समष्टिगत हलचलें एवं मानवी पराक्रम
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ब्रह्मांडीय ग्रह-गोलकों का मानव जीवन से अविच्छिन्न सम्बन्ध है। प्राणी जगत, वनस्पति समुदाय एवं पर्यावरण पर ग्रह मण्डलों के छोटे से परिवर्तन का भी प्रभाव परिलक्षित होता है। मनुष्य भी इससे अछूता नहीं। वातावरण एवं परिस्थितियों से सम्बन्धित होने के कारण वह मूकदर्शक बना प्राकृतिक हलचलों का अनुगमन करता और प्रतिकूलताओं का कष्ट भुगतता रहता है। किन्तु वह पुरुषार्थ करे तो इनको बदलने मोड़ने-मरोड़ने में सफल हो सकता अथवा समाप्त करके अनुकूल परिस्थितियाँ विनिर्मित कर सकता है। तथ्य भी यही है कि हमारे और प्रकृति के मध्य अन्योन्याश्रित सम्बन्ध हैं। हमारे सम्मिलित प्रयास प्रकृति के शाश्वत नियमों को बदलने के लिए बाध्य कर सकते हैं। हम चाहें तो अपनी अंतः शक्ति को अध्यात्म साधनाओं द्वारा जाग्रत करके अदृश्य प्रतिकूलताओं को परिवर्तित कर लाभकारी परिस्थितियों को जन्म दे सकते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि परोक्ष जगत के क्रिया-कलापों में होने वाली हलचलों का प्रत्यक्ष प्रभाव जीव-जन्तुओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। यह परिवर्तन बिना पूर्व अभ्यास के ही उनका मार्ग दर्शन करता और जीवन की गतिविधियों को नियंत्रित करता रहता है।
“एनसायक्लोपीडिया आफ स्काई एवं ओसन” के अनुसार सालमन मछली वर्षों तक समुद्र में रहती है और जब कभी वह अपने जन्म स्थान की याद करती है तो समुद्र से चलकर अनेक बड़ी नदियों, सहायक नदियों की यात्रा करती हुई ठीक उसी स्थान पर पहुँच जाती है, जहाँ उसका जन्म हुआ था। यदि उसे विपरीत दिशा में मोड़ने का प्रयत्न भी किया जाये या धोखा देने का प्रयास किया जाये तो भी उसे बहकाया नहीं जा सकता। वह फिर लौटेगी अपने सही स्थान को ही जैसे कि अदृश्य चेतना उसका मार्गदर्शन कर रही हों।
टिड्डियां किसी उपयुक्त स्थान पर अड्डे दे कर उड़ जाती है। पीछे बिना अभिभावकों की देखरेख के अड्डों से बच्चे निकल आते हैं और अपने पूर्वजों के पीछे पीछे यात्रा पर उसी दिशा में चल पड़ते हैं और कुछ समय पश्चात अपने अपने संबंधियों से जा मिलते हैं। इसी तरह प्रवासी पक्षी एक ऋतु कहीं गुजारते हैं दूसरी के लिए कठिन यात्रायें करके ठीक उसी स्थान पर जा पहुँचते हैं जहाँ उनके वंशधर आते जाते रहे हैं। यह कार्य वे ऐसे करते हैं जैसे कोई पायलट उनकी अगवानी कर रहा हो।
ईल मछली के जीवन में तो सर्वाधिक आश्चर्यजनक घटना घटती है। संसार की समस्त ईल मछलियाँ चाहे वे नार्थ सी की हों, या हिन्द महासागर की, अण्डे बच्चे वे अटलाँटिक के वारमूडा क्षेत्र में जहाँ समुद्र अत्यन्त गहरा है, में ही देती हैं। वहीं से वे संसार के भिन्न भिन्न भागों में पहुँच जाती हैं। बिना किसी निर्देशक के अज्ञात शक्ति से प्रेरित हो लीला की ईलें, वहां से निकलने वाली नदियों से होकर समुद्र और समुद्र से अटलाँटिक महासागर और वहां से वारमूडा जा पहुँचती है। जहां बच्चे देकर वह अपनी जीवन लीला समाप्त कर देती हैं। जिस मछली ने कोई भूगोल नहीं पढ़ा जिसे महाद्वीपों का ज्ञान नहीं फिर भी जन्म लेने के उपरान्त वह अपने पैतृक देश को चल देती हैं और बड़े बड़े महासागर पार कर ठीक वहीं जा पहुँचती हैं, जहाँ उनके जन्म दाता कभी जीवनयापन किया करते थे।
