रेगिस्तानों की बढ़ोत्तरी, लकड़ी का अभाव, वायु शोधन में अवरोध जैसे संकटों का सृजन करते है। द्रुत गति से बढ़ती हुई जनसंख्या हर क्षेत्र में अभाव उत्पन्न करती है और प्रगति कार्यक्रमों को सफल न होने देने के लिए चुनौती बनती जा रही हे। नशेबाजी जिस तेजी से बढ़ रही है उसे देखते हुए लगता है कि लोग कही अर्ध विक्षिप्त स्तर के बन कर न रह जाय। घटती हुई जीवनी शक्ति व स्वच्छंद यौनाचार एड्स जैसी महामारियों को जन्म दे रहे है।

चटोरेपन की आदतें और कामुकता के दुष्परिणाम मस्तिष्क को विकृत करते चले जा रहे हे। असंयम हर क्षेत्र में बढ़ रहा है। विलासिता और फिजूलखर्ची से आर्थिक कठिनाइयों में कमी नहीं होने पाती। महंगाई, बेरोजगारी की दुहरी मार बड़ी जनसंख्या को बुरी तरह प्रभावित करती है। खर्चीली शादियाँ जन साधारण को दरिद्र ओर बेईमान बनाती जा रही है। कुरीतियों ओर अन्ध विश्वासों में न जाने कितने घर, समय साधन बरबाद होते रहते है। मिलावट, नकली वस्तुओं की भरमार से हर कोई पग पग पर ठगा जाता है। अपराधों की बाढ़ इस तेजी से आ रही है कि इसकी चपेट में शान्ति ओर सुव्यवस्था पर भारी संकट लदता चला आ रहा है। पारस्परिक स्नेह-सहयोग ओर विश्वास में कमी पड़ते जाने से समय पर ऐसा आता दीखता है कि अपनों की सद्भावना पर से विश्वास उठ जाय।

जिनके जिम्मे सुधार परिष्कार की जिम्मेदार है वे अपने कर्त्तव्यों का वैसा पालन नहीं कर रहे है जैसा कि करना चाहिए। राजनैतिक पार्टियों की आपसी उठा पटकी उनकी प्रामाणिकता कम कर रही है। सामाजिक और धार्मिक संगठन कुछ ठोस काम कर सकते थे पर वे भीतर से पोले खोखले बनते जा रहे है।

अंतर्राष्ट्रीय सूझबूझ भी विश्व शान्ति की बात नहीं सोचती वरन् सुरक्षा व्यय से हर देश की कमर टूटी जा रही है। साहित्यकार, कलाकार, गायक, अभिनेता उस स्तर का सृजन कर नहीं पा रहे है जैसा कि ऐसी विषम वेला में सर्वतोभावेन होना चाहिए था। सम्भवतः इन्हीं सब को दृष्टि में रखते हुए सुप्रसिद्ध टाइम पत्रिका ने 1988 का “मैन ऑफ द ईयर” चुना है।

सामयिक कठिनाइयों में से यह कुछ सार संक्षेप है, जिनके साथ वास्तविकता का एक बड़ा अंश भी जुड़ा हुआ है। छुटपुट चर्चा इन्हीं की होती है। अखबारों में समाचार भी ऐसे विघटन के पढ़ने को मिलते है। प्रतिपादनकर्ता अगले दिनों की विभीषिकाओं को ही अच्छा खासा रंग दे कर इस प्रकार प्रस्तुत करते है जिससे वर्तमान की अवाँछनीयता ओर भविष्य की अशुभ संभावना ही उभर कर सामने आती है। ऐसी दशा में निराशा का वातावरण बनना स्वाभाविक है।

कहना न होगा कि निराशा की मनः स्थिति अपने आप में एक बड़ा संकट है। उसके रहते व्यक्ति समर्थ होते हुए भी कुछ ऐसा सोच नहीं पाता, कुछ ऐसा कर नहीं पाता जो उचित भविष्य की संरचना कर सकने वाले विचारों को कार्यों को अग्रगामी बनाने में सहायक सिद्ध हो सके। डरावने भविष्य की कल्पना करने से मनोबल टूटता है। उत्साह आरे उल्लास में भारी कमी पड़ती है। ओर अभिनव सृजन के लिए जिस साहस की आवश्यकता है उसे जुटा सकने में भारी कठिनाई पड़ती है।

