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Books - प्रज्ञा पुराण भाग-2

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अनुबन्ध: समाख्यातो गुणकर्मस्वभावके। क्षेत्रे सद्वृत्तिमात्राणां वर्धनस्य मन: स्थिति:॥६३॥ दुष्प्रवृत्ती: सदा सर्वस्तरा: शीघ्रतयैव ता: । दूरीकर्तुं च सोत्साहं तत्परत्वमपीह च॥६४॥
टीका-गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में मात्र सत्प्रवृत्तियों को ही पनपने-बढ़ने देना चाहिए, दुष्प्रवृत्तियाँ जब भी, जिस स्तर की भी उगती दीखें, उन्हें सहन न करना, अविलंब उखाड़ फेंकने में तत्परता प्रकट करना अनुबंध है ॥६३-६४॥
अर्थ-यदा-कदा पनप उठने वाली बुराइयों की बाढ़ की कटाई-छँटाई समय पर करते रहना बहुत जरूरी है। यह अनुबंध, अनुशासन, व्रतशीलता की परिभाषा में ही समाया एक ऐसा तथ्य है, जिसे हर व्यक्ति को सतत् ध्यान में रखना चाहिए ।
उदारता ने महान् बनाया
जीवन के छोटे-छोटे क्षण भी मनुष्य को महान् बनाते हैं
नेपोलियन तब लड़का था । खेलने गया, तो भाग-दौड़ में सामने से आती एक लड़की से टकरा गया । लड़की गरीब घर की थी । फल का टोकरा लेकर जा रही थी । टक्कर से टोकरा गिरा और फल गंदगी-कीचड़ में गिर गए ।
लड़की रोने लगी । मजूरी भी गई और मालकिन से दंड भी भुगतना पड़ेगा ।
झंझट से बचने के लिए पहले तो नेपोलियन का मन आया कि जल्दी से भाग चलें । पीछे उसका मन लडकी की परिस्थिति के बारे में सोचकर पिघल गया । वह लड़की को उसके घर ले गया और गिरे हुए फलों का पैसा चुका देने का वायदा किया ।
घर पहुँचने पर नेपोलियन ने सारा किस्सा अपनी माँ को बताया और पैसा लड़की को चुका देने के लिए कहा । माँ कठोर स्वभाव की थी और साथ में पैसे की तंगी थी । वह पैसा देने की अपेक्षा शरारत के लिए नेपोलियन की पिटाई करने लगीं ।
कहने-सुनने के बाद फैसला हुआ कि लड़की को पैसा तो चुका दिया जाएगा; पर डेढ़ महीने तक उसको नाश्ता न मिलेगा । उसी से इसे पेशगी देकर राशि की भरपाई करनी होगी ।
नपोलियन खुशी-खुशी रजामंद हो गया। कर्तव्य-न्याय निभाने के लिए डेढ़ महीने एक समय भोजन करकेही काम चलाया। ऐसे उदारचेता ही भविष्य में महान् बनते है ।
अन्विषन्ति कुसंस्कारान् सञ्चिताञ्जागृतात्मान: । उत्पाटयन्ति सा मालाकारा इव तृणादिकम्॥६५॥ उद्यानात् सततं व्यक्ते: स्वभावादात्मनोऽस्ति सा । श्रेष्ठताया अभिव्यक्तिर्दृश्यन्ते सज्जना: सदा ॥६६॥
टीका-जागरूक आत्माएँ संचित कुसंस्कारों को उसी प्रकार ढूँढ़ती-उखाड़ती रहती हैं, जिस तरह माली उद्यान से हानिकारक खरपतवारों को बीनता रहता है । आत्मा की उत्कृष्टता व्यक्ति के स्वभाव से ही प्रकट होती है । सज्जनों को मात्र सत्कर्म ही करते देखा जाता है ॥६५-६६॥
अर्थ-व्यक्ति का स्वभाव ही उसके बहिरंग व्यवहार में झलकता है । माली की तरह आदमी को आत्मिक क्षेत्र मे सतत निराई-मुड़ाई कर सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने का अभ्यास करते रहना चाहिए। यही वास्तविक पराक्रम है, जो मानव को देव मानव बनाता है ।
