• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • चैतन्यता की गंगोत्री-गायत्री
    • विषय-सूची
    • पगडण्डियों में न भटकें
    • भविष्य का अनुमान सम्भव भी, अनिवार्य भी
    • परम्परा (Kahani)
    • रहस्यमयी अन्तः स्फुरणा
    • मीरा (Kahani)
    • इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य
    • ईश्वर चन्द्र विद्यासागर (Kahani)
    • समझ से परे अनसुलझी गुत्थियां
    • निष्काम लोग ही सुखी (Kahani)
    • विराट् सत्ता की दर्शन झाँकी
    • Quotation
    • लय, ताल से बँधी जीवन की यह यात्रा
    • संसार में विग्रह कांटों की तरह है (Kahani)
    • सत्य, हमारे आचरण में उतरे
    • मानवी पुरुषार्थ को चुनौती देता प्रकृति का लीला जगत
    • Quotation
    • अपूर्णता से पूर्णता की ओर
    • साहसी बेनिट (Kahani)
    • समष्टिगत हलचलें एवं मानवी पराक्रम
    • कौआ (Kahani)
    • चेतना के महासागर में तैरती मानवी काया
    • दुष्ट की मित्रता (Kahani)
    • बहिरंग नहीं अन्तरंग प्रधान
    • Quotation
    • है स्वर्ग यही अपवर्ग यही!
    • ईमानदारी का फल (Kahani)
    • जिस मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द
    • प्रसन्नता और निश्चिंतता (Kahani)
    • अध्यात्म का ककहरा है - अनुशासन
    • संतोष के पर्याप्त आधार (Kahani)
    • अमृत रसास्वादन हेतु एक उच्चस्तरीय योगाभ्यास
    • नरक की स्थिति स्वर्ग के समतुल्य (Kahani)
    • रंगों में निहित रोग निवारक-शक्ति
    • सच्चे देश-भक्त भामाशाह (kahani)
    • कण-कण में बसी है चेतना
    • लोलुपता (kahani)
    • जीवन पर मलीनताओं का खोल (Kahani)
    • आधुनिकता के अभिशाप-तनावजन्य विकार
    • जीवन एक सतत अविराम-प्रवाह
    • चम्पत हो गया (Kahani)
    • भक्ति-भावना इस प्रकार चरितार्थ करें!
    • पेशवाओं के राजगुरु (Kahani)
    • श्रेष्ठतम सेवा-पतन निवारण
    • साहसिकता के बल बूते (Kahani)
    • अन्ततः सत्य ही जीतता है।
    • नई डगर, नया सफर, नौनिहाल अग्रसर!अग्रसर!!
    • अपनों से अपनी बात - सत्रों में सम्मिलित होने का सुयोग चूकें नहीं!
    • भगवान का पद (Kahani)
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1989 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
SCAN TEXT


जिस मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 27 29 Last
जिंदगी का सबसे बड़ा सत्य है- मृत्यु। मरने के पश्चात् जीवन क्या होगा? क्या नहीं होगा? कुछ भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता है पर मृत्यु अवश्य होगी। यह एक ऐसी घटना है जिसकी अनिवार्यता सुनिश्चित है। अन्य घटनाओं की सम्भावनाओं को टाल पाना भी शायद संभव बन पड़े। पर इसको टालना किसी के लिए किसी भी तरह संभव नहीं।

अस तथ्य से सभी सुपरिचित हैं फिर भी जाने का, काया को छोड़ने का भय लोगों को कँपा देता है। जितना भय मरने से होता है उतना शायद किसी से भी नहीं। इसके प्रमुख कारणों में से एक वह भी है कि मरने से अस्तित्व का नष्ट होना मान लिया जाता है, जब कि वास्तविकता ऐसी नहीं है। भारतीय दर्शन मृत्यु को आत्मा का देह परिवर्तन मात्र मानता है। पुराने कपड़े उतार कर नये कपड़े पहनने की तरह आत्मा पुराना जीर्ण शीर्ण शरीर छोड़ कर नया शरीर धारण करती है। यह तथ्य दार्शनिक ही नहीं, अपितु विज्ञान सम्मत भी है।

तुरन्त देह धारण न करने की स्थिति में आत्मा सूक्ष्म लोकों में निवास भी करती है। रामकृष्ण लीला प्रसंग कं रचनाकार तथा उनके ही शिष्य स्वामी सारदानंद ने एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा है “परमहंसदेव की मृत्यु के बाद माँ शारदा बहुत दुखी हुई उनके दुख को शाँत करने के लिए राम कृष्ण ने उनके समक्ष सूक्ष्म ज्योतिर्मय शरीर से प्रकट हो कर कहा चिन्ता क्यों करती हो? मैं मरा कहाँ बस एक कमरे से दूसरे कमरे में आया हूँ और कुछ नहीं” निश्चित ही मृत्यु ऐसी ही है।

