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Books - अवन्तिका बाई गोखले

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


निरक्षर से विदुषी कैसे बनी

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अंवतिका बाई का जन्म सन् १८८२ में इंदौर में हुआ था। उस समय तक स्त्री शिक्षा का प्रचार बहुत कम हुआ था। उनके पिता श्री विष्णुपंत जोशी इंदौर में रेलवे कर्मचारी थे। वे पक्के ईमानदार व्यक्ति थे। जिस कार्य में दूसरे लोगों ने लाखों रूपये की कामाई कर ली उसमें वे एक पैसा भी "ऊपरी आमदनी" का लेना बुरा समझते थे। पर वैसे वे पुरानी परंपरा के अनुयायी थे और उन्होंने अवंतिका बाई का विवाह नौ वर्ष की आयु में ही कर दिया। उधर अवंतिका बाई के पति बबनराव का घर सुधारक विचारों का था। इसलिए एक निरक्षर लड़की का सम्मानपूर्वक निर्वाह हो सकना कठिन ही था। मराठी तो काम चलाऊ उसकी सास ने ही पढा़ दी। पर कुछ साल बाद जब बबनराव इंजीनियरिंग कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करके अधिक अनुभव प्राप्त करने के लिए विलायत गये, तो उन्होंने कहा कि अगर मेरे प्रवास- काल में अवंतिका बाई ने अंग्रेजी न सीख ली तो मैं विलायत से किसी अंग्रेज लेडी को विवाह करके ले आऊँगा। इस बात का प्रभाव अवंतिका बाई पर ऐसा पडा़कि उन्होंने एक- दो वर्ष में ही अच्छी तरह अंग्रेजी सीख ली।

जब बबनराव इंगलैंड और चीन में सात वर्ष काम करके भारत वापस आये तो एक मशीन संबंधी दुर्घटना में अंगूठों को छोड़कर उनके हाथों के पंजे कट गये थे। इंगलैंड की कंपनी फिर भी उनसे काम करते रहने का बहुत आग्रेह कर रही थी, पर घर वालों के कहने- सुनने से उनको रुक जाना पडा़। वे यंत्र- विद्या में बहुत होशियार थे और इसलिए बंबई रहकर भी काफी व्यवसाय चला सके, तो भी भविष्य का ख्याल करके उन्होंने अवंतिका बाई को नर्स की शिक्षा प्राप्त करने की सम्मति दी। तदनुसार बंबई के "मोटलबाई अस्पताल" में उनको भर्ती कराया गया। यद्यपि 'शिक्षणालय' के नियमानुसार उनकी आयु दो- तीन वर्ष कम थी, पर किसी प्रकार अधिकारियों को राजी कर लिया गया। "नर्सिंग" कार्य उस समय विशेष रूप से योरोपियन और एंग्लोइंडियन स्त्रियाँ ही करती थी। इसलिए शिक्षणालय में सिर्फ छह- सात हिंदू लड़कियाँ थी। हिंदू लड़कियों को मराठी में और योरोपियनों को अंग्रेजी में शिक्षा दी जाती थी। अवंतिका बाई को पहले "मराठी- विभाग" में ही रखा गया, पर कुछ समय पश्चात् उनकी योग्यता देखकर उन्हें "अंगेजी- विभाग" में बदल दिया गया। एक वर्ष तक ट्रेनिंग प्राप्त करके उन्होंने परीक्षा दी और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुई। कुछ समय बाद ही घर में उसकी चचेरी सास को प्रसव हुआ और उस कार्य में उन्होंने अपनी योग्यता प्रमाणित कर दी।

भारतीय स्त्रीयाँ इतना समय बीत जाने पर भी, अभी तक 'नर्स' के कार्य की महत्ता को नहीं समझ सकी हैं और जो कोई इस कार्य को करती हैं, उन्हें हीनता की दृष्टि से देखती हैं। विदेशों में मिस नाइटेंगिल जैसे विदुषी महिला सौ वर्ष से भी पहले अपने उच्च परिवार की शान- शौकत और बड़प्पन को त्याग कर 'नर्सिंग' के पेशे मेंपर्दापण किया था और हर तरह से स्वार्थ- त्याग करके उसे एक सम्माननीय कार्य का रूप दिया था। पर भारतवर्ष में सभ्य- समाज के कहलाने वाले अधिकांश स्त्री- पुरूष नर्सिंग का लाभ उठाते हुए भी उसे "इज्जत" का पेशा नहीं समझते। ऐसी दशा में बबनराव और अवंतिका बाई का कार्य निस्संदेह प्रशंसनीय था कि उन्होंने ब्राह्मण जैसे उच्च वर्ण और संपन्न परिवार के होते हुए भी आज से सत्तर वर्ष पूर्व नर्सिंग की शिक्षा प्राप्त की। यद्यपि घर की स्थिति के कारण उनको नर्स की नौकरी नहीं करनी पडी़, पर उन्होंने दीनजनों की सेवा में इसका बहुत उपयोग किया। चंपारन में भी गाँधी ने उन्हें सबसे पहले यही सोचकर बुलाया था कि वे ग्रामीण स्त्री- पुरूषोंतथा बालकों की सेवा करके, उनको स्वास्थ संबंधी सहायता देकर अपनी तरफ आकर्षित कर सकती हैं। फिर इसी गुण के कारण वह बंबई की सुप्रसिद्ध संस्था 'सेवा- सदन' की भी एक प्रमुख कार्यकर्ता बन गई।

इसमें संदेह नहीं कि सेवा भावी महिलाओं के लिए 'नर्सिंग' की शिक्षा बहुत अधिक उपयोगी है। 'नर्स' का कार्य विदेशों में इतना सम्मानजनक समझा जाता है कि बडे़- बडे़ लोग भी उनका आदर करते हैं और किसी भी सामाजिक समारोह में उनको प्राथमिकता दी जाती है। यदि जीवन निर्वाह के धंधे के रूप में काम करने वाली नर्सों का इतना महत्व है, तो जो समाज सेविका निःस्वार्थ भाव से, असहाय पीडि़तजनों के कष्टों का मोचन करने की भावना से इस कार्य को करेंगी तो उसकी पूजा- प्रतिष्ठा कौन नहीं करेगा?

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