दरवाजा निकाल दिया
ईश्वरचंद्र विद्यासागर कें पिता कलकत्ता में दो रुपया मासिक की नौकरी करते थे । अस्तु वे स्कूल तो नहीं जा सके; पर निजी प्रयत्नों से उनने माध्यमिक परीक्षा पास कर ली । ५०) रुपया मासिक की नौकरी मिल गयी। इतने पर भी उनने अपना रहन-सहन पुराना ही रखा । जो बचता, उसे निर्धन छात्रों के लिए खर्च कर देते । उनकी पदोन्नति होती रही । ५००) रुपया मासिक तक मिलने लगे । उनने समीपवर्ती क्षेत्र में अनेक छोटे-बड़े स्कूल खुलवाये और उनका प्राथमिक खर्च अपने पास से दिया । सहायतार्थ अनेक व्यक्ति उनसे मिलने आते थे । एक बार दरवाजा बंद देखकर एक दु:खी वापस लौट गया । उस दिन से उन्होंने दरवाजा ही निकाल दिया ।
बहु पत्नी प्रथा, बाल विवाह और विधवा विवाह पर उनने कानून बनवाये । उच्च वर्ण वालों ने इस पर बहुत विरोध किया; पर वे तीनों कानून पास कराके रहे ।
गाँधी जी और दर्पण 
गाँधी जी तो अपनी समीक्षा हर क्षण करते रहते थे ।
मीरा बेन ने गाँधी जी का एक संस्मरण लिखा है-'वे कभी दर्पण का उपयोग नहीं करते थे । बिना उसके ही अपने हाथों हजामत बनाते थे । एक दिन किसी ऐसे कमरे में ठहरना पड़ा जहाँ बड़ा सा दर्पण लगा था । गाँधी जी उसके सामने खड़े हो गए और आस-पास वाली को बुलाकर दिखाने लगे । देखो यही है न गाँधी, जिसे देखने न जाने लोग क्यों दौड़ते आते हैं और समय खराब करते है ।
बाँबी में कुछ न निकला
एक दिन में महान् बन जाने की कल्पना मूर्ख कर सकते है, समझदार नहीं । प्राचीन कथा है-
ब्रह्म देश में अश्वत्थ वृक्ष की जड़ में एक देव सर्प रहता था । एक ब्राह्मण ने उसे पहचान लिया सो रोज एक कटोरा दूध बाँबी पर रख कर उसकी पूजा करने लगा।
सर्प देव प्रसन्न हुए । वे नित्य दूध पी जाते और बदले में एक स्वर्ण मुद्रा उसी कटोरे में रख जाते । ब्राह्मण काधन भी बढ़ने लगा और लालच भी ।
ब्राह्मण ने सोचा, सर्प की बाँबी में स्वर्ण मुद्राओं का भंडार होगा, सो उसे मार कर एक ही दिन में क्यों न वह सारी राशि प्राप्त कर ली जाय । उसने घात लगाकर सर्प को मार डाला ।
खोदने पर बाँबी में कुछ भी न निकला। अति लालच से होने वाली हानि का अनुभव करके ब्राह्मण सिर धुन कर पछताता रहा । तथाकथित महान् बनने वाले भी इसी तरह उपहासास्पद बनते और घाटे में रहते है ।
सत्कर्माभिरता विज्ञा गुणवन्तो भवन्ति से। प्रतिभा: क्षमतास्ते च वर्धयन्ति वरिष्ठताम् ॥६७॥ क्रमार्गप्रस्थितानन्यान् वीक्ष्य नानुसरन्ति तान् । न चाकृष्टा भवन्त्येते तैनरैर्न प्रभाविता:॥६८॥ परं मार्ग विनिर्मान्ति स्वयमेवात्मन: सदा। निर्मान्ति श्रेष्ठतां क्या तेऽक्षुण्णां संकल्पमात्रगाम्॥६९॥
