समुद्र मंथन के प्रेरणादायक सिद्धांत से जुड़ा पूज्य गुरुदेव का मंदार पर्वत यात्रा और आदरणीय डॉ. चिन्मय पंड्या जी का आध्यात्मिक अनुभव
प्रसिद्ध पौराणिक आख्यान के अनुसार भगवान विष्णु के निर्देश देने पर देवताओं ने क्षीर सागर का मंथन किया। इस हेतु मंदार पर्वत को मथनी बनाया गया और वासुकी नाग ने स्वयं का समर्पण रस्सी के उद्देश्य से किया। समुद्र मंथन के उपरांत ही भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के प्रसिद्ध रत्न यथा कामधेनु, धन्वंतरि महालक्ष्मी एवं अमृत का प्राकट्य हुआ, पर इन रत्नों में सबसे पहले रत्न के रूप में विष, गरल, कालकूट का प्रदुर्भाव हुआ। स्वयं भगवान शिव ने नीलकंठ बनकर उस विष को धारण किया ताकि मानवता अमृत का पान कर सके। भारतीय संस्कृति की इसी महान अभिव्यंजना को पूज्य गुरुदेव ने गायत्री परिवार की स्थापना का आधार बनाया और अखंड ज्योति के प्रकाशन के साथ ही लिखा सुधा बीज बोने से पहले कालकूट पीना होगा, पहन मौत का मुकुट विश्व हित मानव को जीना होगा।
स्वयं परम पूज्य गुरुदेव ने भी भगवान महाकाल की तरह कष्टों की राहों को चुनकर मानवता के लिए सौभाग्य के पथ को प्रशस्त करने का कार्य किया। संभवतः यही कारण है कि समुद्र मंथन की इस प्राचीन पौराणिक भूमि से उनका गहरा आध्यात्मिक संबंध रहा एवं सन् 1953 में उन्होंने स्वयं मंदार पर्वत बांका पर आकर आकाश गंगा एवं पापहारिणी सरोवर से तीर्थ की रज एवं जल को न केवल एकत्रित किया वरन् इसी स्थान पर रुककर विश्व वसुधा के कल्याण के लिए प्रार्थना भी करी। इस स्थान के दर्शन के भाव को लेकर और यहां से पूज्य गुरुदेव माताजी की ऊर्जा से अनुप्राणित होने मंदार पर्वत बांका में आकर डॉ चिन्मय पंड्या जी बहुत ही अभिभूत हुए और उन्होंने उस गुफा में भी ध्यान किया जहां पूज्य गुरुदेव ने 1953 में आकर ध्यान किया था।
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