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Magazine - Year 1989 - Version 2

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चेतना के महासागर में तैरती मानवी काया

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मानवी काय सत्ता का बहिरंग पक्ष जो हाड़ माँस से बना स्थूल रूप में दिखता है, उसका अदृश्य सूक्ष्म शरीर जिन प्राण स्फुल्लिंगों के समुच्चय से बना है, वह अपने आप में अद्भुत एवं अपरिमित शक्तियों का पुँज है। यही कारण है कि शास्त्रकारों ने आप्त पुरुषों ने इस शरीर को देव मन्दिर की संज्ञा दी है। पर सामान्य मान्यता यह है कि दृश्यमान समर्थता स्थूल शरीर की ही देन है, जब कि उसका क्षेत्र इतना व्यापक है वह समीपवर्ती क्षेत्र में बाहर भी विद्यमान रहती है और संपर्क में आने वाली वातावरण को भी प्रभावित करती है और सान्निहित सूक्ष्म प्राण चेतना है जो प्रकाश किरणों के रूप में शरीर बाहर भी फैली रहती है। यह आन्तरिक शक्तियों का बहिरंग में परिचय और परिष्कृत कर लेता है, उसी अनुपात में दिव्य क्षमताओं का, अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का स्वामी बनता चला जाता है। इससे न केवल अपना हित साधन होता है वरन् दूसरों को भी लाभान्वित किया जा सकता है।

ईसाई धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि एक प्रकाश क्षेत्र मनुष्य को चारों ओर से सतत घेरे रहता है जिसकी सघनता सिर के इर्द-गिर्द अधिक होती है। कहा जाता है कि जब मूसा ईश्वरीय नियम खुदे पवित्र पत्थर को लेकर पर्वत से नीचे उतर रहे थे, उस समय इजराइल के बच्चे उन्हें देखने में असमर्थ रहे क्योंकि उनके चेहरे से तीव्र प्रकाश किरणें प्रस्फुटित हो रही थीं। विभिन्न साहित्यों में इसका विस्तृत वर्णन भी मिलता है। इसी तरह सेंट पाल के बारे में प्रचलित है कि उपदेश देते समय उनके मुख मंडल से प्रकाश रश्मियाँ निकल कर आस पास के वातावरण में फैल जाती थीं। ईसामसीह का तेज विलय इतना तीव्र होता था कि जिसकी तुलना किसी भी प्राकृतिक या कृत्रिम प्रकाश से नहीं की जा सकती। सेंट फिलिप तथा सेंट चार्ल्स बोरोमेओ ने इसका अलग वर्णन किया है। वैज्ञानिक जगत में इसे ही आभा मण्डल-प्रभामंडल आदि नामों से जाना है और कहा जाता है कि जब कोई व्यक्ति दिव्य चिंतन और आध्यात्मिक साधना में निमग्न हो जाता है,उस समय प्रभामंडल के रंग और अधिक चमकदार एवं प्रभावकारी हो जाते हैं। इसका सीधा संबन्ध व्यक्ति के चिन्तन और भावना क्षेत्र से हे जिसमें आये क्षणिक परिवर्तन से भी इस में अंतर आ जाता है और अपने चारों ओर के वातावरण को प्रभावित करता है।

मस्तिष्क की तरह सम्पूर्ण शरीर के चारों ओर प्रकाशित क्षेत्र को “औराओला “ कहा गया हैं। उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्शवादी कर्तृत्व से इसमें अभिवृद्धि होती है। इस संदर्भ में गुहा .. के प्रसिद्ध ग्रंथकार पैरासेल्स ने कहा है कि सूक्ष्म मर्म स्थानों से निस्सृत इस तेजस्वी ऊर्जा का विनाश नहीं होता वरन् शरीर से बाहर निकलने के पश्चात् चारों ओर वलय रूप में घिरी रहती है। उसके अनुसार यह अर्ध प्राकृतिक किरणें हैं जो यह प्रदर्शित करती हैं कि मनुष्य उत्कृष्ट चिन्तन तथा श्रेष्ठ भावना सम्पन्न है अथवा निकृष्ट विचारों एवं दूषित अंतःकरण से ग्रसित है। जीवन के मूल तत्व यही दोनों माने गये हैं जिनके दूषित होने पर शरीर रोगग्रस्त हो जाता है जिससे चेहरे–मुहरे से सुन्दर व्यक्ति उदास, निस्तेज, आलसी होने पर मरा गिरा सा टूटा हुआ प्रतीत होता है। जब कि उत्कृष्ट चिन्तन वाला व्यक्ति स्वस्थ,सुसन्तुलित एवं काला कुरूप होने पर भी प्रभावोत्पादक,व्यक्तित्व का स्वामी होता है। ऐसा व्यक्ति जहाँ जाता है, अपनी उपस्थिति से वातावरण प्रभावशाली बना देता है।

