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Magazine - Year 1989 - Version 2

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रहस्यमयी अन्तः स्फुरणा

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समझा यह जाता है कि दूसरों से सीखने पर ही जानकारी मिलती या बढ़ती है। यह कथन आँशिक रूप से सही है क्योंकि विद्यालयों, अध्यापकों, अभिभावकों आदि के माध्यम से इसी आवश्यकता की पूर्ति की जाती है। परिभ्रमण प्रयोगशाला में परीक्षण आदि भी असीम निमित्त होते हे। यह सब कुछ सही होने पर भी इस तथ्य को भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि मनुष्य की रहस्यमयी शक्तियों में एक अन्तः स्फुरणा भी है। जिसके आधार पर कभी कभी किसी को भी अनायास ही ऐसी जानकारियाँ किल जाती है। जिनका कोई प्रत्यक्ष आधार न होते हुए भी अन्तराल के गहन स्त्रोतों से ऐसे संकेत मिलते हे। जो सच्चाई की कसौटी पर खरे उतरते हे ओर अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होते है। इतने पर भी इनकी व्याख्या विवेचना नहीं हो सकती कि अकस्मात् वह अनुभूति हुई कैसे व किस आधार पर?

आदिकाल में अग्नि का कही अता−पता न था। उसके प्रयोग कर सकने की तो सम्भावना थी ही नहीं, किन्तु एका एक किसी को सूझ पड़ा कि लकड़ियों के घिसने पर एक ऐसी शक्ति प्रकट हो सकती हे। जो प्रयोग अभ्यास कने पर काम में लाई जा सकती है। जिसे स्फुरणा हुई थी, उसको अपनी उमंग पर और असाधारण विश्वास था। प्रयोग में जुट पड़ा ओर फलतः अग्नि क प्रादुर्भाव हुआ। उससे शीत भगाने से लेकर भोजन पकाने आरे हिंसक पशुओं का डराने तक का काम लिया जाने लगा। आज वही अग्नि मानव जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बनकर रह गयी है।

कपास या ऊन को कात ओर उससे कपड़ा बुना जा सकता है, यह रहस्य सृष्टि के अनय किसी प्राणी को विदित नहीं है। मात्र मनुष्य ही ऐसा कर सकता हे। इस विज्ञान का आविर्भाव आरम्भ में अन्तः स्फुरणा क आधार पर ही हुआ होगा? अन्यथा उसे किसी अन्य से सीखने की सुविधा कहाँ से मिलती? भाषा का उच्चारण और लिपिका लेखन भी ऐसी ही अन्त स्फुरणा के साथ आरम्भ हुआ माना जा सकता है। विज्ञान की अभूतपूर्व समझी जाने वाली अनेकानेक धाराओं का आरम्भ इसी आधार पर सम्भव हुआ है। यही वह दिव्य उपलब्धि है। जो जिस किसी को भी किसी क्षेत्र में उपलब्ध हुई हैं उसे दृष्टा कहा गया हे। प्रचलन चल पड़ने पर उसमें सुधार विकास कर सकने की तो ढेरों गुँजाइश है। उसमें बुद्धि कौशल भी काम दे जाता है, पर जहाँ कोई पूर्व आधार या संकेत ही नहीं हो, वहाँ आकस्मिक या अप्रत्याशित सूझ का उभर पड़ना तो व्यक्ति, प्रकृति या दिव्य सत्ता की रहस्यमयी उपलब्धि ही कही जा सकती है, जो सामान्यजनों की पहुँच से बाहर होती है इसलिए ऐसा कुछ सामने आने पर आश्चर्य भी किया जाता है।

धर्म शास्त्रों के बारे में भी यही मान्यता है कि वे ईश्वर की वाणी के रूप म किसी व्यक्ति विशेष के माध्यम से प्रकट हुए है। इतिहास “अपौरुषेय” शब्द इसी संदर्भ में प्रभु के लिए व्यक्त किया जाता है।

