खादी प्रेम और प्रचार के लिए उद्योग-
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इसके कुछ समय पश्चात ही आंध्र का दौरा करते हुए महात्मा जी को हाथ से कते बहुत बारीक सूत की एकसाडी़ भेंट में मिली। वह उन्होंने अवंतिका बाई को दे दी। जब उन्होंने देखा कि चर्खा पर इतना बढि़या सूतकाता जा सकता है तो उन्हें एक नवीन प्रेरणा मिली और उन्होंने स्वयं सूत कातना आरंभ कर दिया। कुछ समय बाद उन्होंने अपने हाथ के सूत की बनी साडी़ पहन ली और पहले की रखी सब सूती साडी़ और रेशमीसाडि़याँ गरीबों को दे दी।
अपने हाथ की खादी की साडी़ पहनने के साथ ही उन्होंने यह भी निश्चय किया कि वह अपने हाथ की सूत की बनाई दो सूती धोतियाँ गाँधीजी को उनके जन्म- दिवस पर अर्पण किया करेंगी। उनका यह संकल्प अंतिम समय तक स्थिर रहा। सन् १९४२ में जब गाँधी जी पूना में कैद थे, तब भी उन्होंने उनके पास भेंट की धोतियाँ भेजने का निश्चय किया। जब बंबई के पुलिस कमिश्नर ने इसकी अनुमति देने से इनकार कर दिया तो अवंतिका बाई ने उनको रजिस्टर्ड डाक से जेलखानों के इंस्पेक्टर जनरल कर्नल भंडारी के पास भेज दिया और लिखा कि "गाँधी जी के जन्म- दिवस पर दो धोतियाँ देने का मेरा व्रत है। कृपया इन्हें उनके पास पहुँचा दें।" कर्नल भंडारी ने उस समय तो कोई उत्तर न दिया, पर २ अक्टूबर को वे स्वयं धोतियाँ लेकर गाँधी जी के पास पहुँचे और हँसकर कहने लगे "बताइये, मेरी बगल में क्या है ?" गाँधी जी ने तुरंत उत्तर दिया- " यह तो अवंतिका बाई का प्रसाद मालूम होता है।" इसके पश्चात् कर्नल भंडारी ने अवंतिका बाई की दो धोतियाँ पहुँचा देने की सूचना दी, तो उन्हें बडा़ हर्ष हुआ।