इसी ग्रन्थ में तेजोवलय को पाँच भागों में विभक्त किया गया है। (1) स्वास्थ्य आँरा (2) मर्मस्थान का आँरा (3) कायिक आँरा जो मनुष्य की पाशविक प्रवृत्ति को बताता है (4) चरित्र का आँरा (5) आध्यात्मिक प्रकृति का तेजोवलय।

स्वास्थ्य वलय रंगहीन होता है परन्तु इसे त्रिज्मीय रेखाओं द्वारा अनुभव किया जाता है, यह शरीर की सभी दिशाओं से निकलता है। दूसरा वलय शरीर से निश्चित दूरी पर होता है एवं इच्छा शक्ति द्वारा परिवर्तित परिवर्धित होता रहता है। सामान्य अवस्था में गुलाबी रंग एवं समय समय पर गहरे गुलाबी रंग में परिणत हो जाती है। तीसरा आँरा अभिव्यक्ति को स्पष्ट करता है। यह एक ऐसा दर्पण है जहाँ प्रत्येक इच्छाएँ, कामनाएँ भावनाएँ परावर्तित होती हैं। इनके परिवर्तन पर ही रंग बदलते रहते हैं। क्रोधी एवं मानसिक उत्तेजना वाले व्यक्ति अपने आँरा को काले क्षेत्र में गहरे लाल रंग के धब्बों से भर देते हैं जब कि भय इसे तुरन्त भूरे रंग में परिणत कर देता है। चौथे प्रकार का वलय भूतकालिक जीवन चरित्र को स्पष्ट करता है। पाँचवें प्रकार का वलय उच्चस्तरीय आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त कर लेने वालों में ही देखा जाता है। बाहर दिखने वाला तेजोवलय व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति के स्तर को स्पष्ट करता है कि उसने कितनी प्रगति की है। यही वह सूक्ष्म आभा है,जो दिव्य स्थलों में,आश्रमों में तीर्थ स्थलों में विद्यमान रहती है जिसे प्राप्त करने के लिए तीर्थ यात्रा का विधान है। थियोसाफी ग्रन्थों में हिमालय क्षेत्र में ऐसा ही प्रकाश पुँज छाये रहने की बात उल्लिखित है। इसमें निहित गुलाबी रंग शुद्ध भावना,तेज लाल को क्रोध एवं उत्तेजना को,गाढ़ा लाल इन्द्रियलिप्सा एवं कामुकता को,पीला चमकदार बुद्धि क्षेत्र के पैनेपन को, वासन्ती रंग बौद्धिक क्षमताओं को, जिस का अंत स्वार्थपरता एवं,अहंकार में होता है। भूरा रंग कंजूस प्रवृत्ति को प्रकट करता है। हरा रंग प्रभावशाली रंग है, इस प्रवृत्ति का व्यक्ति दूसरों को भी अपने जैसा समझता है, इसका हल्कापन क्रूरता एवं बर्बरता को स्पष्ट करता है, नीला रंग धार्मिक प्रवृत्ति एवं भक्ति की ओर प्रेरित करता है। इस में निहित छाया साधना के स्तर एवं चेतना की महानता को बताती है कि व्यक्ति कितना आदर्शवादी है। नील लोहित रंग मानसिक प्रखरता, आध्यात्मिकता,की जागृति, एवं गुहा विद्या की पूर्णता का परिचायक है।