ततैया की तरह का कीड़ा वैस्प ऐसा जीव है, जिसके बच्चों को विकास के लिए जीवित प्राणियों का ही माँस चाहिए मृत का नहीं। वैस्प घास के कीड़े को पकड़ता है और उसे मिट्टी में इस तरह गाड़ देता है जिससे वह मरता नहीं वरन् मूर्च्छित हो जाता है। इस तरह अर्ध जीवित जन्तुओं से ही यह बच्चे अपना विकास भरण-पोषण करते और विकसित होते है। यह बुद्धि का खेल नहीं वरन् किसी अदृश्य सत्ता की सुनिर्धारित नियंत्रण एवं प्रेरणा है। यदि बुद्धि की बात होती तो हाथी विधिवत खेती कर रहे होते, शेर अपने बच्चों के लिए विद्यालय खोले हुए होते, भेड़ियों की मनुष्य से मित्रता हो गई होती। किन्तु यह किसी परोक्ष सत्ता की चेतना के संचार से ही संभव है।
उपरोक्त उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया जा रहा है कि समय विशेष के वातावरण, अथवा काल में ऐसा प्रवाह उत्पन्न होता है, जिससे अनायास ही जीव-जन्तु, पेड़ - पौधे चर-अचर असम्भव कृत्य करने को विवश हो जाते हैं।
इसी सम्बन्ध में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो0ई0पी0 विगनर का कहना है कि जिन कारणों से चेतना में उभार,उतार चढ़ाव परिवर्तन आते हैं और उत्थान पतन के आधार खड़े होते हैं वे तब कुछ और ही हैं। वस्तुओं को जिस आधार पर प्रभावित परिवर्तित किया जाता है एवं मनुष्य जिस आधार पर आयामही बल पड़ता है, वे किसी प्रकार काम नहीं आ सका। परिष्कृत चेतना शरीर के एक अवयव की दृश्यों का विश्लेषण तो कर सकती है, पर उस आधार पर किसी के विचार को बदलने या सम्वेदनाओं को प्रभावित करने वाले प्रयोजन बहुत ही स्वल्प मात्रा में सफल हो सकते हैं। यहाँ आशय किसी अदृश्य विराट् चेतन सत्ता से ही है।
पदार्थ विज्ञान प्रकृति के विवरण प्रस्तुत कर सकता है, पर उसकी संरचना एवं हलचलों के पीछे सन्निहित उद्देश्यों पर प्रकाश नहीं डाल सकता। परमाणु उपपरमाणु, जीन, जीवाणु, कम्पन,ऊर्जा, प्रकाश, विकिरण का केवल स्वरूप ही भौतिकी हमें बता सकती है पर, यह नहीं बता सकती कि ब्रह्माण्ड में भरा हुआ पदार्थ किस लिए द्रुत गति से कहाँ दौड़ता चला जा रहा है? इस सम्बन्ध में इतिहास को सुनियोजित करने वाले प्रमुख इतिहास वेत्ता इर्विन श्रोडिगर ने “सीक फाँर दि रोड” में लिखा है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड स्वनियंत्रित सत्ता के हाथों संचालित हो रहा है जिसे अदृश्य जगत भी कह सकते हैं। वैज्ञानिकों ने शोध के दौरान पाया हे कि सूर्य, चंद्रमा, तारे ग्रह-नक्षत्र मनुष्य को अवश्य ही प्रभावित करते हैं किन्तु मनुष्य स्वयं में संकल्पवान हो तो इनके दुष्प्रभावों से बचकर अच्छे प्रभावों से वाँछित लाभ प्राप्त कर सकता है।
विज्ञानी माइकेलसन के अनुसार अमावस्या-पूर्णिमा को पृथ्वी पर पड़ने वाले सूर्य चन्द्र के प्रभावों से प्रभावित होकर न केवल समुद्र में ज्वार भाटे आते हैं वरन् पृथ्वी भी प्राय नौ इंच फूलती धंसकती है। संसार में विभिन्न समयों पर आये बड़े भूकम्पों का इतिहास यह बताता है कि प्राय अमावस्या,पूर्णिमा के इर्द-गिर्द ही वे आते रहे हैं। डाक्टर बुडाईन के अनुसार चन्द्रमा का प्रभाव जड़ पदार्थों एवं कम चेतना वाले जीव जंतुओं पर विशेषरूप से पड़ता है। मनुष्यों में इसी स्तर के व्यक्तियों में भी प्रायः इन्हीं तिथियों में मिरगी, उन्माद, और कामुक दुर्घटनाओं का दौरा आता है क्यों कि इन दिनों ऐसे कमजोर एवं जड़ प्रकृति के व्यक्तियों के पिट्यूटरी थायराइड,एड्रीनल