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Magazine - Year 1989 - Version 2

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शारीरिक स्वस्थता के तीन चिन्ह :- (1) खुलकर भूख, (2) गहरी नींद (3) काम करने के लिए स्फूर्ति। आत्मिक समर्थता के भी तीन चिन्ह हैं - (1) चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश, (2) चरित्र में निष्ठा और (3) व्यवहार में पुण्य परमार्थ के पुरुषार्थ की प्रचुरता। इन्हीं को उपासना साधना और आराधना कहते हैं। आत्मिक प्रगति का लक्षण है मनुष्य में देवत्व का अभिवर्धन। देवता देने वाले को कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे धर्म धारणा या सेवा साधना भी कह सकते हैं। व्यक्तित्व में शालीनता उभरेगी तो निश्चित रूप से सेवा की ललक उठेगी। सेवा साधना से गुण, कर्म, स्वभाव में सदाशयता उभरेगी तो परमार्थरत हुए बिना रहा नहीं जा सकेगा। पृथ्वी पर मनुष्य शरीर में निवास करने वाले देवताओं को भूसुर कहते हैं। यह साधु और ब्राह्मण वर्ग के लिए प्रयुक्त होता है। ब्राह्मण एक सीमित क्षेत्र में परमार्थरत रहते हैं। और साधु परिव्राजक के रूप में सत्प्रवृत्ति संवर्धन का उद्देश्य लेकर जहाँ आवश्यकता है वहाँ पहुँचते रहते हैं। उनकी गतिविधियाँ पवन की तरह प्राण प्रवाह बिखेरती हैं। बादलों की तरह बरस कर हरीतिमा उत्पन्न करती हैं। आत्मिक प्रगति से कोई लाभान्वित हुआ या नहीं, उसकी पहचान इन्हीं दो कसौटियों पर होती हैं कि चिन्तन और चरित्र में मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता दृष्टिगोचर होती है या नहीं। साथ ही परमार्थ परायणता की ललक कार्यान्वित होती है या नहीं।

मोटे तौर पर दान पुण्य को परमार्थ कहते हैं। पर इसमें विचारशीलता का गहरा पुट रहना आवश्यक है। दुर्घटना ग्रस्त, आकस्मिक संकटों में फँसे हुओं को तात्कालिक सहायता आवश्यक होती है। इसी प्रकार अपंग, असमर्थों को भी निर्वाह मिलना चाहिएं। इसके अतिरिक्त अभाव ग्रस्तों, पिछड़े हुओं की ऐसी परोक्ष सहायता की जानी चाहिए जिसके सहारे वे स्वावलम्बी बन सकें। उन्हें श्रम दिया जाय, साथ ही श्रम का इतना मूल्य भी, जिससे मानवोचित निर्वाह संभव हो सके। गाँधी जी ने खादी को इसी दृष्टि से महत्व दिया था कि उसे अपनाने पर बेकारों को काम मिलता है। अन्य कुटीर उद्योग भी इसी श्रेणी में आते है। बेरोजगारी दूर करने के साधन खड़े करना प्रकारान्तर से अभावग्रस्तों की सहायता ही है। मुफ्तखोरी को बढ़ावा देना दान नहीं हैं। इस में निठल्लेपन की आदत पड़ती है। प्रसाद और व्यसन पनपते हैं। लेने वाले की हीनता की अनुभूति होती है और देने वाले का अहंकार बढ़ता है। यह दोनों ही प्रवृत्तियां दोनों ही पक्षों के लिए अहितकर हैं। इसलिए औचित्य और सही परिणाम को दृष्टि में रखते हुए ही दान किया जाना चाहिएं। अन्यथा दान के नाम पर धन का दुरुपयोग ही होता है और उससे स्वावलम्बन का उत्साह घटता है।

दोनों में सर्वोपरि ज्ञान दान को माना जाता है। इसे ब्रह्मयज्ञ भी कहते हैं। सद्भावनाएँ और सत्प्रवृत्तियां जिन प्रयत्नों से बढ़ सकें उसी को सच्चा परमार्थ कहना चाहिए। सत् चिंतन के अभाव में ही लोग अनेकों दुर्गुण अपनाते और पतन पराभव के गर्त में गिरते हैं। यदि सही चिन्तन कर सकने का पथ प्रशस्त हो सके तो समझना चाहिए कि सर्व समर्थ मनुष्य को अपनी समस्याएँ आप हल करने का मार्ग मिल गया। अपंगों, असमर्थों या दुर्घटना ग्रस्तों को छोड़कर कोई ऐसा नहीं है जो सही चिंतन करने का मार्ग मिल जाने पर ऊँचा उठ न सके, आगे न बढ़ सके, अपनी समस्याओं का आप हल न कर सके। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए प्रधानतया यही नीति अपनानी चाहिए कि लोक मानस के परिष्कार के लिए, सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए अपनी योग्यता और परिस्थिति के अनुसार भरसक प्रयत्न किया जाय।

