अहिंसा और हिंसा
अहिंसा को शास्त्रों में परम धर्म कहा गया है, क्योंकि यह मनुष्यता का प्रथम चिन्ह है। दूसरों को कष्ट, पीड़ा या दुःख देना निःसंदेह बुरी बात है, इस बुराई के करने पर हमें भयंकर पातक लगता है। और उस पातक के कारण नारकीय रारव यातनायें सहन करनी पड़ती हैं। बौद्ध और जैन धर्म तो अहिंसा को ही संपूर्ण धर्म मानते हैं। अन्य धर्मों में भी अहिंसा के लिए बहुत ऊँचा स्थान है।
ऐसे प्रधान धर्म का पालन करने के लिए यह आवश्यक है कि उसके तत्वज्ञान पर एक विवेचनात्मक दृष्टि डाली जाय। हमें जानना चाहिए कि हिंसा क्या है। और दूसरों को दुःख की व्याख्या क्या है। किसी को दुख न देने की मोटी कहावत तो इतनी स्थूल है कि उसका आचरण करने पर एक घंटे भी कोई प्राणी जीवित नहीं रह सकता और एक दिन भी ऐसी अहिंसा काम में आने लगे तो सृष्टि सर्वनाश ही समझना चाहिए। सिंह, व्याघ्र और सर्प, बिच्छुओं को दुख न देने की नीति ग्रहण की जाय तो सहस्रों निरपराध प्राणियों के प्राण संकट में पड़ते रहें।
हत्यारे और डाकुओं को न सताया जाय, तो समाज की सुख, शान्ति ही चली जावें जुँए, चीलर, रक्तजुँए, खटमल आदि को पाल कर रखा जाय, तो चैन से बैठना मुश्किल हो जाय। मक्खी, मच्छर, पिस्सू, बीमारियों के कीड़े फसल के शत्रु कीड़े आदि को न सताया जाय तो जीवनयापन होना कठिन है। शरीर के हिलने जुलने साँस लेने पानी पीने भोजन करने में अनिवार्यतः हिंसा होती है। इससे चार भाई भी उपाय नहीं है।
मूढ़ता के कारण अज्ञानी व्यक्ति जिन कार्यों को अहिंसा माने लेते हैं। असल में वह एक भ्रम मात्र है। जीवित पदार्थों में निरन्तर परिवर्तन हो रहा है कहा गया है कि जीवो जीवस्य भोजनम शाक अन्न दूध जल, वायु से जीवित प्राणियों को खाकर हम भी जीवित रहते है। ऐसी अनिवार्य हिंसा जो स्वाभाविक है,वह हिंसा नहीं कही जा सकती। अमुक शाक खाने में हिंसा हो जायगा या मुख पर पट्टी बाँधे बिना साँस लेने से हिंसा हो जायेगी। ऐसी सनक के लिए अपना समय और शक्ति बर्बाद करना व्यर्थ है क्योंकि यह अनिवार्य है। ढकोसले बनाने पर भी उसका बचाव नहीं हो सकता। मुँह पर पट्टी बाँध लेने से भी जीव पेट में पहुँचेगा, यह न पहुंचेंगे तो वह खुद ही मर जायगा।
अखण्ड ज्योति 1942 जुलाई
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