आदि हारमोन स्रावी ग्रन्थियाँ उत्तेजित होकर शरीर एवं मन की स्थिति में असाधारण प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करती है। दुर्घटनाओं और अपराधों का दौर इन्हीं दिनों अधिक बढ़ जाता है। यह प्रभाव उन लोगों पर विशेष रूप से पड़ता है। जो अपनी विचारणा भावना एवं संवेदना पक्ष को सही दिशा धारा नहीं दे पाते। इन्हें उचित दिशा में नियोजित करने के लिए इस समय विशेष आवश्यकता पड़ती है। अतः जप,तप,पूजा,उपासना आदि उपचारों से इनका दुष्प्रभाव मनुष्य के ऊपर नहीं पड़ता।
ब्रिटेन के वैज्ञानिक आरनाल्ड मेयर और डा0 कोलिस्को के पर्यवेक्षणों ने यह सिद्ध किया है कि चन्द्रमा की स्थिति मनुष्यों सहित समस्त प्राणियों एवं वनस्पतियों को प्रभावित करती है।
आर्नल्ड एल॰ व्लीवर की पुस्तक “द लूनर इफेक्ट्स,” रोनाल्ड आर्फीख की पुस्तक “ मूडस्विंग” में बताया गया है कि जब भी पृथ्वी, सूर्य तथा चन्द्रमा एक सीध में एक दूसरे के निकट स्थित होते हैं,ऐसी परिस्थितियाँ उपस्थित होती हैं जो शरीरगत हलचलों एवं मन के क्रियाकलापों को प्रभावित करने लगती हैं। चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण हमारे आन्तरिक बायोलॉजिकल टाइड्स (ज्वार भाटों) को भी उसी प्रकार प्रभावित करता है, जिस प्रकार समुद्री भाटों को मनुष्य की आक्रामक प्रवृत्ति का,चन्द्रमा की कलाओं के घटने बढ़ने से गहरा सम्बन्ध है। विशेषकर शराबियों नशीली दवा खाने वाले अभ्यस्तों, अपराधियों तथा मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्तियों एवं अति भावुक लोगों के व्यवहार पर चन्द्रकलाओं का अधिक प्रभाव पड़ते देखा गया है। आगे उन्होंने लिखा है कि पृथ्वी की सतह की तरह मनुष्य शरीर में भी लगभग अस्सी प्रतिशत जलीय तथा बीस प्रतिशत ठोस का अंश विद्यमान है। इसी कारण अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिनों मानव पर चन्द्र कलाओं का सर्वाधिक प्रभाव होता देखा गया है।
डा0 क्लोरेन्स एमिट्स ने अपनी खोज पूर्ण पुस्तक “क्लाइमेट मेक्स दि मैन” में ऐसे आँकड़े प्रस्तुत किये हैं जिनसे स्पष्ट है कि मौसम के उतार चढ़ाव के अनुसार अमुक बीमारियाँ घटती और अमुक बढ़ी हैं। इसी प्रकार लोगों की प्रसन्नता, अप्रसन्नता शान्ति तथा उद्विग्नता में भी अनायास ही अन्तर आता है। जुलाई अगस्त में यदि सर्दी गर्मी बढ़ती घटती है,तब अक्सर पारिवारिक कलह बढ़ते है। अप्रैल से अगस्त तक में सामूहिक उपद्रवों की बाढ़ आती है। मौसम की गर्मी में लोगों का पारा गरम कर देती हैं। मानसून आने पर इस प्रकार के फसाद कम हो जाते है। कुहरा अधिक होने पर आत्महत्या की प्रवृत्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका विशद अध्ययन प्रो0ई0डेक्सटर ने किया है। उन्होंने चालीस हजार अपराधों की घटनाओं की जाँच पड़ताल करके यह पाया कि जैसे जैसे मौसम गरम होता गया, वेसे वैसे अपराध बढ़ते गये और जैसे जैसे क्रम में ठण्डक आती गई, उसी अनुपात से अपराधों की संख्या घटती चली गई।
जार्ज स्टीवर्ट ने अपने ग्रन्थ “ स्टाँर्म” में यह दर्शाया है कि मौसम के उतार चढ़ाव राज सत्ताओं को उखाड़ सकने वाले उपद्रवों की पृष्ठभूमि तक बना सकते है। इसीलिए सही निर्णय सही मौसम में लिये जाने चाहिए।
बसन्त ऋतु मनुष्यों में ही नहीं अन्य प्राणियों में भी कामोत्तेजना उत्पन्न करती है। गर्भ धारण का आधा औसत उन्हीं दो महीने में पूरा हो जाता है, जब कि शेष दस महीनों में कुल मिलाकर उतनी ही मात्रा पूरी होती है।
