है स्वर्ग यही अपवर्ग यही!
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कर्म के भले बुरे होने की पहचान आत्मबल सम्पन्न ही कर सकते हैं। उन्हें ही समग्र मनुष्य कहना चाहिए। जिनमें यह समग्रता उत्पन्न नहीं हुई है उन्हें नर पशु वर्ग में गिनना चाहिए। वन मानुषों की आकृति मनुष्यों से मिलती जुलती है। कितने ही प्राणी मनुष्यों जैसे शब्दों का उच्चारण कर लेते हैं। तोता मैना जैसे पक्षी और चिंपेंजी जैसे पशु मनुष्यों द्वारा बोले जाने वाले शब्दों की नकल कर लेते हैं। अनुकरण में बंदर अग्रणी है। वह दूसरों को जैसा कुछ करते देखता है वैसी ही नकल करने लगता है। इतने पर भी उन्हें मनुष्य संज्ञा में नहीं गिना जाता है।
मनुष्य काया में भी कई ऐसे हैं जिन्हें कर्म कुकर्मों का मध्यवर्ती अन्तर नहीं मालूम। मालूम भी है तो परिपालन में जिनकी निष्ठा नहीं। उन्हें जीवधारियों में तो गिना जा सकता है पर मानवी गरिमा को अपनाने वाले मनुष्यों में नहीं। ऐसे लोग हेय स्तर के हैं। उनके कर्म भी बालको जैसे होते हैं और उनके प्रतिफल भी क्षमा कर देने जैसे स्तर के। छोटे बालक माता के साथ सोते हुए भी मल मूत्र त्याग देते हैं। उनकी बड़ों जैसी भर्त्सना नहीं होती। कोई बड़ी आयु का व्यक्ति ऐसे अनुचित कर्म करे तो उसकी भर्त्सना भी की जायगी और प्रताड़ना भी दी जायगी। विवेकहीन मनुष्य भी इसी श्रेणी में आते हैं और चेतना की दृष्टि से गये बीते हुए भी। वे पशु प्रवृत्तियां अपनाने पर दण्डनीय नहीं माने जाते।
दण्ड पुरस्कार के योग्य मनुष्यों में वे ही माने जाते हैं जो आचार की दृष्टि से भले बुरे का अन्तर समझते है और उनका परिपालन करने पर दण्ड पुरस्कार का प्रतिफल समझते हैं। मानवी गरिमा का उत्तरदायित्व मिला और उसके निबाहने, न निबाहने का दण्ड पुरस्कार प्रकृति, ईश्वर या समाज की और से अवश्य मिलेगा।
मनुष्य अपने आप में औचित्य अनौचित्य के अन्तर को समझता है, साथ ही उन्हें अपनाने पर अपने भीतर जो प्रतिक्रिया होती हैं, वही विकसित चेतना की प्रतीक हैं। उसी स्तर की आत्मा अपने आप दण्ड पुरस्कार प्राप्त कर लेती है। आत्म प्रताड़ना और लोक भर्त्सना की पीड़ा उन्हें उतनी ही असह्य प्रतीत होती है जितनी किसी अविकसित को चाबुकों से पीटने की पीड़ा। इसी से उनके पुण्य परमार्थ के कारण दूसरों को जो सुख सुविधा बनती है उज्ज्वल भविष्य का आधार बनता है उसका परिणाम कर्ता को अधिक सुखद अनुभव होता है। जिन्हें प्रत्यक्ष लाभ है वे तो उस सुविधा को ही समझा पाते है किन्तु कर्ता को सत्कर्म करने से आत्मा में जो पवित्रता और प्रखरता का अंश बढ़ता है वह अपेक्षाकृत कहीं अधिक श्रेयस्कर होता है।
इस मिले हुए श्रेय के आधार पर महामानव, देवात्मा ऋषि, सिद्ध पुरुष बनने का अवसर मिलता है। सत्कर्म कर्ता इतने भर से यह अनुभव करता चलता है कि उसने स्वर्ग और मुक्ति जैसा प्रतिफल प्राप्त कर लिया है। स्वर्ग उच्चस्तरीय दृष्टिकोण को कहते हैं एवं मुक्ति भव बन्धनों से, हेय कर्मों से छुटकारा पा लेने वाली प्रवृत्ति को। ऐसे व्यक्ति नर होते हुए भी नारायण, पुरुष होते हुए भी पुरुषोत्तम कहलाते हैं। अपने आप को वे वैसा ही ऊँचा उठा हुआ अनुभव करते हैं। उनके द्वारा जो श्रेष्ठ कृतियाँ बन पड़ती हैं, वे कमल पुष्प की तरह महकती हैं और व्यक्ति अपने आप में आनन्द विभोर बना रहता है। दूसरे उनका अभिवंदन और अनुकरण करते हैं। आत्मिक क्षेत्र में विकसित मनुष्यों के लिए इतना उपहार परिपूर्ण संतोष दायक होता है।
