‘जीवन संग्राम है अध्यात्म’ विषय पर आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने परिजनों को किया संबोधित।
गायत्री जयंती महापर्व-2026 के द्वितीय दिवस की संध्यावेला में देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी ने कहा कि आज हम सभी गायत्री जयंती के उस परम पावन पर्व पर एकत्रित हैं, जिसका चयन परम पूज्य गुरुदेव ने अपने महाप्रयाण के लिए किया था।
गायत्री जयंती पर्व की पूर्व संध्या पर शांतिकुंज के मुख्य सभागार में आयोजित ‘जीवन संग्राम है अध्यात्म’ विषयक विशेष उद्बोधन में हजारों कार्यकर्ता-परिजनों को संबोधित करते हुए आदरणीय डॉ. पंड्या जी ने परम पूज्य गुरुदेव के विचारों का स्मरण कराया। उन्होंने कहा कि पूज्य गुरुदेव का स्पष्ट संदेश था— “अपने आप को जानो और अपने मन को थामो।”
उन्होंने कहा कि मन मूलतः हमारा सेवक और मार्गदर्शक होना चाहिए था, किंतु हमने उसे अपना मालिक बना लिया है। यही कारण है कि अशांत मन के साथ हम संसार में शांति की खोज करते फिरते हैं, जबकि शांति का वास्तविक स्रोत हमारे भीतर ही विद्यमान है।
आदरणीय डॉ. पंड्या जी ने कहा कि हम प्रायः दूसरों को जीतने का प्रयास करते हैं, जबकि आवश्यकता स्वयं पर विजय प्राप्त करने की है। जैसे ही व्यक्ति स्वयं को साधने की दिशा में अग्रसर होता है, उसका मन स्थिर और शांत होने लगता है।
उन्होंने कहा कि हमारे और गुरुदेव के बीच जुड़ने में सबसे बड़ी बाधा है अहंकार। हम जितना अपने अहंकार को छोड़ते हैं, उतना ही गुरुसत्ता हमें अपने स्नेह और मार्गदर्शन से थाम लेती है।
अंत में उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं को जान लेता है, अपने मन को थाम लेता है तथा अपने अहंकार का परित्याग कर देता है, वही वास्तविक अर्थों में गुरुदेव का हो पाता है और उनके आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात कर सकता है। प्रस्तुत है मुख्य सभागार से कुछ छाया चित्र ....