मरने से भयभीत होने का अन्य कारण है कि लोग मृत्यु को बहुत ही यंत्रणादायक एक दुःखदायी प्रक्रिया मानते है। समझा जाता है कि मरने के समय भयंकर वेदना होती है। तथ्यों का अन्वेषण करने पर यह धारण भी निर्मूल सिद्ध हुई हैं। वैज्ञानिकों ने एकत्र किए गये तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि यह धारणा गलत है। यह तथ्य उन घटनाओं का संकलन है जिन में व्यक्ति आकस्मिक मृत्युँ को प्राप्त हुए एवं पुनः जीवित हो गये या जिनकी थोड़े समय के लिए मृत्यु हुई थी।

इस विषय पर तमाम पुस्तकें भी लिखी गई हैं जिस में एक है-”जौन वेस्ट” जिस के रचयिता हैं-एस॰ एस॰ वार्ड उन्होंने अपने शोध अध्ययन का आधार उन व्यक्तियों को चुना है जो थोड़े समय के लिए मरे थे। घटनाओं की इसी श्रृंखला में एक व्यक्ति की घटना को उसी के शब्दों में वर्णन करते हुए कहा है-”मृत्यु के आगमन पर मुझे एक बोझ सा अनुभव होने लगा। धीरे-धीरे ऐसा लगा कि बोझ खिसकता जा रहा है। कुछ ऐसी अनुभूति थी जैसे हाथ को दस्ताने से खींचा जा रहा हो। अंधकार जो पहले गहन था बाद में समाप्त हो गया। अब मैं बिल्कुल मुक्त था और अपने शरीर को विस्तर पर पड़े देख रहा था। उस समय का संस्मरण याद है जब किसी ने कहा अब यह चला गया। बाद में कमरा एवं अन्य वस्तुएँ लुप्त होती गई और तब मैं खूब सूरत दुनिया में था।

ऐसी ही घटनाओं का अध्ययन “डेथ एन इन्टरेस्टिंग जर्नी “ नामक पुस्तक में शो एन्विन ने किया है। उन्होंने व्यापक छान-बीन एवं जाँच पड़ताल के आधार पर इस पुस्तक की रचना की है इस में उन्होंने स्पष्ट किया है कि मृत्यु के समय घटना बहुत तेज घटती है एवं जीवात्मा एक ऐसी दुनियाँ में प्रवेश करती है जहाँ बहुत तेज कंपन होते हैं। मृत्यु के समय होने वाले अनुभवों का आधार अपना अपना विश्वास होता है किन्तु यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जीवात्मा की चेतना शरीर चेतना बोध शक्ति से बहुत सूक्ष्म एवं आगे होती है। इसलिए वह पुराने मकान को छोड़ने के लिए पहले से ही तैयार रहती है। यहाँ तक कि दुर्घटना घटने की स्थिति में जीवात्मा पहले ही शरीर को छोड़ देती है। इसी कारण इस तरह मरने वाले व्यक्तियों को अपने शरीर के चोट का टूट−फूट का ना तो भान होता है और न हों किसी प्रकार की पीड़ा होती है।

आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त हुए व्यक्तियों को इस लिए भी पीड़ा की अनुभूति नहीं होती क्योंकि उनकी जीवात्मा पहले ही शरीर छोड़ चुकी होती है। उदाहरण के तौर पर एक सैनिक को, जिसे युद्ध भूमि में लड़ते हुए मस्तिष्क में गोली लगती हे कुछ अनुभव नहीं होता बल्कि वह पूरे होश में देख पाता है कि एक क्षण पूर्व वह क्या था,यद्यपि स तरह की घटनायें बाह्य दृष्टि से बड़ी दर्दनाक एवं कारुणिक दिखती है किंतु जो मर जाते हैं उनके लिए मृत्यु कोई विस्मय कारक घटना नहीं होती।

उक्त पुस्तक में वर्णित एक अन्य विवरण के अनुसार स्विट्जरलैंड निवासी जैसोन एक बार बर्फीले तूफान में भटक गये। वहाँ उनकी प्राणाँत जैसी स्थिति हो गयी। बाद में जब उन्हें ढूंढ़ा गया और चिकित्सा उपचार से वह सौभाग्य से पुनर्जीवित हो गये तो उन्होंने बताया कि-मैं मार्ग की तलाश में कई घंटे तक भटकता रहा जब मार्ग नहीं मिला तो थक कर गिर पड़ा इसके बाद होश नहीं रहा। केवल इतना याद है कि में उस अवस्था में बहुत सुख एवं आनंद अनुभव कर रहा था।

