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Magazine - Year 1989 - Version 2

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अपूर्णता से पूर्णता की ओर

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मानवी जीवन में गतिशीलता और दिशा का बड़ा महत्व है। यदि मनुष्य समय की रफ्तार के साथ-साथ नहीं चले, तो वह विकास की दौड़ में पीछे रह जायेगा ओर पिछड़ा कहलायेगा। इसी प्रकार जीवन की कोई दिशा नहीं हुई, तो वह प्रगति अंधी दौड़ के समान होगी ओर प्राण संकट खड़े करेगी। अतः विकास क साथ-साथ प्राण-रक्षा भी होती रहें, इसके लिए जीवन में गति और दिशा दोनों का होना नितान्त आवश्यक है।

मनुष्य को गति विज्ञान से मिलती है, जब कि धर्म उसे दिशा प्रदान करता है। विज्ञान की स्थिति अब अत्यन्त उन्नत हो चली है। पिछले समय की अपेक्षा आज हमें जो साधन-सुविधाएँ प्राप्त हैं, उस में मुख्य भूमिका विज्ञान के उत्कर्ष की ही रही है। पिछले सौ वर्षों में विज्ञान का जितना विकास हुआ है, उसने हमें भौतिक सम्पन्नता की दृष्टि से कई दशक आगे पहुँचा दिया है। नित नई खोजों और शोधों ने हमें जितना कुछ दिया है, उससे सारी दुनिया एक कमरे तक में सिमट गई है। घर बैठे ही हम देश-विदेश के समाचार क्षण मात्र में जान लेते है। पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर की दूरी भी सिकुड़ कर न्यून हो गई है। कुछ ही घंटों में हम एक- देश से दूसरे देश की यात्रा कर लेते है। इतना ही नहीं, ग्रह नक्षत्रों की स्थिति परिस्थिति भी अब हमसे अज्ञात नहीं रही। निरन्तर परीक्षण - पर्यवेक्षण के आधार पर उनके सारे रहस्यों का पता लगा कर विज्ञान ने खगोल जगत में भी अपना वर्चस्व स्थापित किया है और अब उन में बस्ती बसाने की बात सोच रहा हे। इससे आगे एक कदम तब और बढ़ गया, जब उसने मानव का विकल्प यंत्र मानव निर्माण किया एवं उसमें बुद्धि का समावेश किया। निश्चय ही इन्हें विज्ञान के वरदान कहा जा सकता है और उसका यह प्रयास सराहनीय व लाभकारी भी है। पर पिछले दिनों उसने मनुष्य और समाज का जो अहित किया,वह भी नहीं भुलाया जा सकता है। अस्त्र-शस्त्रों की होड़ से जो संकट उत्पन्न हुआ है,उसने संपूर्ण संसार को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया और मनुष्य जाति के अस्तित्व के आगे प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।

दूसरी ओर धर्म और अध्याय की अवगति होती चली गई। कभी ऋषि काल में इनकी तूती बोलती थी, मगर अब यह प्राणहीन कलेवर जैसी स्थिति में यह गये हैं, तब धर्म को जीवन का प्रमुख अंग माना जाता था और सारी रीति-नीति इसी के आधार पर निर्धारित की जाती थी। चाहे युद्ध क्षेत्र हो य कर्मक्षेत्र, मनुष्य हो या अन्य प्राणी,स्वजन अथवा दुर्जन,सर्वत्र धर्म भावना का परिचय देकर अपने उच्च मानदण्डों को प्रतिष्ठित रखने में गौरव अनुभव किया जाता था। स्वार्थ की तुलना में परमार्थ को अधिक महत्व मिलता और अधिसंख्यक ऐसे कार्या में निरत रहते, जिससे समाज और समुदाय का अधिक कल्याण हो। अपने और पराये जैसी भेद-भाव की दृष्टि नहीं थी। सबों को समान भाव से देखा जाता ओर अपने वृहद कुटुम्ब को सदस्य माना जाता, पर आज स्थिति उससे सर्वथा भिन्न है। न तो अब लोगों में वह धर्म भावना रही और न जीवन के वह नीति-नियम समाज-सेवा के प्रति न तो पहले जैसा उत्साह रहा। अभिरुचि आज का सर्वोपरि धर्म व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि माना जाने लगा है।

ऐसी स्थिति में किसी एक का अवलम्बन लेकर हम जीवन को सफल समुन्नत नहीं बना सकते। विज्ञान के एकाँगी विकास ने भौतिक सम्पन्नता तो बढ़ायी है पर इसके विपरीत दिनों दिन धर्म के अभाव में हम आत्मिक दृष्टि से विपन्न बनते चले गये। इसके अतिरिक्त समय के साथ-साथ दोनों में अनेकानेक प्रकार की त्रुटियां घुस पड़ीं। अस्तु दोनों में से किसी की भी स्थिति आज ऐसी नहीं, जो हमें मार्ग दर्शन दे सके और जिसके एकल अवलम्बन द्वारा हम आगे बढ़ सकें प्रगति करें और लक्ष्य तक पहुँचे। धर्म के पास दिशा है, पर गति नहीं, जब कि विज्ञान के पास गति है किन्तु दिशा नहीं। सफलता और प्रगतिशीलता के लिए जीवन में इन दोनों तत्वों का समावेश होना अत्यावश्यक है। गति हो तो जड़ता आयेगी और दिशाहीन गतिशीलता जीवन संकट खड़े करेगी। अतः जीवन में धर्म और विज्ञान का संतुलित समन्वय आज की सर्वोपरि आवश्यकता है जिसे हर हालत में पूरा किया जाना चाहिए, तभी हम भौतिक और आत्मिक दोनों दृष्टि से सफल हो सकेंगे।