ऐसे मनुष्य जाने अनजाने में किसी के साथ दुर्व्यवहार कर बैठते हैं तो उसका दुख उन्हें अपने निज के दुख से कही अधिक कष्ट कारक होता है। “आत्मवत् सर्वभूतेषु” की मान्यता अन्त करण में विकसित हो जाने पर किसी के साथ अन्याय बरतने का साहस ही नहीं पड़ता। भ्रम या आवेश में कुछ ऐसा बन भी पड़े तो उसे आन्तरिक पीड़ा तब तक सताती है, जब तक वह क्षति पूर्ति का प्रायश्चित नहीं कर लेता। इस स्थिति को नरक यातना से किसी भी प्रकार कम कष्ट ऽऽऽऽ नहीं मानते। क्योंकि अब न सही आगे चलकर दुष्कर्मों का प्रतिफल तो भुगतना पड़ेगा। जिनकी अन्तरात्मा जितनी विकसित है, उसी अनुपात में उन्हें शुभ अशुभ काम करने का आनन्द और कष्ट भी होता है। इतना ही नहीं इसी आधार पर उन्हें प्रगति शील बनने का अवसर मिलता है, जब कि ऽऽऽऽ कर्म बन पड़ने पर जन सहयोग और प्रगति का अवसर हाथ से निकल जाता है।
मनुष्य का चित ही पौराणिक चित्रगुप्त के बही खाते में सब भले बुरे कर्म लिखे जाते हैं और समयानुसार उनको दण्ड पुरस्कार मिलते हैं। यह अपना चित ही है, जिस पर टेप रिकार्डर के टेपों की तरह सब कुछ अंकित होता रहता है और समयानुसार उसका प्रतिफल सामने आता जाता है। यह स्वसंचालित प्रक्रिया हैं। इसके लिए अन्य किसी न्यायाधीश की आवश्यकता नहीं पड़ती।
विकसित मनुष्य में अपना शरीर और मन ही नहीं अपना समाज भी मिल जाता है। यही तीनों देवता है समाज गत दंड पुरस्कार भी शासन की ओर से मिलते हैं। इसीलिए व्यक्ति की तरह ही समाज को भी प्रबुद्ध एवं न्यायशील होना चाहिए। उसे कानून, सबूत, वकील जैसे जाल जंजाल में न फँस कर स्वयं अपनी ओर से प्रजाजनों के चरित्रों तथा कृत्यों का पता लगाना चाहिए। समाज भगवान का प्रतीक है। जिसे शासन द्वारा प्रताड़ित तिरस्कृत किया गया उसकी अप्रामाणिकता उन्नति के विकास के द्वार अवरुद्ध कर देती है और वह अपना स्तर गिरा कर पाप का समुचित दण्ड प्राप्त कर लेता है। जिसने सत्कर्म करके प्रशंसा पाई और जिसमें शासन ने कोई खोट नहीं ढूंढ़ा, वह व्यक्ति ईश्वरीय पुरस्कार का भागी बन गया।
भगवान को एक एक व्यक्ति के कर्म और स्तर का लेखा जोखा रखने और तदनुरूप स्वर्ग नरक में भेजने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उनका बनाया स्वसंचालित तंत्र ही ऐसा समर्थ है, जिसके अनुसार हर व्यक्ति अपने कृत्य एवं स्तर के अनुरूप अपनी अन्तरात्मा-समाज तथा शासन द्वारा दण्ड पुरस्कार प्राप्त करता रहता है।
दुष्प्रवृत्तियां मनः क्षेत्र में एक प्रकार का कुहराम मचाये रहती हैं। फलतः अन्तराल में ऐसी विपन्नता छाई रहती है जो शारीरिक और मानसिक रोगों का सृजन करती रहे और उस आधार पर व्यक्ति हाथों हाथ दण्ड पुरस्कार प्राप्त करता रहे। शरीर की विधि व्यवस्था मात्र रक्त माँस से ही नहीं चलती। उसका सूत्र संचालन करने वाले प्राण शक्ति का उद्गम मस्तिष्क में रहता हैं। अवाँछनीय कृत्यों द्वारा यह मस्तिष्कीय चेतना विकृत स्तर की बनती है। फलतः अनेकों रोग उठ खड़े होते हैं और वे साधारण दवा दारु से भी अच्छे नहीं होते। यह प्रत्यक्ष दण्ड व्यवस्था है।
जिसे सत्कर्म करने, सद्भाव एवं सज्जनतापूर्ण व्यवहार का अभ्यास रहता है, उसकी प्राण चेतना में प्रगतिशील तत्व भरे रहते हैं। अतएव उनके गुण, कर्म, स्वभाव में ऐसे तत्वों का बाहुल्य रहता है, जिसके सहारे मन प्रसन्न रहे। उत्साह, साहस और परमार्थ भरी उमंगों की कमी न पड़े। ऐसे व्यक्ति सर्वोपयोगी योजनाएँ बनाते हैं और आपके आत्मबल के सहारे उन्हें पूरी कर गुजरते हैं। जिस व्यक्तित्व का पर्यवेक्षण करने से अनेकों का उत्साह बड़े, अनेकों सन्मार्ग पर चलें, अनेकों अपनी कुचाल का परित्याग करें, समझना चाहिए कि वह मनुष्य से ऊँचा उठ कर देव श्रेणी में गिना जाने योग्य हो गया। देवता पारस पत्थर के समान होते हैं जो भी संपर्क में आता है वह सोने का बन जाता हैं। जिनने अपने जीवन में ऐसी विभूतियाँ अर्जित करली, उनका जीवन हर दृष्टि से धन्य ही माना जाता है। वे देव मानव, ऋषि बन जाते हैं। भूसुर कहलाते हैं। वे स्वर्ग स्तर का जीवन यहीं जीते हैं यही मुक्ति पाते हैं।