“भविष्य कथन” इसी वर्ग में आता है। उसके उसी रूप में घटित होने पर यह मान्यता भी बन जाती है, यह तीर–तुक्का नहीं है। इसके पीछे कुछ न कुछ आधार होना चाहिए। जब चंद्रग्रहण ओर सूर्यग्रहण के समय ओर स्वरूप की भविष्यवाणी की जाने लगी तो उसके आधार पर ज्योतिष को सर्वसाधारण द्वारा मान्यता भी मिल गयी। भले ही वह खगोल विद्या का ग्रह गणित ही क्यों न हो, पर जिस भी आधार पर भविष्य बताया जा सकता है। उसे अद्भुत या देवी ही समझा गया।

अनुसंधानों ने यह बताया कि मनुष्य के अन्दर विलक्षणता भी है जो प्रत्यक्ष ही नहीं अप्रत्यक्ष को भी जान सकती है। ईश्वर, परलोक, देवता आदि क सम्बंध में भी बहुत कुछ कहा गया। भले ही आज उन प्रतिपादनों में से बहुतों की यथार्थता पर ही प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। सिद्ध पुरुषों के शाप वरदान ओर भावी सम्भावनाओं के सम्बंध में इसी आधार पर पूछताछ की जाती है। ज्योतिष का वर्तमान स्वरूप तो मात्र भविष्य कथन के साथ ही सम्बंध है।

इसी सदी के प्रारम्भ से मध्य तक अनेक लब्धप्रतिष्ठित लेखकों ने कितनी ही “युटोपियाए” प्रकाशित की है। जिनमें भविष्य में घटित होने वाली घटना क्रमों का अनुमान लगाया ओर ऐसी उपन्यास शैली में उल्लेख किया है। मानों कोई आँखें देखा या सुनिश्चित घटनाक्रम ही प्रस्तुत किया जा रहा हो।

अमेरिका के आँकलन विशेषा कार्ल साँगा तथा वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट के लसटर ई - ब्राउन ने अनेक विषयों पर उँगली उठाई है ओर भूतकाल में किये गये कार्या का परिणाम इन दिनों किस प्रकार प्रस्तुत हो रहा है, उसका सटीक वर्णन किया है। साथ ही अपनी इस चिन्तन पद्धति के आधार पर यह अनुमान लगाया है कि यदि प्रचलित क्रम यथावत बना रहा तो उसके भावी परिणाम क्या हो सकते है? यह कम्प्यूटर आधारित प्रक्रिया है। किन्तु प्रवाह एक रस ही बहता। उतार-चढ़ाव भी आते हे। किन्तु ऋतु प्रभाव से तूफान, बवण्डर, चक्रवात भी उठते रहते हैं, मानसून दिशा बदलते रहते हे। फलतः हवा के प्रवाह वर्षा के स्वरूप ओर परिणाम में अन्तर भी पड़ जाता है। ऐसी ही सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए वर्तमान के अवाँछनीय व्यवहार की प्रतिक्रिया की परिणतियाँ सुधार परिष्कार के रूप में दृष्टिगोचर होने का उल्लेख मनीषी द्वय कार्लसाँगा व लस्टर ई॰ ब्राउन ने किया हे। उनके अनुसार इक्कीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में ही उपयोगी, मानव मात्र के लिए कल्याणकारी परिवर्तन होने चाहिए।

एच.जी वेल्स ने विज्ञान की सामयिक प्रगति को देखते हुए “टाइम मशीन” एवं अपनी अन्य कृतियों में भावी सम्भावनाओं का स्वरूप प्रस्तुत किया था। इसी आधार पर आगे चलकर फ्रिटजाफ काप्रा एल्विन टॉफलर, मार्गेट मीड तथा हरमन काहन प्रभृति चिन्तकों ने भावी समस्याओं का समाधान विज्ञान के आधार पर खोजा। मिलती है। इनके अध्ययन के आधार पर भावी पीढ़ियों के सुखी-समुन्नत होने की संभावनाएं इक्कीसवीं सदी में ही प्रत्यक्ष होने की बात की गयी है। यह अन्तः स्फुरणा ही है जो चिन्तकों को भविष्य के विषय में चिन्तन करने व निर्धारण की प्रेरणा देती है।