तेजोवलय में निहित रंगों के सम्बन्ध में अब वैज्ञानिक भी इस बात का समर्थन कर रहे हैं कि यह मनुष्य के अन्तराल में छाये भावनाओं की अभिव्यक्ति ही है। विचारणा,भावना-कल्पना क्षेत्र में आने वाले उतार-चढ़ावों से आभामण्डल में होने वाले परिवर्तनों को जाँचने-परखने के लिए स्टेनफोर्ड-विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक द्वय विलियम टिलर एवं डेविड वायरस ने विशिष्ट प्रकार के संवेदनशील यंत्रों का विकास किया है। उनका कहना है कि विचारणाएँ-भावनाएँ इतनी तीव्रता के साथ बदलती हैं जिन्हें सामान्य उपकरणों के माध्यम से नहीं पकड़ा जा सकता। व्यक्ति को क्षणभर में उत्कृष्टता से निम्नगामिता की ओर लुढ़कते देखा जाता है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने कठिन साधना विधानों का अध्यात्म उपचारों का निर्माण किया था जिस से मनुष्य का स्थायी परिमार्जन-परिष्कार हो सके। अपने प्रयोग- परीक्षणों में उन्होंने पाया कि भावना-विचारणा के परिवर्तन के साथ ही सफेद,नीली एवं लाल रंग की प्रकाश रश्मियों में भारी फेर–बदल होता है। उत्तेजना - आवेश-ग्रस्तता की स्थिति में गहरे लाल रंग की किरणें निस्सृत होती है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य की भावनाएँ - विचारणाएं कितनी प्रचंड होती है जो अल्ट्रावायलेट किरणों,लेसर किरणों की तरह क्षण भर में कहीं से कहीं भी जा पहुँचती हैं। इसका सुनियोजन श्रेष्ठता की दिशा में होने पर व्यक्ति महामानव, देवता सन्त-ऋषि बनता है एवं उसकी निष्कृष्टता से उसी व्यक्ति को नर पिशाच-नरपशु -दुष्ट-अत्याचारी बनते देखा गया है।

ड्यूक यूनिवर्सिटी में कार्यरत वैज्ञानिक-स्टीवेन्सन और टिलर ने अपने अनुसंधान में पाया है कि ध्यान की अवस्था में जब शरीर-मन उत्तेजना रहित होता है; उस समय लाल रंग की किरणों का निष्कासन समाप्त हो जाता हे, किन्तु यदि ध्यान के पश्चात् साधक उत्तेजित होता है तो इन किरणों की मात्रा द्विगुणित वेग से निकलने लगती है। सामान्य स्थिति में आवेश-उत्तेजना उतनी हानि कारक नहीं होती जितनी कि साधनाकाल में। काम, क्रोध, आवेश, अहंकार जैसे मनोवेगों की छोटी लहर भी साधक को पतन पराभव की ओर धकेल देती हे। अतः इस समय विशेष सावधानी एवं संयम बरतने की आवश्यकता है।

सोवियत संघ के प्रख्यात वैज्ञानिक डा0 किर्लियन का कहना है कि मानसिक परिवर्तन के साथ साथ व्यक्ति के आभा मण्डल में भी परिवर्तन होता रहता है। त्वचा के कुछ विशेष बिन्दुओं पर नीले एवं स्वर्णिम आभा के कण दिखाई देते हैं जो मानसिक-अस्थिरता एवं निस्तेजता को प्रकट करते हैं। कुछ दीप्ति कण त्वचा के एक स्थान से शरीर के एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु एवं एक व्यक्ति से दूसरे की ओर जाते रहते हैं जहाँ वे अवशोषित कर लिये जाते हैं। जब तक पहला समूह पूरी तरह से अवशोषित नहीं हो जाता तब तक दूसरा समूह नहीं निकलता। इस सम्बन्ध में उन्होंने किर्लीयन व आर्गोग फोटोग्राफी द्वारा चित्र भी खींचे हैं। वे धीरे धीरे चमकती हुई जाती है एवं अंत में तीव्र आभा के रूप में चमक कर अपने केन्द्र पर पहुँच कर बुझ जाती हैं। इनका रंग नीलिमा लिए सफेद,एवं भूरा होता है। ये बुझे मुरझाये प्रकाश समूह अनिर्धारित अस्त व्यस्त एवं हीन संकल्प शक्ति को व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि धर्म शास्त्रों में हेय विचार वाले कुसंस्कारियों से दूर रहने के लिए कहा गया है। छुआ छूत का निर्धारण इसी आधार पर किया गया था। जातिगत आधार पर नहीं। कामी,व्यभिचारी लोलुप, मिथ्याचारी, दम्भी व्यक्तियों के संसर्ग में रहने से उनके सूक्ष्म संस्कार अनायास ही अच्छे संस्कार वालों को प्रभावित करते हैं। इसलिए न तो उनके संपर्क में रहें, नहीं उनके द्वारा प्रयोग किये वस्त्रों अथवा सामानों का उपयोग करें, क्योंकि उसमें भी उनका प्रभाव आ जाता है।