टीका-विज्ञजन तो गुणवान् भी होते हैं । वे अपनी क्षमता, प्रतिभा तथा वरिष्ठता का स्तर निरंतर बढ़ाते रहते हैं । दूसरे को कुमार्ग पर चलते देखकर, उनका अनुसरण नहीं करते, न उनसे प्रभावित-आकर्षित होते हैं, मार्ग बनाते हैं । अपनी श्रेष्ठता एकाकी के वरन् अपना आप संकल्प आधार पर अक्षुण्णरखते हैं ॥६७-६९॥
अर्थ-कहा गया है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है । इसका अर्थ यही है कि चुनाव की स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए मनुष्य को औचित्य के पथ का ही अवलंबन लेना चाहिए । कोई और न मिले तो एकाकी पुरुषार्थ के बल पर, अपना ध्येय निर्धारित कर, श्रेय पथ पर चल पड़ना चाहिए । महापुरुष लीक पर न चलकर, इसी कारण अपना मार्ग स्वयं बनाते एवं उत्कृष्टता का वरण कर प्रगति के चरम शिखर पर जा पहुँचते हैं ।
कम दाम बढिया माल
सुपर मार्केट के जन्मदाता बेकर इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं । बेकर ने एक नए ढंग की दुकान खोली । बढ़िया से बढ़िया माल और कम से कम मुनाफा। थोड़े दिनों में उनकी दुकान की सर्वत्र प्रशंसा हुई और ग्राहक अंधाधुंध आने लगे। वर्ष के अंत में जब मुनाफा देखा गया, तो चालाक दुकानदारों की अपेक्षा उन्हें अधिक ही लाभ हुआ । बेकर की नीति को अपनाकर ही आजकल जगह-जगह सुपर मार्केट दुकानें खुली हैं ।
उद्देश्यपूर्ण व्यापार
पेट भरने के लिए नौकरी या तिजारत सभी करते है; पर जमशेद जी टाटा दूसरी ही मिट्टी के के थे । उन्होंने देश की आवश्यकता पूरी करने और श्रमिकों को समुचित सुविधा देने के लिए उद्योग खड़े करने का प्रयत्न किया। इन प्रयत्नों में टाटानगर का लौह कारखाना सबसे अधिक सफल और प्रख्यात रहा । नीयत के अनुरूप उन्हें भगवान ने सफलता भी दी, जबकि उनके साथियों में से अनेक स्वार्थरत् रहने के कारण दिवालिया बनते रहे।
गाँधीवाद की प्रतिमूर्ति मश्रुवाला 
गाँधी की मृत्यु के उपरांत उनके पत्र  'हरिजन सेवक' के प्रकाशन की आवश्यकता समझी गयी, खोजा गया कि वह कौन व्यक्ति है जो गाँधी जी की विचारधारा का सही प्रतिनिधित्व करता हो । मूर्धन्य लोगों ने दृष्टि दौड़ाई और किशोरीलाल मश्रुवाला को उपयुक्त समझकर उनके मश्रुवाला कंधे पर ही यह कार्य भार सौंपा गया ।
वे न केवल विचारों की दृष्टि से, वरन् जीवनचर्या की दृष्टि से भी सच्चे गाँधीवादी थे । उनने अपनी पुस्तकों में प्रबल तर्को से यह सिद्ध किया कि न केवल खादी, वरन् आज की परिस्थितियों में हर क्षेत्र में, मितव्ययिता और सादगी बरतने की आवश्यकता है। उनने अपना व्यक्तिगत खर्च इतना कम रखा था, जिसे देखकर सभी को आश्चार्य होता था कि इतना बड़ा विद्वान् और दार्शनिक किस प्रकार अपने जीवन को कम खर्चे में चलाता है ।
श्री मश्रुवाला का साहित्य गाँधीवाद का मेरुदंड समझा जाता है । उनने शिक्षा, संयम, दृष्टिकोण, व्यवहार आदि के संबंध में ठीक वैसा ही लिखा है, जैसा गाँधी जी कहते और करते थे।
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