मृत्यु के संबंध में जितने भी लोगों को अनुभव करने का अवसर मिला है या जिन व्यक्तियों ने भी इस तरह के विवरण या दुष्टाँव संकलित किये हैं, उन सभी का यही मंतव्य है कि मृत्यु कोई दुखद घटना नहीं है।

इसी तरह का प्रतिपादन स्वामी अभेदानंद ने अपने ग्रन्थ “लाइफ आफ्टर डेथ” में किया है। उन्होंने अपने गहन अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि मृत्यु दुखद के स्थान पर सुखद ही है क्योंकि पुराने शरीर के स्थान पर नवीन शरीर धारण करने का सुअवसर मिलता है जिस पर जीर्ण वस्त्र के स्थान पर नवीन वस्त्र धारण करने पर लोगों को प्रसन्नता होती है। उसी तरह उससे भी अनन्त गुनी प्रसन्नता जीवात्मा को नया शरीर पाने पर होती है।

दुःख की उत्पत्ति का एक मात्र कारण”आसक्ति ही हे वह चाहे शरीर से हो या कुटुम्बियों से जिसने इस आसक्ति पर विजय पाली वह कबीर की ही तरह मस्ती में गाता है”जिस मरने से जग डरे, मेरे आनंद “ गीता में में भी यही तत्व दर्शन समझाया गया है-” जिस प्रकार जीवात्मा इस शरीर में रहते हुए युवा एवं जरावस्था के परिवर्तन को प्राप्त होता है उसी प्रकार देह परिवर्तन भी है इससे धीर पुरुष मोह ग्रस्त, भयभीत नहीं होते।”

इस तत्व दर्शन को गम कर लेने पर मृत्यु एक सुखद यात्रा भर लगती है। इससे भयभीत होने का न तो कोई कारण है न औचित्य

First 27 29 Last


Other Version of this book



Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • चैतन्यता की गंगोत्री-गायत्री
  • विषय-सूची
  • पगडण्डियों में न भटकें
  • भविष्य का अनुमान सम्भव भी, अनिवार्य भी
  • परम्परा (Kahani)
  • रहस्यमयी अन्तः स्फुरणा
  • मीरा (Kahani)
  • इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य
  • ईश्वर चन्द्र विद्यासागर (Kahani)
  • समझ से परे अनसुलझी गुत्थियां
  • निष्काम लोग ही सुखी (Kahani)
  • विराट् सत्ता की दर्शन झाँकी
  • Quotation
  • लय, ताल से बँधी जीवन की यह यात्रा
  • संसार में विग्रह कांटों की तरह है (Kahani)
  • सत्य, हमारे आचरण में उतरे
  • मानवी पुरुषार्थ को चुनौती देता प्रकृति का लीला जगत
  • Quotation
  • अपूर्णता से पूर्णता की ओर
  • साहसी बेनिट (Kahani)
  • समष्टिगत हलचलें एवं मानवी पराक्रम
  • कौआ (Kahani)
  • चेतना के महासागर में तैरती मानवी काया
  • दुष्ट की मित्रता (Kahani)
  • बहिरंग नहीं अन्तरंग प्रधान
  • Quotation
  • है स्वर्ग यही अपवर्ग यही!
  • ईमानदारी का फल (Kahani)
  • जिस मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द
  • प्रसन्नता और निश्चिंतता (Kahani)
  • अध्यात्म का ककहरा है - अनुशासन
  • संतोष के पर्याप्त आधार (Kahani)
  • अमृत रसास्वादन हेतु एक उच्चस्तरीय योगाभ्यास
  • नरक की स्थिति स्वर्ग के समतुल्य (Kahani)
  • रंगों में निहित रोग निवारक-शक्ति
  • सच्चे देश-भक्त भामाशाह (kahani)
  • कण-कण में बसी है चेतना
  • लोलुपता (kahani)
  • जीवन पर मलीनताओं का खोल (Kahani)
  • आधुनिकता के अभिशाप-तनावजन्य विकार
  • जीवन एक सतत अविराम-प्रवाह
  • चम्पत हो गया (Kahani)
  • भक्ति-भावना इस प्रकार चरितार्थ करें!
  • पेशवाओं के राजगुरु (Kahani)
  • श्रेष्ठतम सेवा-पतन निवारण
  • साहसिकता के बल बूते (Kahani)
  • अन्ततः सत्य ही जीतता है।
  • नई डगर, नया सफर, नौनिहाल अग्रसर!अग्रसर!!
  • अपनों से अपनी बात - सत्रों में सम्मिलित होने का सुयोग चूकें नहीं!
  • भगवान का पद (Kahani)
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj