समझ से परे अनसुलझी गुत्थियां
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प्रकृति का दृश्य एवं परोक्ष लीला जगत ऐसी विलक्षणताओं से भरा पड़ा है जिन्हें देखकर कारण समझ में ने आने पर दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है। यही विश्वास सुदृढ़ होने लगता है कि विज्ञान की पहुँच से परे भी कोई विलक्षण सत्ता है जिसके क्रियाकलापों को अभी गहराई से जाना नहीं जा सका। वारमूडा त्रिकोण से तो सब भली−भांति परिचित है जो कि अमरीका के पूर्वी समुद्री हिस्से में स्थिति है, जहाँ अदृश्य, ब्रह्मांडीय चुम्बकीय शक्ति, वस्तु, जलयान, वायुयान को खिंचकर न जाने किस लोक में ले जाती है, जहाँ प्रवेश का कोई लौटकर नहीं आया। इसका अभी तक समाधान खोजा नहीं जा सका कि यह क्या होता है कि इसी बीच भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र से ऐसी ही रहस्यमयी घटनाएँ प्रकाश में आने लगी है।
जटिंगा (आसाम) जो पहाड़ों के बीच घाटियों में स्थित है, पिछले दिनों प्रकाश में समक्ष आत्म हत्या करने वाले पक्षियों की प्रति वर्ष विशिष्ट अवधि में होने वाली घटनाओं के कारण विज्ञान जगत में बहुचर्चित रही है। अनगिनत पंखी रात्रि के अंधेरे में आते है एवं जलते लैम्पों, लालटेनों, बल्ब आदि के सामने गिरकर दम तोड़ देते है, पर कोई समाधान न पा कर वैज्ञानिक मात्र तीर-तुक्का, अटकलें मात्र लगाकर अपना कौतूहल शान्त करते रहे है। अब पश्चिम बंगाल, आसाम, मेघालय, अरुणाचल वाले भारत के पूर्वांचल के इसी क्षेत्र से संबंधित कुछ ओर अद्भुत घटनाएँ प्रकाश में आयी है। वे भी उतनी ही विलक्षण तर्क बुद्धि की सीमा से परे है, जितनी कि वारमूडा त्रिकोण व जटिंगा क्षेत्र की घटनाएँ रही है।
अरुणाचल क्षेत्र में पिछले दिनों एक झील जो स्थानीय लोगों के लिए रहस्यों से भरी है, जन सामान्य की जानकारी में आई। इसके बारे में जनश्रुति है व देख हुआ तथ्य है कि वहाँ पहुँचने वालों में से कोई वापस लौटकर वापस नहीं आत, मनुष्य अथवा पशु-पक्षी ही क्यों न हो?
यह आश्चर्यजनक ओर जीवों को अपना ग्रास बनाने वाली झील अरुणाचल प्रात को चीन के यूनान प्रदेश से जोड़ने वाली स्टिलबसे रोड नामक प्रसिद्ध सड़क से कुछ फासले पर स्थित है जो पनासु के पास बर्मा की सीमा को भी स्पर्श करती है। यहाँ से देखने पर यह झील जो विशाल दलदल है।, घास के बड़े मैदान के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इस सुनसान क्षेत्र में एक भी पशु-पक्षी नजर नहीं आत। इस झील का पता तब चला जब द्वितीय विश्वयुद्ध के समय भारत ब्रिटेन तथा जापान के हजारों सैनिक अपने अस्त्र शस्त्रों सहित इस क्षेत्र में पहुँच कर विलुप्त हो गये ओर खोज बीन करने पर उनके पद चिन्ह तक ढूंढ़ने से भी नहीं मिले। हुआ यह था कि सड़क का निर्माण कार्य पूर्ण होते ही जापानियों ने असम पर आधिपत्य करने के उद्देश्य से बर्मा की की सीमा पर भारी सैन्य दल जमा कर लिया था। इधर ब्रिटिश सरकार ने इस आक्रमण को असफल बना देने की ठान रखी थी ओर अवसर पाते ही स्टिलबेस रोड से अंग्रेज ओर भारतीयों की मिलीजुली कई सैन्य बटालियनों को चीन ओर बर्मा की ओर भेज दिया। उधर से हार जीत का जब कोई संदेश न मिला तो ओर अधिक संख्या में सैन्य दल रवाना किया गया। परन्तु तब आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उनमें से एक भी जीवित व्यक्ति ने तो गन्तव्य स्थल पर पहुँचा ओर नहीं वापस लौटा। अधिकारियों ने बहुत ढूंढ़ खोज की तो पाया गया कि सभी सैनिक पनासु तक अवश्य पहुँची थी पर इसके आगे उनका क्या हुआ? वे कहाँ अदृश्य हो गये? इसका पता नहीं चल सका।
