मॉन्ट्रियल में परम आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी का प्रेरक उद्बोधन — “श्रद्धा एवं पात्रता” के माध्यम से जीवन साधना का संदेश
सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन, जन-जागरण एवं मानवता के उत्थान के पावन उद्देश्य को लेकर नॉर्थ अमेरिका प्रवास पर पधारे अखिल विश्व गायत्री परिवार के युवा प्रतिनिधि एवं देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति परम आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने कनाडा के मॉन्ट्रियल नगर में आयोजित एक विशेष संगोष्ठी में “श्रद्धा एवं पात्रता” विषय पर अत्यंत प्रेरणादायी उद्बोधन प्रदान किया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में उपस्थित परिजनों, साधकों एवं प्रबुद्धजनों ने आदरणीय डॉ. पंड्या जी के विचारों को गहन आत्मीयता के साथ श्रवण किया। अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि श्रद्धा केवल एक भावनात्मक अनुभूति नहीं, बल्कि जीवन को श्रेष्ठ दिशा देने वाली दिव्य शक्ति है। जब श्रद्धा के साथ पात्रता का समन्वय होता है, तभी व्यक्ति गुरु-कृपा एवं ईश्वरीय अनुकम्पा का वास्तविक अधिकारी बन पाता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जीवन में सफलता, आत्मिक उन्नति एवं समाज सेवा के उच्च आदर्शों को प्राप्त करने के लिए निरंतर आत्मपरिष्कार, अनुशासन, सेवा एवं साधना आवश्यक हैं। श्रद्धा व्यक्ति को लक्ष्य से जोड़ती है, जबकि पात्रता उसे उस लक्ष्य को धारण करने योग्य बनाती है। यदि हम अपने व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बनाने का सतत प्रयास करें, तो जीवन में असंभव प्रतीत होने वाले कार्य भी संभव हो सकते हैं।
आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने उपस्थित परिजनों का आह्वान करते हुए कहा कि युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा स्थापित विचार क्रांति अभियान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं को संस्कारित एवं सक्षम बनाना होगा। उन्होंने गुरु-सत्ता के आदर्शों को जीवन में उतारते हुए समाज निर्माण, नैतिक जागरण एवं मानवीय मूल्यों के प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा दी।
सभागार में उपस्थित सैकड़ों परिजन इस प्रभावशाली एवं भावस्पर्शी उद्बोधन से गहराई से प्रभावित हुए। कार्यक्रम के उपरांत अनेक परिजनों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि यह मार्गदर्शन उनके लिए आत्ममंथन एवं आत्मविकास का प्रेरक अवसर बना। सम्पूर्ण वातावरण गुरु-भक्ति, श्रद्धा एवं सकारात्मक संकल्पों से ओत-प्रोत दिखाई दिया।