सृजन प्रयासों का क्रम सर्वथा बन्द हो गया हो ऐसी बात भी नहीं। वर्तमान को सुधारने ओर भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए जिन प्रयत्नों की आवश्यकता है उनमें शिथिलता भले ही हो पर अभाव उनका भी नहीं है। इतने पर भी मनुष्य स्वभाव की विसंगति ही कहना चाहिए कि जो अशुभ है इसी को बढ़ा चढ़ा कर डरावने रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ओर सृजन की नियोजित प्रयत्नशील का जैसी भी कुछ वह है उससे भी हल्का आँका जाता है। यह माहौल मानसिक दृष्टि से ऐसा है, जिसे द्रुतगामी प्रगति प्रयासों के लिए जन साधारण का उल्लास उभारने के लिए अपर्याप्त ही का जा सकता है। उत्साह के अभाव में प्रगति प्रयासों को अभीष्ट बल मिलता नहीं है। पराक्रम शिथिल रहे तो भविष्य की संरचना के लिए जिन प्रचण्ड प्रयासों की आवश्यकताएँ है, उसमें कमी ही बनी रहती है सुखद संभावनाएँ बन पड़ने की गति धीमी होती जाती है।

हौंसले बुलन्द हो तो कठिनाइयों के बीच भी व्यक्ति मिल जुल कर थोड़े ही समय में इतना कुछ कर सकता है, जिसे देखकर आश्चर्य चकित रहा जा सके। पनामा की नहर, स्वेज कैनाल, चीन की दीवार, मिश्र क पिरामिड जैसे अनेकों प्रबल प्रयास उत्साह भरे वातावरण में ही सम्पन्न हुए है। बड़ा वजन जब श्रमिक मिल जुल कर आगे धकेलते है तो उनकी “हेइशा” जैसी हुँकार असर दिखाती है। युद्ध के बाजे सैनिकों में नया जोश भर देते है ओर वे दूने उत्साह में मोर्चा संभालते है।

इतिहास का एक पृष्ठ खोल कर देखा जाय। जिन दिनों इंग्लैंड पर जर्मनी की लगातार बमबारी हो रही थी तब वह देश बुरी तरह तहस नहस हो गया। आशा की कोई किरण दीख नहीं रही थी। उन दिनों तत्कालीन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल ने एक नया नारा दिया - “वी” फाँर विक्ट्री। विजय के सुनिश्चित विश्वास के प्रतीक “वी” अक्षर को दीवार पर, वाहनों पर, वस्तुओं पर, पोशाकों पर, पुस्तकों पर हर कही ‘वी’ अंकित किया गया ओर उस संकेत सत्र का अर्थ समझाया गया” विजय अर्थात् अन्ततः जीतना अपने को ही है इस हुँकार प्रभाव पड़ा। बाल वृद्ध सभी अपने स्तर के सृजन कार्या में असाधारण उत्साह के साथ जुट गए। फलतः न केवल पराजय विजय में बदली वरन् उस खंडहर देश को नए सिरे से, पहले से भी अधिक शानदार बना कर खड़ा कर दिया गया।

दार्शनिक मनुष्य को भटका हुआ देवता मनते और कहते हैं कि यदि वह अपनी शक्ति को पहचान ले ओर उसे उच्च प्रयोजनों में नियोजित करे तो नैपोलियन ही नहीं हर कोई अपने क्षेत्र में अपने कौशल का सर्व समर्थ बन सकता है। फिर असंभव कुछ रहेगा ही नहीं।

जामवंत के उद्बोधन से हनुमान को शक्तिबोध हुआ ओर समुद्र लांघने पर्वत उखाड़ने में वे सफल हो गये। कृष्ण के उद्बोधन ने अर्जुन से गाण्डीव उठवाया ओर थोड़े साधन रहते हुए भी महाभारत जीत दिखाया। चाणक्य, समर्थ, रामदास, रामकृष्ण परमहंस ने भी अपने शिष्यों में प्रेरणा भर के उन्हें चक्रवर्ती चन्द्रगुप्त, छत्रपति शिवाजी ओर भारतीय संस्कृति के विश्व विख्यात विवेकानन्द के रूप में ऐसा कुछ कर दिखाने में समर्थ बनाया जिसे कभी विस्मरण नहीं किया जा सकता। बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन प्रसिद्ध है। उनके एकाकी अग्रगमन ने लाखों धर्म प्रचारकों को विश्व के भावनात्मक काया कल्प में जुटाया था। गाँधी ने “करो या मरो” के नारे से जन-जन का खून खौलाया व सोये भारत को जगाया।