वैसे तो विज्ञान का मोटा अर्थ मशीन अथवा कल कारखाने से लगाया जाता है, पर इसका तात्त्विक अर्थ कुछ और है, विज्ञान कहते हैं-प्रगतिशीलता को वैज्ञानिक दृष्टिकोण को। हम जो सोचें, जो भी करें, उसमें वैज्ञानिकता का समावेश हो, कथन और कर्तव्य की प्रामाणिकता है। आज इसकी उपयोगिता उपादेयता इसलिए भी महसूस की जा रही है, क्योंकि वर्तमान समाज कुप्रथाओं और कुप्रचलनों से ग्रस्त हो कर जर्जरित हो चला हैं, जिससे उसकी उन्नति-प्रगति में एक प्रकार का ठहराव आ गया है।उसके इस रुग्णावस्था से मुक्तकर स्वस्थ-समुन्नत बनाना, इसकी जिम्मेदारी विज्ञान की है। विज्ञान ही इस कार्य को भली-भाँति सम्पन्न कर सकता है।

धर्म-नीति, नियम, और आदर्शों के परिपालन को कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे कर्तव्य परायणता भी कहा गया है। हम परिवार समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझें और निष्ठापूर्वक उसका निर्वाह करें-धर्म की यही शिक्षा है। वह हमें सदाचरण सिखाता और दुराचरण पर अंकुश लगाता है। चिन्तन चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता आदर्शवादिता और शालीनता धर्म की देन है। इसी के कारण मनुष्य मर्यादाओं में बँधा रहता और मानव होने का गौरव प्राप्त करता है। वह जब भी नीति निष्ठा की मर्यादाओं का परित्याग कर वर्जनाएँ अपनाता है, मनुष्य कहलाने का श्रेय सम्मान गवाँ बैठता है। इसी से व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन और सामाजिक जीवन में लोकश्रद्धा का सुयोग मिल पाता है। यह धर्म ही है, जो विज्ञान के कुतर्कों को अपनी आदर्शनिष्ठा की कसौटी पर कस कर उसे निरस्त करता और अभिनव मार्गदर्शन मार्गदर्शन देता है।

इस दृष्टि से भी धर्म और विज्ञान के समन्वय को आज अति महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनकी जोड़ी वही भूमिका सम्पन्न करती है जो बैल और गाड़ी का युग्म। बैल दिशा प्रदान करते हैं और गति पहियों की होती है। दोनों को यदि एक दूसरे से पृथक कर दिया जाय जो मूल प्रयोजन ही पूरा न हो सकेगा और वे स्वयं भी अधूरे बने रहेंगे। तब न तो गाड़ी अपनी जिम्मेदारी निभा सकेगी न बैल अपना कर्त्तव्य पूरा कर सकेंगे। गाड़ी की जिम्मेदारी है- सामान ढोना, उसे गति प्रदान करना एवं बैल का कर्त्तव्य है- उस दायित्व को पूरा करना, गाड़ी की मदद करना तथा उसे दिशा निर्देश देना। यह प्रयोजन दोनों के साथ रहने से ही सध सकता हे।

ऐसा ही युग्म धर्म और विज्ञान भी बनाते हैं। उनकी पृथक कल्पना नहीं की जा सकती। वस्तुतः वे एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना

दूसरे की गति प्रगति संभव नहीं है। दिशा के बिना गति शक्य नहीं है और गति के बिना दिशा की सार्थकता नहीं है। दोनों के मिलने से ही समग्रता आती है। इसीलिए जीवन में दोनों की आवश्यकता पर बल देते हुए विश्व विख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने कहा था कि-धर्म के बिना विज्ञान अंधा है और विज्ञान के बिना धर्म लंगड़ा परस्पर उनके मिलन से ही अंधे-पंगे की जोड़ी बन कर संकट से उबरने जैसा सुयोग बन सकता है।

अस्तु दोनों के बीच पारस्परिक संतुलन और जीवन में उनके धारण से ही हमारी प्रगति संभव है। पृथक-पृथक दोनों में वह सामर्थ्य नहीं कि हमें उन्नति के मार्ग पर अग्रसर कर सकें। विज्ञान का मार्ग विनाशकारी हो चला है और धर्म में रूढ़ियों अवांछनियताओं के घुस पड़ने से वह विकृत हो।

गया है। विज्ञान हमें विनाश का रास्ता दिखाता है और धर्म अध्यात्म का वर्तमान स्वरूप प्रतिगामी बनने के लिए बाधित करता है। इस स्थिति से हम तभी उबर सकते हैं,जब दोनों को साथ ले कर चलें। एक पर दूसरे का नियंत्रण रहने से ही उन्नति-प्रगति ठीक हो पाती है। विज्ञान हमें गति दे तो धर्म दिशा दिखाये। विज्ञान की निरंकुशता पर अध्यात्म का अंकुश लगे और तथा कथित धर्म अध्यात्म की मूढ़ताजन्य अपंगता को विज्ञान की बैसाखी प्राप्त हो। इस प्रकार जीवन में दोनों के अवधारण से ही उनकी स्वयं की सार्थकता और मनुष्य की सफलता संभव हो पाती है। अतः मानवी व्यक्तित्व में दोनों के समन्वय को स्थान मिलना ही चाहिए।

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