यही हश्र जापानी सैनिकों का भी हुआ। असम को जीतने का सपना लिए भारी तादाद में उनका सैन्य दल भारत की ओर बढ़ रहा था। रास्ते उनका प्रतिरोध करने वाला भी कोई नहीं था। अतः वे उसी सड़क से आगे बढ़ते गये। परन्तु यह क्या? जैसे ही वे उस दलदली झील के निकट पहुँचे। सभी को झील निगल गयी। जापान की कई सैन्य टुकड़ियां आई ओर आगे बढ़ने के प्रयास में झील में समाती चली गई।
आरम्भ में दोनों ही पक्षों को यह ज्ञात नहीं हो सका था कि उनके सैनिक कहाँ गायब हो जाते है? जब खोजी दलों ने गहन सर्वेक्षण किया तो मात्र इतना ही जाना जा सका कि पनासु सीमा तक दोनों ओर की सेनाएँ पहुँची थी पर आगे रहस्यमयी दलदल झील में जन जाने कहाँ खो गई? हवाई सर्वेक्षणकर्ताओं ने उस क्षेत्र के फोटो चित्र लेने के लिए अपने कैमरे संभाले ओर अनेकों बार उसे क्लिक भी किया। रील धुलकर जब आई तो पाया गया कि उस क्षेत्र के किसी भी कोने का कोई अंश उभरकर नहीं आया। चित्र खींचने के सभी प्रयास असफल रहे। कुछ अन्वेषकों का कहना है कि वह दलदल नहीं अपितु घास की सघन सतह से ढंका एक विशाल गढ्ढा है, तो कुछ उस क्षेत्र को अंतरिक्ष वासियों का एक सुरक्षित अड्डा मानते है जिसकी सुरक्षा व्यवस्था कुछ इस प्रकार से की जाती है कि वहाँ मनुष्य तो क्या परिंदे भी पास नहीं फटक पाते ओर यदि उस वर्जित क्षेत्र में किसी प्रकार प्रविष्ट कर ही जाएँ तो जीवित नहीं बचते। गायब हो जाते है। दलदल होने पर यह दलील तो समझ में आती है कि उसमें जाने अनजाने लोग पैर रख कर विलुप्त हो जाते है। पर पक्षियों का न होना, उस क्षेत्र का निर्जन होना, समझ में नहीं आता। कारण जो भी हो, आने को बुद्धिमान कहने ओर प्रकृति को वश में कर लेने का दम भरने वाला मनुष्य अभी तक उस प्राकृतिक झील का रहस्य समझ सकने में समर्थ नहीं हो सका। कोई भी वैज्ञानिक सर्वेक्षणकर्ता या अभियान दल अभी भी उस क्षेत्र में प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा पाता।
इसी तरह की कुछ रहस्यमयी झीलें विश्व के अन्यान्य भागों में भी पायी गयी है। वेस्टइंडीज के त्रिनिडाड द्वीप में एक ऐसी झील है जिसमें निर्मल जल की जगह तारकोल भरा हुआ है। यह पदार्थ सर्वत्र समान रूप से एक जैसा स्वरूप वाला न हो कर कही ठोस रूप में है तो कही तरल रूप में। कहीं कहीं इसमें बड़े बड़े बुलबुले उठते रहते है। इसमें भरे पदार्थ के आधार पर ही झील का नाम “तारकोल झील” पड़ गया। अमेरिका के रेगिस्तानी साबुन की झील कहते है। इसमें वस्त्र धोने पर उनमें उतनी चमक नहीं आती जितना कि सामान्य साबुन या वाशिंग सोडे से धोने पर। फिर भी उसमें उठने वाला झाग मानव निर्मित सभी डिटरजेंट साबुनों की अपेक्षा कही ज्यादा बना रहता है। हवाई द्वीप में एक आग की झील भी है जिससे सतत आग की लपटें ओर धुंआ बाहर निकलता रहता है। पर इन सबसे अद्भुत प्राकृतिक करिश्मा है - आयरलैण्ड की अनोखी -”पत्थर की झील” वैज्ञानिकों का कहना है कि उसमें जो भी वस्तु फेंकी या डाली जाती है वह पत्थर बन जाती है। विश्लेषण करने पर मात्र इतना ही ज्ञात हो सका है। कि उक्त झील में किसी भी पदार्थ की परत जम जाती हे। साथ ही अन्दर से भी वह वस्तु बहुत कुछ परिवर्तित हो जाती है। परन्तु ऐसा क्यों होता है? वैज्ञानिक इस रहस्य को अभी तक नहीं समझ पाये है। हिमालय के उत्तराखण्ड क्षेत्र में भी काफी ऊंचाई पर ऐसी अविज्ञात झीलें है जो रहस्यों के घेरे में है।