उपरोक्त उल्लेखों में वैज्ञानिक प्रवाह को प्राथमिकता दी गयी हे। विज्ञान बुद्धि की उपज हे, बुद्धि की अवमानना नहीं की जा सकती। क्योंकि मनुष्य की लगभग सभी योजनाएं बुद्धि के आधार पर ही बनती है ओर प्रायः कल्पना एवं निर्धारण के अनुरूप सही भी बैठती है। इतने पर भी नाजुक विषयों का उद्गम केन्द्र अतीन्द्रिय क्षमता वाली”मेधा” की भूमिका कम नहीं होती। संसार की अति महत्वपूर्ण सम्भावनाओं का उद्भव इसी क्षेत्र से हुआ है। वैज्ञानिकों में से अधिकाँश को अपने आविष्कार की आरंभिक उमंग अन्तः प्रेरणा के आधार पर ही मिलती रही हे। इसी के सहारे लोग बढ़ते हुए वे ऐसे निर्माणों में सफल हुए है जिन्हें अभूतपूर्व और आश्चर्यजनक माना गया। ऐसे कई आविष्कार जो अन्तः स्फुरणा से उभरे व आगे चलकर लोकप्रिय हुए में राइट बंधुओं का वायुयान, गैल्वेनी द्वारा खोजी गयी विद्युतधारा, जीन बैपटिस्ट जाँली की डायक्लीनिंग मशीन, आथभर जील्टर की डीडीटी खोज लिथोग्राफी प्रिटिंग की जोआन, नेपोमक एलायज सेनेफेल्स् द्वारा आविष्कृत विधाओं का नाम लिया जा सकता है।

न केवल विज्ञान के सम्बंध में यह बात कही जा सकती हैं वरन् संसार के इतिहास में ऐसे प्रयासों की भी कम चर्चा नहीं है, जिसके सम्बंध में किसी पूर्व प्रचलन के अनुकरणों का कोई सहारा नहीं लिया गया, वरन् चिंतन विशेष को ऐसा कुछ सूझ पड़ा जो साधारणतया असम्भव ओर अटपटा लगता था, पर जब कल्पनाकार ने उसे आग्रह पूर्वक सम्भव माना ओर प्रयास को आगे बढ़ाने में सब कुछ झोंक दिया तो ऐसे साधन बनते चले गये जिनके आधार पर असम्भव कभी आगे चलकर सम्भव बनता चला गया। मिस्र का पिरामिड, चीन की दीवार, ताजमहल, कुतुबमीनार, पनामा नगर, स्वेज नहर, हालैंड द्वारा समुद्र में डुबा बड़ा इलाका छीनकर मनुष्यों के रहने लिए बनाया जाना, नोट करेंसी का प्रचलन, डाक व्यवस्था जैसी बातें जिन्हें सूझी, उनकी प्राथमिक स्फुरणा को अतीन्द्रिय क्षमता की देन कहा जा सकता है। सम्भवः धर्म, दर्शन, परलोक, ईश्वर, आदि के वर्तमान स्वरूप निर्धारणकर्ताओं को भी इन प्रतिपादनों के सम्बंध में अन्तः स्फुरणा ही मार्ग दर्शन करती रही हो।

व्यक्तिगत योजनाओं के सम्बंध में कुछ तो अनुभव अनुकरण काम देता है। कुछ इच्छा आवश्यकता नई सोच प्रदान करती है पर कुछ ऐसा भी होता है जिसे असाधारण सूझ बुझ का परिचायक कहा जा सकता है। उसे अतीन्द्रिय क्षमता के साथ जोड़ा जा सकता है।

आम लोग थोड़ी दूर का ही देख पाते है ओर कानों के लिए सुनना भी एक निकटवर्ती सीमा तक ही सम्भव होता है किन्तु कुछ के लिए अविज्ञात आधारों को अपनाने पर दूर दर्शन भी सम्भव हो जाता है। इतना ही नहीं भविष्य में क्या घटित होना चाहिए पर क्या होने जा रहा है? इसका अनुमान लगा लेना भी कठिन नहीं होता। ऐसे लोगों की इन दिनों यही मान्यता है कि अगला इक्कीसवीं वदी वाला समय उज्ज्वल भविष्य साथ लेकर आ रहा है। उसमें सतयुग की सौम्य परिस्थितियों का सुखद समावेश होगा। अतः स्फुरणा इन्हीं परिस्थितियों के संकेत दे रही हे।

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