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Books - प्रज्ञा पुराण भाग-2

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भारतीय इतिहास-पुराणों में ऐसे अगणित उपाख्यान है, जिनमें मनुष्य के सम्मुख उगने वाली अगणित समस्याओं के समाधान विद्यमान हैं । उन्हीं में से सामयिक परिस्थिति एवं आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए कुछ का ऐसा चयन किया गया है, जो युग समस्याओं के समाधान में आज की स्थिति के अनुरूप योगदान दे सके । 
सर्वविदित है कि दार्शनिक और विवेचनात्मक प्रवचन-प्रतिपादन उन्हीं के गले उतरते हैं, जिनकी मनोभूमि सुविकसित है, परन्तु कथानकों की यह विशेषता है कि बाल, वृद्ध, नर-नारी, शिक्षित-अशिक्षित सभी की समझ में उगते हैं और उनके आधार पर ही किसी निष्कर्ष तक पहुँच सकना सम्भव होता है । लोकरंजन के साथ लोकमंगल का यह सर्वसुलभ लाभ है । 
कथा साहित्य की लोकप्रियता के संबंध में कुछ कहना व्यर्थ होगा । प्राचीन काल में १८ पुराण लिखे गए । उनसे भी काम न चला तो १८ उपपुराणों की रचना हुई । इन सब में कुल मिलाकर १०, ०००, ००० श्लोक हैं, जबकि चारों वेदों में मात्र बीस हजार मंत्र हैं । इसके अतिरिक्त भी संसार भर में इतना कथा साहित्य सजा गया है कि उन सबको तराजू के एक पलड़े पर रखा जाय और अन्य साहित्य को दूसरे पर तो कथाऐं ही भारी पडे़गी । 
समय परिवर्तनशील है । उसकी परिस्थितियाँ, मान्यताऐं, प्रथाऐं, समस्याऐं एवं आवश्यकताऐं भी बदलती रहती हैं । तदनुरूप ही उनके समाधान खोजने पड़ते हैं । इस शाश्वत सृष्टिक्रम को ध्यान में रखते हुए ऐसे युग साहित्य की आवश्यकता पड़ती रही है, जिसमें प्रस्तुत प्रसंगों से उपयुक्त प्रकाश एवं मार्गदर्शन उपलब्ध हो सके । इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अनेकानेक मन:स्थिति वालों के लिए उनकी परिस्थिति के अनुरूप समाधान ढूँढ़ निकालने में सुविधा दे सकने की दृष्टि से इस प्रज्ञा पुराण की रचना की गई, इसे चार खण्डों में प्रकाशित किया गया है । इन चार खण्डों में समग्र मानव धर्म के अन्तर्गत मान्यता प्राप्त इतिहास- पुराणों की कथाऐं हैं । इनमें अन्य धर्मावलम्बियों के क्षेत्र में प्रचलित कथाओं का भी समावेश है । 
संस्कृत श्लोकों तथा उसके अर्थों के उपनिषद् पक्ष के साथ उसकी व्याख्या एवं कथानकों के प्रयोजनों का स्पष्टीकरण करने का प्रयास इनमें किया गया है । वस्तुतः इनमें युग दर्शन का मर्म निहित है । सिद्धांतों एवं तथ्यों को महत्व देने वालों के लिए यह अंग भी समाधानकारक होगा । जो संस्कृत नहीं जानते, उनके लिए अर्थ व उसकी व्याख्या पढ़े लेने से भी काम चल सकता है । इन श्लोकों की रचना-अवनि है पर जिन तथ्यों का समावेश किया गया है, वे शाश्वत हैं । 
प्रस्तुत ग्रन्थ का पठन निजी स्वाध्याय के रूप में भी किया जा सकता है और सामूहिक सत्संग के रूप में भी । रात्रि के समय पारिवारिक लोक शिक्षण की दृष्टि से भी इसका उपयोग हो सकता है। बच्चे कथाऐं सुनने को उत्सुक रहते हैं । बड़ों को धर्म परम्पराऐं समझने की इच्छा रहती है । इनकी पूर्ति भी घर में इस आधार पर कथा क्रम और समय निधारित करके की जा सकती है । 
कथा आयोजनों को सामूहिक धर्मानुष्ठान के रूप में भी सम्पन्न किए जाने की परम्परा है । उस आधार पर भी इस कथावाचन का प्रयोग हो सकता है । आरम्भ का एक दिन देव पूजन, व्रत धारण, माहात्म्य आदि के मंगलाचरण में लगाया जा सकता है । चार दिन में चार खण्डों का सार संक्षेप, प्रात: और सायंकाल की दो बैठकों में सुनाया जा सकता है । अन्तिम दिन पूर्णाहुति का सामूहिक समारोह हो । बन पड़े तो अमृताशन (उबले धान्य, खीर, खिचड़ी आदि) की व्यवस्था की जा सकती है और विसर्जन शोभा यात्रा मिशन के बैनरों सहित निकाली जा सकती है । प्रज्ञा मिशन के प्रीतिभोजों में  अमृताशन की परम्परा इसलिए रखी गयी है कि वह मात्र उबलने के कारण बनाने में सुगम, लागत में  सस्ता तो है ही, साथ ही जाति-पाँति के आधार पर कच्ची-पक्की का जो भेदभाव चलता है, उसे भी निरस्त करते हुए मनुष्य मात्र को एक बिरादरी बनाने के लक्ष्य की और क्रमश: कदम बढ़ सकने का पंथ-प्रशस्त करता हैं । 
लोक शिक्षण के लिए गोष्ठियों-समारोहों में प्रवचनों-वक्ताओं की आवश्यकता पड़ती हैं । उन्हें दार्शनिक पृष्ठभूमि पर कहना ही नहीं, सुनना-समझना भी कठिन पड़ता है । फिर उनका भण्डार जल्दी ही चुक जाने पर वक्त को पलायन करना पड़ता है । उनकी कठिनाई का समाधान इस स्तब्ध से ही हो सकता है । विवेचनों, प्रसंगों के साथ कथानकों का समन्वय करते चलने पर वक्ता के पास इतनी बड़ी निधि हो जाती है किं उसे महीनों करता रहे । न कहने वाले पर भार पड़े न सुनने वाले उबे । इस दृष्टि से युग सृजेताओं के लिए लोक शिक्षण का एक उपयुक्त आधार उपलब्ध होता है । प्रज्ञा- पीठों और प्रज्ञा-संस्थानों में तो ऐसे कथा प्रसंग नियमित रूप से चलने ही चाहिए । ऐसे आयोजन एक स्थान पुर या मुहल्लों में अदल-बदल के भी किए जा सकते हैं ताकि युग सन्देश को अधिकाधिक लोग निकटवर्ती स्थान पर जाकर सरलतापूर्वक सुन उनके । ऐसे ही विचार इस सजन के साथ-साथ मन में उठते रहे हैं, जिन्हें पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया गया है । 
प्रथम खण्ड में युग संमस्याओं के कारण उद्भूत आस्था संकट का विवरण है एवं उससे उबर कर प्रज्ञा युग लाने की प्रक्रिया रूपी अवतार सत्ता डाल प्रणीत सन्देश है । भ्रष्ट चिन्तन एवं दुष्ट आचरण  से जूझने हेतु आध्यात्म दर्शन को किस तरह व्यावहारिक रूप में अपनाया जाना चाहिए, इसकी विस्तृत व्याख्या है एवं अन्त में महाप्रज्ञा के अवलम्बन से संभावित सतयुगी परिस्थतियों की झाँकी है । 
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