बादलों के टकराने-बिजली चमकने अथवा भूकम्प आने वे पूर्व तीव्र गर्जना की ध्वनि सुनाई देती है। इनसे उत्पन्न ध्वनि तरंगों को “शाँकवेव्स” के नाम से जाना जाता है, जिनके प्रघात से प्रतिवर्ष सहस्त्रों लोग अपनी जान गवाँ बैठते है। तोपों की गड़गड़ाहट एवं जेट विमानों का शोर भी मनुष्य द्वारा जान पहचाना है। किन्तु कभी कभी प्रकृति क अन्तराल से अथवा निर्मूल शून्य आकाश में उत्पन्न होने वाली विचित्र ध्वनियां या गड़गड़ाहट सुनाई देती है जिनका हम सही अर्थ नहीं समझ पाते। पश्चिम बंगाल के सुन्दरवाल से सटे बारीसाल क्षेत्र में सदियों से धाँय-धाँय के विस्फोट वहाँ के निवासी सुनते आ रहे हे। परन्तु इस की विस्तृत जानकारी लोगों को तब मिली जब सन् 1926 में अंग्रेज वैज्ञानिक जी.बी. स्काट ने उस क्षेत्र का दौरा किया और उस प्राकृतिक रहस्य का विवरण “नेचर “ नाम प्रसिद्ध आँग्ल विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित किया।
जी.बी. स्काट के अनुसार उस वक्त उस क्षेत्र में न तो कोई सैनिक छावनी थी, न दूर कही कोई सैनिक अभ्यास हो रहा था ओर नहीं लोगों के पास बन्दूक या तोपें थी, फिर भी तोप दागने की आवाज बराबर स्पष्ट सुनाई दे रही थी। उस समय रात को या दिन में कोई बादल भी नहीं थे। आसमान साफ था परन्तु यह स्पष्ट नहीं हो सका था परन्तु स्पष्ट नहीं हो सका कि धाँय धाँय की इस गर्जना भरी आवाज का मुख्य स्त्रोत क्या है? यह ध्वनियाँ किसी स्थान विशेष से उत्पन्न न होकर जहाँ तहाँ कहीं से भी फूट पड़ती है। इस संबंध में ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक ए.जी. इन्गलेस का कहना है कि इस प्रकार के रहस्यपूर्ण “एअरक्वेक” की दिशाएँ बदलती रहती है, जिस तरह इन्द्र-धनुष का मूल दिखता कहीं है ओर होता कहीं है। स्थान परिवर्तन के साथ ही दर्शक को दृश्य परिवर्तन का आभास जिस तरह उनमें होता हे, उसी तरह आवाजें भी दिशाओं में परिवर्तन करती अनुभव होती है। वानडेन ब्रुक जैसे वैज्ञानिकों का मत है कि वायुमण्डल में एक विशेष प्रकार के विद्युत प्रसार के एकत्र होने से इस तरह के वायु विस्फोट हो सकते है।
अमेरिका के अटलांटिक के उत्तर पूर्व में भी अस तरह की -”बुर्मीग-धाँय-धाँय करने वाली आवाजें सुनी गई है। सर्व प्रथम सन् 1988 में जब ऐसे विस्फोट सुने गये तो एकाएक लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि शून्य आकाश भी बिना बादलों के कभी गरज सकता है। पर्यवेक्षणकर्ताओं ने बताया कि उस मसय उक्त क्षेत्र में न तोपें चली थी और नहीं काकर्ड जेट विमान ही उड़े थे। कुछ वैज्ञानिकों ने इसे विशिष्ट प्रकार की हवा के घनत्व ओर तापमान के कारण उत्पन्न होने वाली सामान्य गड़गड़ाहट बताया ओर उसकी तुलना मृगमरीचिका से करते हुए इसे पवन मरीचिका नाम दिया है।
ये घटनाक्रम सतत घटित होते हरते है, पर कोई विज्ञान सम्मत कारण न मिलने पर अविज्ञात के गर्भ में छिपे पड़े रहते है। खोजी अन्वेषक सतत प्रयासरत है कि इन घटनाओं के मूल कारण को जाना जाय। यह प्रयास सराहनीय है व ये रहस्य मानवी जिजीविषा को एक चुनौती है। फिर भी एक तथ्य तो स्पष्ट है कि कि विराट के एक घटक प्रकृति को अभी पुरी तरह जान पाना सम्भव नहीं हो पाया है। यही हमें उस सत्ता के दर्शन होते है, जिसे अचिंत्य, अगोचर, अगम्य कहा गया है। परब्रह्म की सत्ता को इस रूप में भी मानते हुए आस्तिकता की अपनी मान्यताओं को परिपुष्ट परिपक्व बनाया जा सकता है। यह अंध विश्वास नहीं, वरन् जो कुछ दृश्यमान सत्य है, उसकी अनुभूति है कि यह सब उस परमसत्ता की विनिर्मित रचनाएँ है। जिसे हम आँखों से नहीं देख पाते। इसी भावना को आधार बनाकर रहस्यों की बारीकी में भी जा पाना सम्भव है।