रूस स्थिति औरों साइकियेट्रिक इन्स्टीट्यूट की प्रमुख महिला विज्ञानी डा0 थेल्मा माँस ने भी अपने प्रयोग परीक्षणों में पाया है कि ध्यान, सम्मोहन अथवा ट्रग्स की स्थिति में अँगुलियों के अग्रभाग से निकलने वाली प्राण रश्मियों में भारी परिवर्तन होता है। तनाव, उत्तेजना अथवा निषेधात्मक चिंतन की स्थिति में अवस्थिति जिन व्यक्तियों के विर्लियन चित्र उतारे गये तो देखा गया कि फिल्म पर गहरे लाल रंग के चकते पड़ जाते हैं। इसका सर्वाधिक प्रभाव हाथ पर ही होता है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य के भले बुरे अणुओं की आभा हाथों से प्रकट होती और संपर्क में आने वालों को प्रभावित करती है। धर्म ग्रन्थों में इसीलिए कहा गया है वे हाथ काट डालने योग्य हैं जो पाप कर्म में प्रवृत्त होते हैं तन की बात सर्वविदित है। स्पर्श से उनकी दिव्य प्राण ऊर्जा का लाभ अनायास ही लोगों को मिल जाता है। उनके चरणों को छूने के पीछे यही विज्ञान काम करता है। समर्थ गुरु अपने शिष्य पर शक्ति पात में यही क्रिया दुहराते हैं। रामकृष्ण परमहंस द्वारा विवेकानन्द को, रामदास द्वारा शिवाजी को,विरजानन्द द्वारा दयानन्द को प्राण ऊर्जा का दिव्य अनुदान इसी प्रकार हस्तांतरित हुआ था। इसी आधार पर उदारमना तपस्वी अनेक चार दीन दुखियों की भी सेवा सहायता करते रहते हैं और प्रसन्नता अनुभव करते हैं। न्यूजीलैंड का एक गड़रिया अपने या पराये झुण्ड की जिन भेड़ों पर हाथ फेर देता था वे उसी के साथ चल पड़ती और मालिकों द्वारा खींचने पर भी वापस न लौटती। गड़रिया ही उलटा हाथ किया कर उन्हें अपनी पकड़ से मुक्त करता, तब वे वापस ..... इसने भी हाथ के माध्यम से सूक्ष्म शक्ति द्वारा भेड़ों को प्रभावित करना ही है।

संकल्प शक्ति एवं एकाग्रता द्वारा प्राण शक्ति का अभिव्यक्ति एवं प्रकाश अपुण्य के रंगों में परिवर्तन भी हो सकता है। इस सम्बन्ध में है इस रूप ने अपने भी हो सकता है। इस सम्बन्ध में है ..... ने अपने संस्मरण में लिखा है कि एक बार इथेल रोगी का उपचार कर रही थीं। उस समय उसके हाथ से वासन्ती रंग निकल रहा था। उन्होंने कहा में चाहूँ तो हरा भी हो सकता है” हमने पुनः यंत्र के माध्यम से चित्र लिए तो उसी अवस्था में हरे रंग की आभा मिली। पूछने पर उन्होंने बताया कि मनुष्य के मन में हो रहे क्षण,क्षण परिवर्तन उनसे निकलने वाले प्रकाश प्रवाह को बदलते रहते हैं, चूँकि यह विचारणा, भावना एवं संकल्प शक्ति से सुसम्बद्ध है। अतः चाहें तो हम में से हर कोई इसे विधेयात्मक रूप देकर अपनी मनः शक्तियों - अतीन्द्रिय सामर्थ्यों को विकसित कर सकता है अथवा निषेधात्मक विचार प्रवाह उत्पन्न कर स्वयं को पतनोन्मुख की दिशा दे सकता है। ऐसे व्यक्ति से सभी दूर बने रहेंगे। एक निगेटिव आँरा उससे सतत निकलता रहता है। विचारों की शक्ति व्यक्ति को एक चलता फिरता चुम्बक बना देती है जो आकर्षित भी कर सकता है विकर्षित भी। चेतन सत्ता का विलक्षण खेल है यह!

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