हमारी वसीयत और विरासत (भाग 123): तपश्चर्या— आत्मशक्ति के उद्भव हेतु अनिवार्य:
भारतीय स्वाधीनता-संग्राम के दिनों महर्षि रमण का मौन तप चलता रहा। इसके अतिरिक्त भी हिमालय में अनेक उच्चस्तरीय आत्माओं की विशिष्ट तपश्चर्याएँ इसी निमित्त चलीं। राजनेताओं द्वारा संचालित आंदोलनों को सफल बनाने में इस अदृश्य सूत्र-संचालन का कितना बड़ा योगदान रहा, इसका स्थूलदृष्टि से अनुमान न लग सकेगा, किंतु सूक्ष्मदर्शी तथ्यान्वेषी उन रहस्यों पर पूरी तरह विश्वास करते हैं।
“जितना बड़ा कार्य उतना बड़ा उपाय-उपचार” के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए इस बार की विशिष्ट तपश्चर्या, वातावरण के प्रवाह को बदलने-सुधारने के लिए की गई है। इसलिए उसका स्तर और स्वरूप कठिन है। आरंभिक दिनों में जो काम कंधे पर आया था, वह भी लोक-मानस को परिष्कृत करने, जाग्रत आत्माओं को एक संगठन-सूत्र में पिरोने और रचनात्मक गतिविधियों का उत्साह उभारने का था। इसके लिए वक्ता, संगठन, गायक एवं प्रचार-साधन जुटाने से काम चलने वाला न था। इतने भर से काम चल जाया करे, तो इसकी व्यवस्था संपन्न लोग अपनी जेब से अथवा दूसरों से माँग-जाँचकर आसानी से पूर्ण कर लिया करते और अब तक स्थिति को बदलकर कुछ-से-कुछ बना लिया गया होता। कईयों ने पूरे जोर-शोर से यह प्रयत्न किए भी हैं। प्रचारात्मक साधनों के अंबार भी जुटाए हैं, पर उनके बलबूते कुछ ऐसा न बन पड़ा, जिसका कारगर प्रभाव हो सके। वस्तुस्थिति को समझने वाले निर्देशक ने सर्वप्रथम एक ही काम सौंपा— चौबीस साल की गायत्री महापुरश्चरण साधना-शृंखला का। पिछले तीस वर्षों में जो कुछ बन पड़ा, उसमें उसका श्रेय है। कमाई की वह हुंडी ही अब तक काम देती रही। अपना, व्यक्तिविशेष का, समाज का, संस्कृति का यदि कुछ भला अपने द्वारा बन पड़ा, तो इस चौबीस वर्ष के संचित भंडार को खरच किए जाने की बात ही समझी जा सकती है। उस समय भी मात्र जपसंख्या ही पूरी नहीं की गई थी, वरन् साथ ही कितने ही अनुबंध-अनुशासन एवं व्रतपालन भी जुड़े हुए थे।
जपसंख्या तो ज्यों-त्यों करके कोई भी खाली समय वाला पूरी कर सकता है, पर विलासी एवं अस्त-व्यस्त जीवनचर्या अपनाने वाला कोई व्यक्ति उतनी भर चिह्नपूजा से कोई बड़ा काम नहीं कर सकता। साथ में तपश्चर्या के कठोर विधान भी जुड़े रहने चाहिए, जो स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों ही शरीरों को तपाते और हर दृष्टि से समर्थ बनाते हैं। संचित कषाय-कल्मष भी आत्मिक प्रगति के मार्ग में बहुत बड़े व्यवधान होते हैं। उनका निवारण एवं निराकरण भी इसी भट्टी में प्रवेश करने से बन पड़ता है। जमीन में से निकालते समय लोहा मिट्टी मिला कच्चा होता है। अन्य धातुएँ भी ऐसी ही अनगढ़ स्थिति में होती हैं। उन्हें भट्टी में डालकर तपाया और प्रयोग के उपयुक्त बनाया जाता है। रसशास्त्री बहुमूल्य रस भस्में बनाने के लिए कई-कई अग्नि-संस्कार करते हैं। कुम्हार के पास बरतन पकाने के लिए उन्हें आँवे में तपाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। मनुष्यों पर भी यही नियम लागू होते हैं। ऋषि-मुनियों की सेवा-साधना— धर्मधारणा तो प्रकट है ही, साथ ही वे अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए— आवश्यक शक्ति अर्जित करने के लिए तपश्चर्या भी समय-समय पर अपनाते रहते थे। यह प्रक्रिया अपने-अपने ढंग से हर महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को संपन्न करनी पड़ी है; करनी पड़ेगी; क्योंकि ईश्वरप्रदत्त शक्तियों का उन्नयन, परिपोषण इसके बिना हो नहीं सकता। व्यक्तित्व में पवित्रता, प्रखरता और परिपक्वता न हो तो कहने योग्य— सराहने योग्य सफलताएँ प्राप्त कर सकने का सुयोग ही नहीं बनता। कुचक्र, छद्म और आतंक के बलबूते उपार्जित की गई सफलताएँ जादू के तमाशे में हथेली पर सरसों जमाने जैसे चमत्कार दिखाकर तिरोहित हो जाती हैं। बिना जड़ का पेड़ कब तक टिकेगा और किस प्रकार फूलेगा-फलेगा?
क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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