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Magazine - Year 1989 - Version 2

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कण-कण में बसी है चेतना

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अलग-अलग दीखते हुए भी वस्तुतः हम सभी चेतना के धरातल पर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। मनुष्य में जो चैतन्य-सत्ता क्रीड़ा कल्लोल कर रही हैं वही सम्पूर्ण जगत एवं प्राणी -पदार्थ में विद्यमान है। शास्त्रकारों एवं आप्त पुरुषों ने इसे ही व्यक्त करते हुए कहा है कि ब्रह्माण्ड और पिण्ड में व्यष्टि और समष्टि में, जितनी भी शक्तियाँ काम कर रही हैं, वह सभी प्राण चेतना के ही भिन्न-भिन्न रूप हैं, कल्प के आदि से ही अपने मूल रूप “महाप्राण” से उद्भूत हो कर यह सत्ता अनंतः पुनः उसी में समाहित हो जाती है। समत्व एवं एकत्व का दृष्टिकोण अपनाकर चलने और विचारणा, भावना, तथा संवेदना को उच्चस्तरीय बना लेने पर नियन्ता की अनुभूति हर किसी को हो सकती है। पूर्णता स्तर तक का विकास तभी संभव है।

पाश्चात्य मनीषी भी उपरोक्त तथ्य को स्वीकारते हैं। सुविख्यात मनोविज्ञानी कार्ल जुँग का कहना है कि परोक्ष व सूक्ष्म रूप से हम एक दूसरे से सुसम्बद्ध हैं। हम जो भी करते अथवा सोचते हैं, उससे दूसरे अवश्य प्रभावित होते हैं। इसे उन्होंने “कलेक्टिवकान्शसनेस” अर्थात्-सामूहिक अवचेतन नाम दिया है। विज्ञान का “पास्कलला” नाम का एक प्रसिद्ध नियम है, जिसके अनुसार जब किसी द्रव में दबाव पड़ता है, तो वह दबाव बिना घटे सम्पूर्ण द्रव क्षेत्र में संचारित होता है। यह सिद्धान्त यहाँ भी लागू होता हैं। हमारी चिन्तन-चेतना जैसी होती है, उसी रूप में वह इस चेतना के समुद्र में संचारित हो जाती है, पर इसे ग्रहण करना पूर्णतः ग्रहीता पर निर्भर करता हैं। यहाँ भी ग्रहण अवधारण नियमानुसार होता है। जिस प्रकार समान धर्मी व्यक्ति और विचार परस्पर मिलते और घनीभूत होते हैं वही बात चेतना के संबंध में भी कही जाती है। चिन्तन-चेतना जिस स्तर की होती है, वह उसी ओर आकर्षित होती है। उत्कृष्ट स्तर की चेतना सदा सजातीय की ओर खिंचती चली आती है, जब कि निकृष्ट स्तर की प्राण चेतना निकृष्टतम की ओर प्रवाहित होती है।

