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Books - अवन्तिका बाई गोखले

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


प्रत्येक सत्कार्य में सहायता-

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फिर भी 'हिंद महिला समाज' का मुख्य ध्येय स्त्रियों में शिक्षा प्रचार करना और सार्वजनिक सेवा के अवसरों पर उनमें यथाशक्ति सहयोग देना ही था। उसमें अंग्रेजी, मराठी और हिंदी पढा़ने की बहुत अच्छी व्यवस्था थी, पर फीस नाम मात्र की ही ली जाती थी। वे लोग केवल बंबई में ही शिक्षा कार्य नहीं करते थे, वरन् और भी अनेक छोटे नगरों में उनकी तरफ से साक्षरता प्रचार का कार्य बडी़ संलग्नता से किया जाता था। इसके द्वारा स्त्रियों को सिलाई, काढ़ना और चित्रकला का कार्य भी सिखाया जाता था और कुछ समय पहले तक इन कक्षाओं में एक हजार से भी अधिक महिलायें, उद्योग- धंधों की शिक्षा- प्राप्त करके स्वावलंबी जीवन व्यतीत करती थी। जब कभी कोई राष्ट्रीय या सामाजिक कार्य सम्मुख उपस्थित हुआ तो 'हिंद महिला समाज' की सदस्याओं ने उसमें उल्लेखनीय सहयोग दिया। इसका वर्णन करते हुए उनके जीवन चरित्र में कहा गया है-

"जब कभी परोपकार या राष्ट्रीय कार्य के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता होती थी, तो अवंतिका बाई अपनी 'समाज' की बहिनों को साथ लेकर उस कार्य में अग्रसर रहती। 'मलाबार सहायता- निधि' 'गुजरात- जल प्रलय निधि' कमला नेहरू- निधि' 'सावरकर- बंधु' 'शिवाजी- स्मारक' में उन्होंने इस प्रकार हजारों रू॰ जमा करके दिये थे। गरीबों को कपडे़ का प्रबंध गरीब प्रसूता स्त्रियों को पौष्टिक खुराक की व्यवस्था आदि कार्य वह हमेशा करती रहती थी। तलेगाँव के जनरल अस्पताल की स्त्रियों को दूध और बच्चों को कपडे़ देने का कार्य, उनके बाद भी वर्षों तक चलता रहा। हरिजन सेवा से तो उनको विशेष प्रेम था। इस काम में उन्होंने समाज की दूसरी महिलाओं को भी प्रेरणा दी। हरिजन बस्ती में जाकर भजन, कीर्तन, पुस्तक पाठ करना, हमेशा का कार्यक्रम रहता था। 'हिंद महिला समाज' का पुस्तकालय भी अवंतिका बाई के प्रयत्न से निरंतर प्रगति करता चला गया, जिसके परिणाम स्वरूप आज उसकी गिनती बंबई के बहुत बडे़ पुस्तकालयों में की जाती है।"

जो लोग देशसेवा और समाजहित के कार्यों में अपना जीवन अर्पण कर देते हैं, लोग उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए किसी प्रकार का स्मारक निर्माण करने की योजना बनाते हैं। पर अवंतिका बाई 'हिंद महिला समाज' के रूप में एक ऐसी परोपकारिणी संस्था की स्थापना कर गई हैं कि वह जब तक कायम रहेगी, उसके लिए एक बहुत उत्तम 'स्मारक' का काम करती रहेगी। 'समाज' के स्थायित्व और सुचारू संचालन के लिए उन्होंने कितना परिश्रम किया यह निम्न उदाहरण से विदित हो सकता है-

"अपने जीवन के अंतिम १७ सालों में अपने राजनीतिक जीवन और अन्य कार्यों से निवृत होकर, वह 'समाज के कार्यों में ही विलीन हो गई थी। उनके अथक परिश्रम से ही 'समाज' को आज गौरव- पूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है। 'समाज' के लिए आश्रयदाता ढूँढ़ना, दान प्राप्त करके फंड जमा करना आदि कार्य वे ही करती थी। श्रीमती सोफिया वाडिया, यमुना बाई आपटे और उन स्वयं के पति श्री बबनराव गोखले ने हजारों रूपया दान स्वरूप देकर 'समाज' की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाया। २०० रू॰ से अधिक देने वाले आश्रयदाता १०० से अधिक देने वाले आजीवन सदस्य और ५ से ५० रू॰ तक चंदा देने वाले अन्य सदस्यों की संख्या अनगिनती थी। इस प्रकार स्त्री- पुरूषों के सहयोग से 'समाज' की उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई।"

हमारी उच्च और मध्यम श्रेणी के घरों की जो महिलायें अपना समय अनेक प्रकार की निरर्थक बातों या फैशन और सजावट आदि में गँवाया करती हैं, अथवा आलस्यवश 'सोफा- सेटों' पर पडी़ रहती हैं और शिकायत करती रहती हैं, कि उनके करने के लिए कोई काम ही नहीं है, वे अवंतिका बाई के उदाहरण से शिक्षा ग्रहण कर सकती हैं। उनको समझ लेना चाहिए कि आलस्य में पडे़ रहना और समय गँवाना कोई सौभाग्य की बात नहीं है। जो पुरूष या स्त्रियाँ इस प्रकार के जीवन को बड़प्पन का चिह्म समझते हैं, वे बडी़ भूल में हैं। भगवान् ने यह शरीर और धन, संपत्ति आदि अन्य साधन, कुछ उपयोगी कार्य करने के लिये ही दिये हैं। जो इस ईश्वरीय विधान का उल्लंघन करता है, वह कभी सच्चा सुख नहीं पा सकता। यों तो नासमझ और कुबुद्धि वाले शराब, अफीम, भांग आदि जैसे दुर्व्यसनों में भी आनंद मानते हैं, पर इनके जो अंतिम परिणाम होते हैं, वह किसी से छिपा नहीं है ??

इसलिए बुद्धिमान और अपना कल्याण चाहने वाला उसी को कहा जा सकता है, जो अपने साधनों तथा सामर्थ्य को श्रेष्ठकार्यों में खर्च करे। अवंतिका बाई का जीवन इसके लिए बडा़ प्रेरणाप्रद है। हमारे यहाँ की स्त्रियाँ किसी सार्वजनिक सेवा का प्रश्न उठने पर, प्रायः घरबार की जिम्मेदारियों या सामाजिक परंपराओं का बहाना पेश कर देती हैं। अवंतिका बाई भी अगर चाहती तो अपने पति और अपनी आमदनी से बंगलों और कोठियों में रहने वालों की तरह आराम और फैशन का जीवन बिता सकती थी। पर उसने समझ लिया कि जो लोग केवल इन बातों में ही लगे रहकर समाज का और विशेषतः दीन- दुःखी जनों का कुछ भी हित साधन नहीं करते, उनका जन्म व्यर्थ ही जाता है। यही सोचकर उन्होंने अपने सब साधन परोपकार और सेवा कार्यों में लगा दिये, जिसके लिए आज तक उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

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