समय की अपनी समस्यायें हुआ करती है। और परिस्थिति के अनुरूप उनके समाधान भी खोजना पड़ते है। प्राचीन कथा पुराणों और धर्मशास्त्रों से युग धर्म का निरूपण नहीं हो सकता। उसके लिए आज के प्रवाह प्रचलन और वातावरण को ध्यान में रखना होगा। इस हेतु युग मनीषियों को ही सदा से मान्यता मिलती रही है। इन दिनों भी इसी प्रक्रिया को अपनाना होगा। इस के लिए युग चेतना का आश्रय लेना होगा। युग मनीषियों के प्रतिपादनों पर ध्यान देना होगा। सद्ज्ञान संवर्धन का सही तरीका यही हो सकता है। साक्षरता की तरह ऐसे सद्ज्ञान संवर्धन की भी आवश्यकता है जो व्यक्ति और समाज के सम्मुख उपस्थिति समस्याओं के संदर्भ में समाधान कारक सिद्ध हो सके। आत्मोत्कर्ष के लिए खोजना होगा। लोक मानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति-संवर्धन को सर्वोच्च स्तर का आधार मानते हुए बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में युग धर्म की प्रतिष्ठापना की जानी चाहिए।

कहा जाता है कि विचार क्रान्ति की, ज्ञान यज्ञ की साधना में सभी दूरदर्शी विवेकवानों को लगना चाहिए। इसी निमित्त लेखनी, वाणी तथा दृश्य श्रव्य आधारों का ऐसा प्रयोग करना चाहिए जिससे सर्व साधारण को युग धर्म पहचानने और कार्यान्वित करने की प्रेरणा मिल सकें। सर्वजनीन और सार्वभौमिक ज्ञान-यज्ञ ही आज का सर्वश्रेष्ठ इसकी उपेक्षा करके, सस्ती वाहवाही पाने के लिए कुछ भी देते, बखेरते और कहते लिखते रहने से कुछ वास्तविक प्रयोजन सिद्ध होने वाला नहीं है।

इस चेतना का प्रखर प्रज्वलित करने के लिए युग साहित्य की प्राथमिक आवश्यकता है। उसी के आधार पर पढ़ने, पढ़ाने, सुनने, सुनाने की बात बनती है। शिक्षितों को पढ़ाया और अशिक्षितों को सुनाया जाये तो लोक प्रवाह को सही दिशा दी जा सकती है। इसके लिए प्रज्ञा युग के साधकों को झोला पुस्तकालय चलाने के लिए अपना समय और पैसा लगाना चाहिए। सत्साहित्य खरीदना सभी के लिए कठिन है, विशेषता ऐसे समय में जब लोगों को भौतिक स्वार्थ साधनों के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। आदर्शों की बात सुनने पढ़ने की अभिरुचि है ही नहीं ऐसे समय में युग साहित्य पढ़ाने वापस लेने के लिए शिक्षितों के घर जाया जाये, उन्हें पढ़ने योग्य सामग्री दी जाती और वापस ली जाती है, तो इतने से सामान्य कार्य से ज्ञान यज्ञ का महत्वपूर्ण प्रयोजन हर क्षेत्र में पूरा होने लगेगा। अशिक्षितों को सुनाने की बात भी इसी के साथ जोड़ कर रखनी चाहिए।

विचार गोष्ठियों, सभा सम्मेलनों, कथा प्रवचनों का अपना महत्व है। इसे सत्संग कहा जा सकता है। वाणी के माध्यम से यह दोनों कार्य किसी रूप में हर कही चलते रह सकते है। अपना उदाहरण प्रस्तुत करना सबसे अधिक प्रभावोत्पादक होता है। लोग समझने लगें है। कि आदर्शों की बात सिर्फ कहने सुनने के लिए होती है। उन्हें व्यावहारिक जीवन में नहीं उतारा जा सकता। इस भ्रान्ति का निराकरण इसी प्रकार हो सकता है। कि ज्ञान यज्ञ के अध्वर्य-विचार क्रान्ति के प्रस्तोता जो कहते हैं दूसरों से जो कराने की अपेक्षा है। उसे स्वयं अपने व्यवहार में उतारकर दिखायें अपने को समझाना ढालना दूसरों को सुधारने का अपेक्षा अधिक सरल है। उपदेष्टाओं को आत्मिक प्रगति के आराष-नारत होने वालों को अपनी कथनी और करनी एक करके दिखानी चाहिए।

आदर्शवादी लोक शिक्षण के लिए इस प्रकार आवश्यकता अनिवार्य रूप से रहती है। फिर भी यह आवश्यक नहीं की पूर्णता प्राप्त करने तक हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहा जाय। छठी कक्षा का विद्यार्थी पांचवीं कक्षा वाले की तो कुछ सहायता कर ही सकता है। अपने से कम योग्यता एवं स्थिति वालों का मार्ग दर्शन करने में कोई भी समर्थ एवं सफल हो सकता है।