विज्ञानवेत्ताओं ने समस्त भौतिक शक्तियों को जो कि चेतना के ही रूपांतरण हैं, पाँच भागों में विभक्त किया है। ये हैं (1) एलेक्ट्रो मैगनेटिक फोर्स अर्थात् विद्युत चुम्बकीय बल (2) वीक फोर्स अर्थात् अल्पसत्व (3) स्ट्राँग फोर्स (महा सत्व) (4) ग्रैवीटेशनल फोर्स (गुरुत्वाकर्षण बल) और (5) एण्टी मैटर-एण्टी यूनिवर्स (प्रति पदार्थ, प्रति विश्व) विज्ञानियों ने इन्हीं सत्ताओं के समष्टिगत रूप में चेतना-जगत की, झाँकी देखी है। परामनोविज्ञानी रिचार्ड मोरिस बक ने अपनी पुस्तक “काँस्मिक्कान्ससनेस” में चेतना के चार स्तर बताये हैं। उनके अनुसार (1) परसिप्चुअल माइण्ड यह चेतना का निम्न स्तर है, जो निम्न स्तर के जीव धारियों में विद्यमान है। (2) रिसिप्चुगल माइण्ड- यह कुछ उन्नत स्तर की चेतना है, जो उच्च स्तर के जीवधारियों में पायी जाती है। (3) कन्सेप्चुअल माइण्ड को उन्होंने आत्म चेतना युक्त मानवी चेतना के रूप में वर्णन किया है। अंतिम (4) चौथी प्रकार की चेतना को उन्होंने ब्राह्मी चेतना नाम दिया है। उनका कहना है कि यह चेतना की सर्वोच्च स्थिति है जिस में व्यक्ति को एकत्व और अद्वैत स्थिति का बोध होता है। सब में स्वयं को और स्वयं में सब को देखने की विशालता इसी अवस्था में विकसित होती है। महर्षि अरविंद ने भी चेतना को चार मुख्य सोपानों में विभाजित किया है। ये हैं- क्रमशः उच्चतर मनः प्रकाशित मन, संबुद्ध मन और ओवर माइण्ड” चेतना के उच्चतर आयाम को उन्होंने “सुपर माइण्ड” कहा है। उनके अनुसार चेतना के इस सर्वोच्च स्तर का सम्पूर्ण मानव जाति में अवतरण तभी हो सकेगा जब वह अपने गुण, कर्म, स्वभाव में परिष्कार लाकर विचारणा भावना और संवेदना को उच्चस्तरीय बना सके। साथ ही ईश्वर के प्रति श्रद्धा भाव रखते हुए पूर्णरूपेण आत्म समर्पण कर दे। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को उन्होंने कककक और इन्वोल्यूशन का नाम दिया हैं। इवोल्यूशन अर्थात् आरोहण में आत्म परिष्कार कर स्वयं को ऊँचा उठाया जाता है और अन्वोल्यूशन अर्थात् अवरोहण में प्रयास पूर्वक भगवद् करुणा को नीचे उतारा जाता है। व्यक्तित्व और चेतना का पूर्ण विकास तभी संभव बन पड़ता है और देवत्व की प्राप्ति भी तभी होती है। इस स्थिति को प्राप्त व्यक्ति को उन्होंने नाँस्टिक बींइग अर्थात् अध्यात्म जीवी कहा है। रिचार्ड मोरिस बक ने चेतना की इसी स्थिति को “ब्रह्माण्डीय चेतना” नाम दिया है और कहा है कि व्यक्ति में यह अस्थायी रूप से तब तक प्रकट और लुप्त होती रहेगी, जब तक यह उसका स्थायी गुण धर्म न बन जाये या दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जब तक मानव जाति अपनी आत्म चेतना को उसके अनुरूप उच्च स्तरीय न बना ले, तब तक वह “चेतना” स्थायी रूप से अवतरित नहीं हो सकती।

हम जो चिंतन करते हैं, वही इच्छा, आकाँक्षा के रूप में शब्द शक्ति बन कर निकलता है। विज्ञान ने शब्द को शक्ति के रूप में स्वीकारा है। उसके अनुसार शक्ति का न तो नाश होता है न निर्माण, वरन् रूपांतरण होता है। वह अपने मूल रूप में भी रह सकती है अथवा दूसरे में बदल सकती है, पर उनका विनाश कभी नहीं होता। इस आधार पर वैज्ञानिक अन्तरिक्ष में अब तक के छोड़े गये विचारों को एक विशेष क्षेत्र में अवस्थित बताते हैं। आयनोस्फियर, एटमोस्फियर की तरह इस क्षेत्र का नाम उन्होंने आइडियोस्फियर दिया है। इस क्षेत्र में घूमने-फिरने वाली विचार चेतना में से वैज्ञानिक अब यंत्रों के माध्यम से उन तरंगों को ग्रहण करने का प्रयास कर रहे हैं, जो महाभारत युद्ध के दौरान गीत के उपदेश के रूप में निकली थीं। यह तो विज्ञान का अपने ढंग का प्रयास है, पर जन सामान्य तो आइडियोस्फियर से अपनी स्वयं की चेतना के स्तर के अनुरूप ही लाभ उठा पाता है। उपरोक्त चेतनात्मक स्तर में से वह जिस स्तर का प्रतिनिधित्व करता हैं, उसी स्तर की अंतरिक्षीय चेतना विचार चेतना के रूप में उसकी ओर खिंची चली आती हैं और अपने अनुरूप क्रिया कलाप अपनाने के लिए व्यक्ति को बाधित करती है। यदि ऐसी बात नहीं होती तो स्वतंत्रता संग्राम के दिनों श्री अरविंद को संपर्क ब्राह्मी चेतना से न हुआ होता। इसी महत् चेतना के निर्देश पर उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के अपने सक्रिय जीवन से संन्यास लिया एवं अध्यात्म साधना में प्रवृत्त हो कर अपनी प्रचण्ड चेतना द्वारा वातावरण को प्रभावित किया और स्वतंत्रता प्राप्ति के कार्य को आसान बनाया।

