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कर्मकाण्ड भास्कर

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Reading: ॥ गुरु वन्दना॥ · Page 1

॥ गुरु वन्दना॥


गुरु व्यक्ति तक सीमित नहीं, वह एक दिव्य चेतन प्रवाह ईश्वर का ही एक अंश होता है। परीक्षा लेकर पास फेल करने वाले तथा पास में बिठाकर पढ़ाने वाले दोनों ही शिक्षक कहे जाते हैं। चेतना का एक अंश जो अनुशासन व्यवस्था बनाता, उसका फल देता है- वह ईश्वर है, दूसरा अंश जो अनुशासन मर्यादा सिखाता है, उसमें गति पैदा कराता है, वह गुरु है।

ऐसी चेतना के रूप में गुरु की वन्दना करके उस अनुशासन को अपने ऊपर आरोपित करना चाहिए, उसका उपकरण बनने के लिए भाव- भरा आवाहन करना चाहिए, ताकि अपनी वृत्तियाँ और शक्तियाँ उसके अनुरूप कार्य करती हुईं, उस सनातन गौरव की रक्षा कर सकें। हाथ जोड़कर नीचे लिखी गुरु- वन्दनाओं में से कोई एक अथवा वैसी ही अन्य वन्दनाएँ भावनापूर्वक सस्वर बोलें।

ॐ ब्रह्मानन्द परम सुखदं, केवलं ज्ञानमूर्तिं,
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं, तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं, सर्वधीसाक्षिभूतं,
भावातीतं त्रिगुणरहितं, सद्गुरू तं नमामि॥ 1॥ - गु.गी. 67
अखण्डानन्दबोधाय, शिष्यसंतापहारिणे।
सच्चिदानन्दरूपाय, तस्मै श्री गुरवे नमः॥ 2॥