सेवा व्रत का आदर्श उपस्थित करने वाली- अवंतिका बाई गोखले
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पर गाँधी जी की कार्य प्रणाली प्रत्येक कार्य को जड़ से आरंभ करने की थी। भारतवर्ष की जड़ गाँवों में ही है। किसानों की संख्या संपूर्ण आबादी का ८० प्रतिशत थी और वे ही लोग समाज के 'अन्नदाता' थे। पर अशिक्षा, अज्ञान तथा विदेशी शासन ने उनको लुंज- पुंज बना रखा था। इस बात को समझकर गाँधी जी ने सबसे पहलेखेडा़ और चंपारन के 'किसान- सत्याग्रह' जैसे आंदोलन ही आरंभ किये।
चंपारन में कुछ अंग्रेज नील की खेती कराने का कार्य करते थे। वे बडे़ स्वार्थी और अहंकारी थे और अपने सम्मुख किसी का कुछ भी महत्व समझते ही न थे। देहाती किसान तो उनकी निगाह में भेड़- बकरियों की तरह ही थे। इसलिए बात- बात पर धमकाना, दंड़ देना, तंग करना उनका स्वभाव हो गया था। लखनऊ कांग्रेस में किसानों के एक प्रतिनिधि श्री रामकुमार शुक्ल द्वारा जब ये बातें गाँधी जी तक पहुँची और किसानों पर होने वाले अत्याचारों की कहानियाँ सुनी, तो उन्होंने उन पीडि़त लोगों की सहायता करने का निश्चय कर लिया। वे समझते थे कि यद्यपि "निलहे गोरे" इन लोगों पर अपने स्वार्थ की दृष्टि से ही जुल्म करते रहते हैं, पर इसमें किसानों के अज्ञान, निरक्षरता तथा कितनी ही हानिकारक रूढि़यों का दोष भी कम नहीं है। इसलिए एक तरफ तो गोरों के अन्यायों के विरुद्ध आंदोलन आरंभ किया गया और दूसरी तरफ कुछ ऐसे चुने हुए कार्यकर्ताओं को गुजरात और महाराष्ट्र प्रांतों से बुलाया गया, जो केवल सेवाभाव से बिहार के पिछ्डे़ गाँवों में रहकर, वहाँ की समस्त असुविधायें सहन करके, साथ ही गोरों की धमकियों की परवाह न करके, किसानों में सुधार का कार्य करते रहें। इन्हीं कार्यकर्ताओं में से एक अवंतिका बाई गोखले भी थी।
अवंतिका बाई बंबई की रहने वाली सुशिक्षित, सुसभ्य महिला थी, जो विलायत जाकर अंग्रेजों की सामाजिक प्रथाओं का अच्छा अनुभव प्राप्त कर चुकी थी। उसका पति श्री बबनराव इंगलैंड में ५ वर्ष तक एक अंग्रेज परिवार में रहा था और वे लोग उसकी योग्यता और सज्जनता को देखकर उसके साथ अपनी एक लड़की का विवाह करने को तैयार थे। बंबई में वे बढि़या मकान में रहते थे, जिसमें बिजली और गैस आदि की सब सुविधायें प्राप्त थी और बिहार के जिन गाँवों में उनको कई महीने रहना था, उनमें एक अच्छी लालटेन का मिल सकना भी कठिन था। पर गाँधी जी का आदेश मिलते ही वे दोनों पति- पत्नी चंपारन के लिए चल पडे़। अब तक वे सदैव सैकेंड क्लास में सफर किया करते थे, पर इस बार गाँधी जी के बुलाने पर जा रहे थे, इसलिए थर्ड क्लास में ही सवार हुए। महात्मा जी के पास पहले से ही खबर पहुँच गई थी, इसलिए उन्होंने कुछ लोगों को उनको लाने को भेजा, जिनमें देवदास गाँधी (महात्मा जी के सबसे छोटे पुत्र) भी थे। वे कहने लगे कि अवंतिका बाई तो दूसरे दर्जे में आयेंगी। महात्मा जी ने कहा- "अगर वे तीसरे दर्जे में आयेंगी तो उन्हें यहाँ रखूँगा, वरनाबंबई ही वापस भेज दूँगा।" गाडी़ रात के एक बजे आती थी। देवदास ने अवंतिका बाई को दूसरे दर्जे के डिब्बे में ही ढूँढा और जब वे न मिली तो कुछ देर बाद वापस चले आये। पर अवंतिका बाई अपने पति के साथ इससे पहले ही तीसरे दर्जे से उतरकर गाँधी जी के पास पहुँचकर एक कमरे में ठहर गई थी। देवदास ने महात्मा जी से कहा कि "अवंतिका बाई तो इस गाडी़ में नहीं आई।" यह सुनकर सब लोग हँसने लगे और महात्मा जी ने कहा- "मैंने तो पहले ही कहा था कि अवंतिका बाई तीसरे दर्जे में आयेगी।"
महात्मा गाँधी में मनुष्य के अंतःकरण को पहिचानने की विलक्षण शक्ति थी। इसी के बल पर उन्होंने उस "अंग्रेजियत" के दौर- दौरा के युग में ऐसे व्यक्तियों को ढूँढ़कर निकाल लिया, जिन्होंने बिना किसी आनाकानी के तुरंत अपने वैभवशाली जीवन क्रम का त्याग कर दिया और रेशम के स्थान पर मोटा खद्दर पहनकर जन- सेवा के कार्य में संलग्न हो गये। अवंतिका बाई भी गाँधी जी की इस कसौटी पर खरी उतरी। उनके जीवन का उद्देश्य जनसेवा ही था, और जब उन्होंने गांधी जी के सिद्धांतों की वास्तविकता को समझ लिया तो स्वयं तदनुसार परिवर्तित होने में देर न लगाई।