आज की घड़ी में समस्त विश्व के लिए विशेषतया भारत के नवीन अभ्युदय के लिए “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य” का नारा सर्वथा उपयुक्त एवं तथ्यपूर्ण है। इक्कीसवीं सदी के सम्बंध में भविष्य वक्ताओं, मनीषियों, दिव्यदर्शी एवं आकलन कर्ताओं, ने बहुत कुछ कहा है ओर बताया है कि अँधेरे का समापन ओर अभिनव प्रभात पर्व के अरुणोदय का यही सबसे महत्वपूर्ण अवसर है। इन दिनों सृजेता की ऐसी दिव्य प्रेरणा का अवतरण होगा जो जन-जन के मन मन में से निराशाजन्य अशक्ति को तो दूर करेगा ही ओर ऐसा उल्लास उमगायेगा कि उसके प्रभाव में हर किसी को उज्ज्वल भविष्य की संरचना में बढ़-चढ़ कर काम करने की प्रेरणा मिले। साहस ओर पराक्रम में सहारे बड़े से बड़े काम सम्पन्न होते रहे है। विश्व में दर्जनों राजक्रान्तियाँ सम्पन्न हुई। राजतंत्र का स्थान प्रजातंत्र ने ग्रहण किया। दास प्रथा मिटी, जमींदारों की सामन्ती सतत भूमिधर किसान के चरणों में आ गिरी। तो फिर वर्तमान की स्थिति बदल पाना क्यों सम्भव नहीं?

इसे एक संयोग या तथ्य ही कहना चाहिए कि इक्कीसवीं सदी में नवयुग के आगमन, नवसृजन ओर सर्वतोमुखी अभ्युदय की भविष्यवाणियाँ किन्हीं ज्योतिषी पंडितों ने नहीं वरन् ऐसे लोगों ने की है। जिन्हें अपने अपने क्षेत्र में अतीव प्रामाणिक माना जाता रहा है। फिर समय की माँग एवं परिवर्तन प्रक्रिया का सूक्ष्म अवलोकन करने से भी आभास मिलता है कि कठिनाइयों ओर विसंगतियों के दुर्दिन लद गए ओर अगला समय ऐसा आने वाला है जिसमें जिन संकटों संभावनाओं को अब तक असाधारण माना जाता रहा है। व लोक मानस के परिवर्तित प्रवाह में अशुभ आतंक से मुक्ति पा लेगी ओर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करेगी जो नये युग की नई संभावनाओं का अवतरण उद्भव करती चली जायेगी।

यह कार्य जन मानस के परिष्कार द्वारा सम्पन्न होगा। इसी का दूसरा नाम “विचार-क्रान्ति” दिया गया है। लोगों को अभ्यस्त अशुभ चिंतन से विरत होना पड़ेगा और ऐसी अन्तःस्फुरणा से प्रेरित होना पड़ेगा जो दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने के लिए जन जन को बिता करे। क्रिया कलापों, प्रचलन एवं प्रयासों में ऐसे तत्वों का समावेश करे जिसके आधार पर हर क्षेत्र में औचित्य अपनाया जाना दृष्टिगोचर होने लगे। मनः स्थिति ही परिस्थितियों को जन्म देती हे। यदि नये युग का अनुरूप विचार धारा को स्वीकार करने ओर औचित्य को कार्यान्वित करने के लिए उत्साह उमड़ पड़े तो कोई कारण नहीं कि सुखद परिस्थितियों का प्रादुर्भाव संभव हो न सके।

आवश्यकता इस बात कि है कि वर्तमान की विसंगतियों को बदलने ओर सुखद संभावनाओं के चल पड़ने की बात को एक सुनिश्चित संभावना की तरह लोक मानस में प्रतिष्ठित किया जाय। नव सृजन की रूपरेखा जन जन के सम्मुख प्रस्तुत की जाय ओर प्रतिभाओं के अग्रगमन से ऐसा माहौल बनाया जाय कि उसी राजमार्ग पर चल पड़ने की उत्कृष्ट अभिलाषा सर्व साधारण में जग पड़े।

दृष्टिगोचर हो रही अनेक अशुभ संभावनायें अचिन्त्य चिन्तन ओर अवाँछनीय गतिविधियाँ अपनाने से ही उत्पन्न हुई है। यदि इस प्रवाह को बदला जा सके तो उलटे को उलट देने पर सीधा बन जोन की उक्ति सुनिश्चित रूप से चरितार्थ होती दृष्टिगोचर होगी।

नवयुग का शुभारम्भ “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य” के उद्घोष के साथ किया जाना चाहिए। धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, आन्दोलनों के अपने अपने नारे होते है। समय की आवश्यकता यही है कि सतयुग की वापसी पर विश्वास किया जाय ओर नवसृजन के सर्वतोमुखी प्रयोजन में जुट पड़ने के लिए सर्व साधारण को कटिबद्ध किया जाय। इस महान आन्दोलन का यही प्राणवान उद्घोष होना चाहिए- “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य” यह नारा सर्वत्र अंकित एवं मुखरित होने लगेगा, इस उसका विश्वास दिन-दिन सुदृढ़ होता जाता है।

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