साधन और साध्य
गीताकार ने साधना क्रिया पर जोर देते हुए कहा है- ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।’ (गीता १८/४६) जो व्यक्ति सच्चाई के साथ अपना कार्य करता है, उसे ही सिद्धि मिलती है। कर्म साधना ही साध्य की अर्चना है।
साध्य कितना ही पवित्र, उत्कृष्ट, महान् क्यों न हो, यदि उस तक पहुँचने का साधन गलत है, दोषयुक्त है, तो साध्य की उपलब्धि भी असंभव है। उत्तम साध्य के लिए उत्तम साधनों का होना आवश्यक हे, अनिवार्य है। ठीक इसी तरह उत्कृष्ट साध्य-लक्ष्य का बोध न हो, तो उत्तम साधन भी हानिकारक सिद्ध हो जाते हैं।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सबसे बड़ी भूल हमारी यह होती है कि हम साध्य तो उत्तम चुन लेते हैं, महान् उत्कृष्ट लक्ष्य भी निर्धारित कर लेते हैं, लेकिन उसके अनुकूल साधनों के स्वरूप, उसकी उत्कृष्टता पर समुचित ध्यान नहीं देते। फलस्वरूप हमारे निज एवं सार्वजनिक सामाजिक जीवन में गतिरोध पैदा हो जाता है। हम अपने लक्ष्य को किसी भी तरह प्राप्त करने की कोशिश करते हैं तथा कई बार हम भ्रम में भटक कर गलत साधनों का उपयोग कर बैठते हैं। परिणामतः लक्ष्य के प्राप्त होने का जो संतोष एवं प्रसन्नता मिलनी चाहिए, उससे हम वंचित रह जाते हैं।
चाहे सामाजिक क्रांति हो या व्यक्तिगत साधना, लक्ष्य की प्राप्ति तभी संभव होगी, जब साधन और साध्य को जोड़कर मनुष्य साधन निष्ठ बनेगा।
उच्च पद, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए मनुष्य के सामने विस्तृत संसार पड़ा हुआ है, पुरुषार्थ और प्रयत्न के साथ मनुष्य कुछ भी प्राप्त कर सकता है। लेकिन वह इस राजमार्ग को न अपना कर दूसरों को नुकसान पहुँचाता है, बढ़ते हुओं की टाँग खींचता है, व्यर्थ ही संघर्ष पैदा करता है अथवा किसी की खुशामद-मिन्नतें करता है। ये दोनों ही साधन गलत हैं। इसके लिए व्यक्तिगत प्रयत्न आवश्यक है। अपने पुरुषार्थ के बल पर मनुष्य क्या नहीं प्राप्त कर सकता है?
लोग चलते हैं, जन सेवा का लक्ष्य लेकर, लेकिन वे जनता से अपनी सेवा कराने लगते हैं। बहुत से ज्ञानी उपदेशक धर्म पर चलने के लिए बड़े लम्बे-चौड़े उपदेश देते हैं, लेकिन उनके स्वयं के जीवन में अनेकों विकृतियाँ भरी पड़ी रहती हैं। देश सेवा के लिए, राष्ट्र को उन्नति और विकास की ओर अग्रसर करने के लिए लोग राजनीति में आते हैं, लेकिन अफसोस होता है जब वे पार्टीबाजी, सत्ता हथियाने के लिए, गुटबंदी के लिए परस्पर लड़ते-झगड़ते हैं, कूटनीति का गंदा खेल खेलते हैं, अपने घर भरते हैं, जनता की आँखों में धूल झोंकते हैं।
साधनों में इस तरह की भ्रष्टता व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अहितकर सिद्ध होती है। इससे किसी का भी भला नहीं होता, सिद्धि उनसे बहुत दूर हट जाती है। जिस तरह साधनों की पवित्रता आवश्यक है, उसी तरह साध्य की उत्कृष्टता भी आवश्यक है। साध्य निकृष्ट हो और उसमें अच्छे साधनों को भी लगा दिया जाय, तो कोई हितकर परिणाम प्राप्त नहीं होगा। उलटे उससे व्यक्ति और समाज की हानि ही होगी। उत्कृष्ट साधन भी निकृष्ट लक्ष्य की पूर्ति के आधार बन कर समाज में बुराइयाँ पैदा करने लगते हैं। अतः जिनके पास साधन हैं, माध्यम हैं उन्हें आवश्यकता है उत्कृष्ट लक्ष्य के निर्धारण की।
सफलता प्राप्ति के लिए उत्कृष्ट लक्ष्य का चयन एवं उसके अनुकूल ही उत्कृष्ट साधनों का समुचित उपयोग आवश्यक होता है। साध्य और साधन की एकरूपता ही सफलता की आधारशिला होती है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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