नरक की स्थिति स्वर्ग के समतुल्य (Kahani)
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युधिष्ठिर ने जीवन में एक बार झूठ बोला था- ‘‘नरोवा कुँजरोवा” सो अन्त समय उन्हें एक दिन नरक में और सौ वर्ष स्वर्ग में रहने का निर्णय सुनाया गया। पूछा गया पहले नरक भोगेंगे या स्वर्ग।
युधिष्ठिर ने नरक का भार उतारना समझा ओर उसी के लिए अपनी सम्मति प्रदान की। तदनुसार उन्हें नरक भेज दिया गया।
युधिष्ठिर के नरक पहुँचने पर वहाँ का वातावरण बदल गया। कठोर व्यवहार करने वाले यमदूत नरम हो गये और सद्व्यवहार करने लगे। अन्य व्यवस्थाएँ भी बदलीं और कष्टकारक न रहीं। यह सब युधिष्ठिर के वहाँ रहने का ही प्रताप था।
दूसरे दिन जब उनके विदा होने का समय आया तो सभी नरकवासी दीनतापूर्वक अनुरोध करने लगे। आपके यहाँ से हमें बड़ी राहत मिलती है। हो सके तो यही रहें।
युधिष्ठिर का हृदय भर आया। उनने सदा के लिए नरक रहना स्वीकार कर लिया। अपना स्वर्ग ले जाने वाला पुण्य उन दुखियों में बाँट कर उनका त्रास हल्का कर दिया।
उनके वहाँ रहने पर नरक के वातावरण में आमूलचूल परिवर्तन हो गया। नरक की स्थिति स्वर्ग के समतुल्य बन गई।

