अन्ततः सत्य ही जीतता है।
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पिछड़े समुदाय की लोकचेतना पूर्वाग्रहों से भरी जड़ प्रकृति की होती है। उसे प्रचलनों का समर्थन ही नहीं गर्व करते भी देखा जाता है। परिवर्तन की बात सुनने और उस दिशा में कुछ कदम बढ़ाना उनके लिए अति कठिन होता है।
सुधारकों को इन्हीं परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। सहमति की तुलना में असहमति से ही अधिक पाला पड़ता है। यह अस्वीकृति इस आधार पर उभरती है कि उन पर कितना दबाव पड़ा। बदलने की आवश्यकता अनुभव करने के लिए उन्हें तर्क या व्यवहार की दृष्टि से कितना बाधित होना पड़ा।
जब दबाव का तापमान कुछ और बढ़ता है तो उपहास उड़ाया जाने लगता है। उपहास इस बात का प्रतीक है। कि जो कहा गया था उसकी क्षमता को समझा गया और मान्यता दी गई।
जब सुधार प्रयासों की शक्ति बढ़ती है और लगता है कि वे सफलता की दिशा में चल रहे हैं तो विरोध खड़ा किए जाते हैं पर्चे बाजी होती है एवं विरोधी यह प्रयत्न करते हैं कि उनकी जीत मानी जाये ओर प्रतिपादन कर्त्ता को हारा हुआ या बदनाम सिद्ध कर दिया जाये।
अन्तिम शस्त्र है आक्रमण। जब कोई उपाय नहीं सूझता तो मूढ़मति लोग आक्रमण का सहारा लेते हैं शारीरिक चोट पहुँचाने से लेकर दुरभिसन्धियाँ रचने तक आरोप आक्षेप लगाकर चरित्र हनन तक की नीति अपनाते है। ऐसा प्रायः सभी
सुधारवादियों को सहन करना पड़ता है। जब तक आन्दोलन शिक्षित सामान्य स्तर तक रहता है, तब तक उपहास, तिरस्कार का आश्रय लेकर ही प्रतिपक्षी काम चलाते रहते है। पर जब अवाँछनीयता के अस्तित्व को अपने लिए खतरा खड़ा होते दीखता, है तो वह प्रतिरोध पर उतर आती है। निहित स्वार्थों के दाँव में लगा हुआ कानून का चक्कर जब हाथ से जाता दीखता है तब वे अपने आक्रोश को एकत्रित करके हमला बोलने लगते है। देवासुर संग्राम का समूचा इतिहास इसी एक तथ्य के ईद−गिर्द घूमता है। शहीदों के बलिदान के पीछे इसी उपक्रम की पुनरावृत्ति होती देखी जा सकती है।
सन्त सुधारक और शहीद की एक सुनिश्चित श्रृंखला है। महान परिवर्तन के प्रणेता को सर्वप्रथम सन्त की भूमिका निभानी पड़ती है, ताकि उसके चिन्तन और चरित्र लोक श्रद्धा अर्जित करके अपने व्यक्तित्व और प्रभाव का दुहरा दबाव डाल कर प्रस्तुत तर्कों, तथ्यों प्रमाणों को सशक्त बना सकें और अनेकानेक विचारशीलों समर्थक, सहयोगी बन सकें। इसके बाद सच्चे मन से अपनाया गया प्रतिपादन कार्य रूप में परिणित होने लगता है। लोग उसे करने भी लगते है। जो उनने समझा और सही माना था।
सुधारकों की यही सफलताओं है। इसके उपरान्त जब विचारशील उस प्रयास का अभिनन्दन करते हैं वह निहित स्वार्थ आक्रमण का आश्रय लेते हैं और अपने प्रतिपक्षी मोर्चे को तहस नहस करने का प्रयत्न करते है संघर्ष चल पड़ने पर कभी एक पक्ष को चोट लगती कभी दूसरे को। असुरता हारती है तो प्रगति का पार प्रशस्त होता है पर यदि औचित्य पर भी आघात हो लगे, तो भी हानि नहीं। भावनायें उमड़ती है और छू हुए काम में लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता करती है। ईसा सुकरात मंसूर दयानन्द आदि के प्राण ही लिए गये इतने पर भी उनका छूटा प्रयास रुका नहीं वरन् और भी अधिक तेजी पकड़ता गया इसी निष्कर्ष को ध्यान में रखते हुए तत्वदर्शियों ने कहा है कि अन्ततः सत्य की विजय होती है।