सूर्य विशेषज्ञों के कथनानुसार जिन दिनों सूर्य कमें लम्बे धब्बों की लाइनें बनती हैं, भयंकर विस्फोट होते हैं, उन दिनों लोगों की मनःस्थिति और परिस्थितियों में भी भयंकर उथल पुथल होती है। अमेरिकी क्रान्ति फ्राँसीसी क्रांति, रूसी क्रान्ति उन्हीं दिनों हुई, जिन दिनों सूर्य में विस्फोट के चिन्ह धब्बों के रूप में दिखाई पड़ रहे थे,सौर लपटें तीव्रतम स्थिति में थीं। अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन नेल्सन ने मंगल,शुक्र और बुध ग्रहों की स्थितियों का आयन मण्डल पर प्रभाव परखा है। उनका कहना है कि पृथ्वी चुम्बकीय गतिविधियों पर इसका असर पड़ता है। ग्रहों की स्थिति से विकिरणों की बौछार भी होती है। ये वंशानुक्रम में भी परिवर्तन कर देते हैं। इस प्रकार समष्टिगत परिवर्तन काय पिण्ड पर सुनिश्चित प्रभाव डालते हैं।
उपरोक्त उद्धरणों से स्पष्ट होता है कि वरिष्ठ समझा जाने वाला मनुष्य अपने चारों ओर के वातावरण एवं अदृश्य वेतन शक्तियों पर पूर्णतया आश्रित है। किन्तु यदि वह अपनी मनःस्थिति के आधार पर ब्राह्म परिस्थितियों को परिवर्तित कर सकता है, तो क्या वह इन्हीं परिस्थितियों के वशीभूत होकर रहेगा? फिर तो मानवी पुरुषार्थ को सर्वथा नकारना पड़ेगा। ग्रह-नक्षत्र हमारे अनुकूल नहीं हैं तो व्यर्थ प्रयास किया ही क्यों जाय? यह मान्यता सर्वथा अनुचित है। जिस तरह ग्रह नक्षत्र हमें प्रभावित करते हैं ठीक उसी तरह हम भी सृष्टि के घटक होने के कारण अपने चहुँओर के वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं। इसमें मानवी पुरुषार्थ की प्रमुख भूमिका होती है।
सोवियत संघ के प्रमुख विज्ञानवेत्ता जिथोजारजी गिआरडी का कहना है कि समूचा ब्रह्माण्ड एक शरीर है और उसका कोई भी अंग अलग नहीं वरन् संयुक्त रूप से एकात्म है। चूँकि मनुष्य भी उसी का एक घटक है अतः उसके क्रिया-कलाप,चिन्तन, चरित्र - व्यवहार सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करते हैं। इनको उच्चस्तरीय बना कर वह अपने समीपवर्ती वातावरण को अनुकूल बनाने में समर्थ तो है, ग्रह-नक्षत्रों एवं अदृश्य शक्तियों के कुप्रभाव को रोकने में व्यक्तिगत अथवा सामूहिक प्रयास अधिक एवं समर्थ होते हैं। सामूहिक उपासनाएँ, प्रार्थनाएँ, धर्मानुष्ठान इसी आधार पर सफल होते हैं।
भौतिकी के आचार्य राबर्ट मायर ने ऊर्जा के दर्शन पर जो खोजे की हैं, वे बताती हैं कि उसकी अधिकाधिक सूक्ष्म स्थिति में जो तत्व शेष रह जाता है उसे चेतना की संज्ञा दी जा सकती है। इसका उत्पादन और विलियन क्रम तो स्थूल रूप से ही चलता है मनुष्य की समष्टिगत चेतना जब सामूहिक लोक कल्याण के निमित्त एकाग्र हो जाती है, तो उससे ब्रह्माण्ड में हो रही हलचलें भी विशेष रूप से प्रभावित होती है। इनका प्रभाव लेसर किरणों जैसा सूक्ष्म होता है। जिससे भविष्य में अनिष्ट होने की आशंका समाप्त प्राय हो जाती है। इसी कारण शास्त्रों में सामूहिक अनुष्ठानों एवं सामूहिक साधनाओं का विधान है। जब भी इस धरा पर विपत्ति के बादल गहराये हैं तब-तब ऐसे ही सामूहिक प्रयत्न हुए हैं जिससे अनिष्ट का निवारण हुआ और सम्पूर्ण मानवता पर गहराते महा विनाश के बादल छटे। प्रस्तुत समय की प्रच्छन्न विभीषिका के निराकरण में सामूहिक अनुष्ठानों की महती भूमिका होगी। यह निश्चित है।

