राष्ट्रीय आंदोलन में जेल जाना-
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अवंतिका बाई बंबई के कांग्रेस आंदोलन की एक प्रमुख नेता थी। ७ अप्रेल १९३० को जब प्रथम बार नमक- कानून तोड़कर सत्याग्रह किया गया तो उस जुलूस में अवंतिका बाई भी अनेक सत्याग्रही महिलाओं के साथ उपस्थित थी। इन वीरांगनाओं को देखने के लिए पहले से ही महालक्ष्मी के मैदान में दस हजार व्यक्तियों की भीड़ इक्कठी हो गई थी। इसके पश्चात चौपाटी की सभा में भी अवंतिका बाई ने भाषण करते हुए महाराष्ट्र की वीरता का परिचय देकर जनता को आंदोलन में अधिकाधिक भाग लेने की प्रेरणा दी। ४ मई को जब गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया तो बंबई में एक दिन के बजाय तीन दिन हड़ताल रखी गई। श्रीमती सरोजिनी नायडू की अध्यक्षता में जो सार्वजनिक सभा हुई, उसमें अवंतिका बाई ने विदेशी कपडों के बहिष्कार पर जोर दिया और दूसरे दिन से ही विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर पिकेटिंग शुरू कर दी गई। सैकडो़ स्वयं- सेविकायेंप्रमुख कपड़ा मार्केटों के समाने खडे़ होकर लोगों को उनके खरीदने से रोकने लगी।
कुछ समय बाद लोगों का उत्साह बढा़ने के लिए शराब की दुकानों पर भी पिकेटिंग की जानी लगी। यह कार्य कुछ खतरनाक भी था, क्योंकि शराबी और शराब बेचने वालों में भले आदमियों की संख्या बहुत कम होती है। फिर भी अवंतिका बाई ने श्रीमती हंसा मेहता और अन्य स्वयं- सेवकों को लेकर बंबई के सबसे बदनाम मुहल्ले भिंडी बाजार की एक शराब की दुकान पर पिकेटींग आरंभ कर दी। इस समय सरकारी आर्डिनेंसके अनुसार पिकेटिंग करना जुर्म हो गया था। पर कुछ सोचकर अधिकारियों ने इनको गिरफ्तार नहीं किया।
जब कांग्रेस के अध्यक्ष पं० मोतीलाल नेहरू बंबई के "आजाद मैदान" में व्याख्यान देने पहुँचे, तो पुलिस कमिश्नर मि० हेली स्वयं सभा भंग करने को वहाँ मौजूद थे। उनके साथ ७०० पुलिस के सिपाही, ५०० सवार और ७५ सार्जेंट थे। भीड़ पर उनके हमला करने से सैकडों व्यक्ति घायल हुए। उन्होंने अपनी बदनामी से बचने के लिए सब महिलाओं को वहाँ से हट जाने को कहा। पर अवंतिका बाई ने कहा- "हम यहाँ पर हट जाने के लिए नहीं आई हैं, अपने भाईयों के साथ हम भी यहाँ डटी रहेंगी। आप चाहें तो हमें घोडो़ से कुचलवा दें।"
इसी प्रकार लोकमान्य तिलक की पुण्य तिथि के अवसर पर जो जुलूस निकाला गया और जिसमें मालवीय जी तथा सरदार पटेल भाई भी थे, उसको बोरीबंदर पर रोका गया। कई हजार लोगों ने अपने नेताओं के साथ पूरी रात वहीं पर व्यतीत कर दी, पर पीछे नहीं हटे। अवंतिका बाई भी इसमे थीं। जब पुलिस ने लाठी चार्ज किया तो ५००- ६०० व्यक्ति घायल हो गये, पर किसी ने हार नहीं मानी।
अंत में सरकार ने कांग्रेस कमेटी को ही गैरकानूनी घोषित कर दिया और कांग्रेस ऑफिस पर पुलिस का पहरा बैठा दिया गया। पर कांग्रेस कार्यकताओं ने हजारों घरों पर 'कांग्रेस- कार्यालय' का साइन बोर्ड लगा दिया और ज्योंही एक अध्यक्ष गिरफ्तार किया जाता कि दूसरा अध्यक्ष आकर उसका काम सँभाल लेता। जब बारह अध्यक्ष गिरफ्तार कर लिए गये तो अवंतिका बाई तेरहवीं अध्यक्ष बनी। उस समय कोई खास कार्यक्रम सामने न था। कांग्रेस कमेटी के साथ उसका झंडा भी गैरकानूनी करार दे दिया गया। इसलिए अवंतिका बाई के आदेशानुसार बहुसंख्यक राष्ट्रीय स्वयं- सेवक सार्वजनिक स्थानों में 'झंडाभिवादन' करते हुए जेल गये।