हमारी वर्तमान चेतना निम्न स्तरीय है, फलतः अनायास उसी स्तर की चेतना हमारी ओर आकर्षित होती रहती है, और हमें वैसे ही कार्य करने की प्रेरणा देती है। इसके अतिरिक्त हम स्थान और वस्तु विशेष से जुड़ी चेतना से भी प्रभावित होते हैं। हम जो भी कार्य करते हैं, वह सूक्ष्म रूप से पूरे वातावरण को तो प्रभावित करता ही हैं, पर संपर्क क्षेत्र वाले स्थान और वस्तु को विशेष रूप से प्रभावित करता है। यह प्रभाव चेतना के स्तर के आधार पर भला बुरा दोनों प्रकार का हो सकता है। होपडायमण्ड और कोहिनूर हीरे के बारे में कहा जाता है, कि ये जिन जिन के पास गये, उन-उन को त्रास ही दिया और तबाही मचायी। ऐसी ही जनश्रुति महाभारत की युद्ध भूमि और श्रवण कुमार के बारे में भी है। कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के लिए भगवान कृष्ण ने जान बूझ कर ऐसी भूमि का चयन किया, जिसका इतिहास रक्तरंजित था। उन्हें आशंका थी कि भाई-भाई का प्रेम असमय ही न उमड़ पड़े और मुख्य उद्देश्य अधूरा रह जाये, इसलिए उन्होंने ऐसी अभिशप्त युद्ध भूमि के चयन का निर्देश दिया था जिसकी विकृत चेतना अन्त तक सब के मन-मस्तक पर छायी रहे। श्रवण कुमार के बारे में कथा है कि एक बार जब से अपने मात-पिता को तीर्थयात्रा के लिए ले जा रहे थे, तो एक जंगल से गुजरते हुए उनके मन में विचार आया कि इन्हें काँवर से उतार देना चाहिए और ऐसा ही किया भी।

सूक्ष्म द्रष्टा पिता कारण जान कर चुप रहे। उन्हें मालूम था कि उक्त स्थान बहुत पहले एक असुर का कार्य क्षेत्र रह चुका है और इसी का सूक्ष्म प्रभाव बेटे पर पड़ा है। उस स्थान को पार करते ही जब उनकी सद्बुद्धि लौटी तो इसका उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ।

इसी तरह उच्चस्तरीय चेतना का महा मानवों की प्राण ऊर्जा का संपर्क-सान्निध्य भी उत्तम होता हैं। कहा जाता है कि ऋषियों की तपःस्थली में हिंस्र जन्तु भी पालतू पशु का सा व्यवहार करने लगते थे। सिंह और गाय के एक ही घाट पानी पीने की कथा प्रसिद्ध है। इसी प्रकार देखा जाता है कि जब कभी मन्दिर आदि पवित्र स्थल अथवा तीर्थ, उत्तराखण्ड जैसे पवित्र क्षेत्रों में कोई प्रवेश करता है, तो अनायास ही उसकी सद्भावनाएं हिलोरें लेने लगती हैं। वस्तुतः यह उस स्थान अथवा क्षेत्र में संव्याप्त उच्चस्तरीय चेतना का ही प्रभाव होता है।

यह तो स्थान और क्षेत्र विशेष से जुड़ी प्रचण्ड चेतना हुई, जो हमें भले बुरे ढंग से प्रभावित आकर्षित करती है। ब्राह्मी चेतना तो कण-कण में विद्यमान है, पर उसकी अनुभूति के लिए आत्मशोधन आवश्यक है।

इससे कम में हम उसकी प्रतीति नहीं कर सकते। यदि यह चेतना कण-कण में नहीं होती, तो इस विश्व ब्रह्माण्ड में जो नियम और व्यवस्था हमें दिखाई पड़ती है, वह कदापि नहीं होती। फिर सर्वत्र अव्यवस्था के ही दर्शन होते। सूर्य चन्द्र ग्रह-नक्षत्र में से कोई भी समय के पाबन्द नहीं होते। पेड़-पौधों में असमय ही फल-फूल लगते और उनमें किस्म और प्रजाति का कोई भेद-भाव नहीं होता। जब चाहे तब आम के पेड़ में अमरूद और अमरूद में केले उत्पन्न होते। जन्तुओं में भी ऐसी ही अनियमितता और अव्यवस्था देखने को मिलती। तब गाय के बिल्ली और बिल्ली के खरगोश उत्पन्न होने में तनिक भी संदेह नहीं रह जाता। जन्तुओं में भ्रूणावस्था में एक और महत्वपूर्ण बात देखने को मिलती है। देखा गया है कि भ्रूणावस्था में प्रायः सभी जन्तुओं के बच्चों का आकार-प्रकार एक जैसा ही होता है। बाद की अवस्था में ही उन में विभेद उत्पन्न होता है और अलग-अलग प्रकार के रूप आकार ग्रहण करते हैं। यह विभेद उत्पन्न करने वाला कौन है? जो जन्तुओं के रूप और आकार को निर्धारित करता है। निश्चय ही यह वही अदृश्य चेतना हैं, जिसके कारण इस संसार की गति,प्रगति,और नियम-व्यवस्था की हुई हैं। जड़ चेतन उसी से ओत-प्रोत हैं।

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