इन दिनों उपरोक्त प्रयोजन यंत्रों की सहायता से भी बहुत कुछ हो सकता है। प्राचीन काल में पुस्तकें हाथ से लिखी जाती थीं पर अब तो वे प्रेस में मशीनों से छपती हैं इसी प्रकार दृश्य और श्रव्य माध्यम भी अनेकों सुलभ है। उसका प्रयोग ज्ञान यज्ञ का विस्तार करने के लिए किया जा सकता है। स्लाइड प्रोजेक्टर (प्रकाश चित्र यंत्र) कम लागत का और लोक रंजन के साथ लोक मंगल का प्रयोजन पूरा करने वाला उपकरण हैं वीडियो कैसेट इस निमित्त बनाये और जहाँ टीवी है वहाँ दिखाये जा सकते है। टेप प्लेयर पर टेप सुनाये जा सकते है।

दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन एक अच्छा तरीका है। इसका यान्त्रिक संस्करण है। फर्नीचर पर हैंड बैगों पर चिपकाए जाने वाले स्टीकर इस आधार पर भी सद्भावनाओं का अच्छा प्रचार हो सकता है।

संगीत टोलियां जहाँ भी थोड़े व्यक्ति एकत्रित हो वही अपना प्रचार कार्य आरम्भ कर सकती है। लाउड स्पीकरों पर रिकार्ड या टेप बजाये जा सकते है। इस संदर्भ में दीप यज्ञों की आयोजन प्रक्रिया अतीव सस्ती सुगम और सफल सिद्ध होती है। इस माध्यम से कर्मकाण्ड के माध्यम से आत्मनिर्माण, मध्याह्न काल के महिला सम्मेलन में परिवार निर्माण और रात्रि के कार्यक्रम में समाज निर्माण की सुधार प्रक्रिया और संस्थापन विधा का समावेश किया जा सकता है।

परिवार में रात्रि के समय कथा कहानियाँ कहने के अपने लाभ है। इस प्रयोजन के लिए प्रज्ञा पुराण जैसे कथा ग्रन्थ अभीष्ट आवश्यकता की पूर्ति कर सकते है। परस्पर विचार विनिमय वाद विवाद प्रतियोगिता कविता सम्मेलन भी कम उपयोगी नहीं है। हर व्यक्ति स्वयं कविता तो नहीं कर या कह सकता, पर दूसरों की बनाई हुई प्रेरणा प्रद कविताएं सुनाने की व्यवस्था तो कहीं भी हो सकती है। चित्र प्रदर्शनियाँ भी जहाँ सम्भव हों, इस प्रयोजन की पूर्ति में सहायक हो सकती है।

खोजने पर ऐसे अनेकों सूत्र हाथ लग सकते हैं जो ज्ञानयज्ञ की विचार क्रान्ति की सत्प्रवृत्ति संवर्धन की दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिए कौन, क्या, किस प्रकार कुछ कर सकता है। इसकी खोज बीन करते रहने पर हर जगह किसी को कोई न कोई मार्ग मिल सकता है। ढूंढ़ने वाले अदृश्य परमात्मा तक को प्राप्त कर लेते हैं फिर ज्ञानयज्ञ की प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने के लिए मार्ग न मिले, ऐसी कोई बात नहीं है। आवश्यकता है उसका महत्व समझने की उस पर ध्यान देने की।

उपासना से भावना जीवन साधना से व्यक्तित्व का और आराधना से क्रियाशीलता का परिष्कार और विकास होता है। आराधना उदार सेव्य साधना से ही सधती है। सेवा कार्यों में सामान्यतः वे सेवायें है जिनसे लोगों को सुविधाएं मिलती है। श्रेष्ठतर सेवा वह है जिससे किसी को पीड़ा का अभावों का निवारण होता है। श्रेष्ठतम सेवा वह है जिससे व्यक्ति पतन से हटकर उन्नति की ओर मोड़ा जा सके। सुविधा बढ़ाने और पीड़ा दूर करने की सेवा तो कोई धन सम्पन्न भी कर सकते है। परन्तु पतन निवारण की सेवा तो कोई आत्म चेतना सम्पन्न ही कर सकता है। यह सेवा भौतिक सम्पदा से नहीं दैवी सम्पदा से की जाती है। दैवी सम्पदा देने से घटती नहीं बढ़ती है। इसलिए भी वह सर्वसुलभ और श्रेष्ठ मानी जाती है।

संत और ऋषि स्तर के व्यक्ति पतन निवारण की सेवा को प्रधानता देते रहे है। इसीलिए वे संसार में पूज्य बने। जिनकी सेवा की गई वे भी महान बने। सेवा की यह सर्वश्रेष्ठ धारा ज्ञान यज्ञ के माध्यम से कोई भी अपना सकता है। स्वयं लाभ पा सकता है। और अगणित व्यक्तियों को लाभ पहुँचाकर पुण्य का भागीदार बन सकता है।

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