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Books - अवन्तिका बाई गोखले

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


बंबई कारपोरेशन में सेवा कार्य-

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First 9 11 Last
      सन् १९२३ में अवंतिका बाई कॉर्पोरेशन की सदस्या नियुक्त की गई और आठ वर्ष तक वे वहाँ रहकर जनता के हित के विभिन्न कार्य करती रहीं। उन्होंने देखा कि बालकों के स्कूलों में जो खोंचा वाले खाने- पीने की चीजें बेचते हैं, वे प्रायः अशुद्ध और हानिकारक होती हैं। इसलिए उन्होंने कॉर्पोरेशन में प्रस्ताव रखा कि उनको स्कूल के भीतर न आने दिया जाय, क्योंकि इससे अनेक बार कठिन बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। अन्य सदस्यों ने भी इसकी युक्तियुक्तता को समझा और प्रस्ताव सर्व सम्मति से स्वीकृत हो गया। इसी प्रकार चौपाटी पर खोंचे वालों के कारण बडी़ गंदगी रहती थी। उनको रोकने को अवंतिका बाई ने प्रस्ताव किया। पर कई सदस्यों के समझाने से उन्होंने उसे वापस ले लिया। उन्होंने बंबई नगर में कई पाखाने खुलवाये और ऐसी व्यवस्था की कि उनसे गरीब वर्ग की महिलाएँ विशेष रूप से लाभ उठा सकें। गिरगाँव के पाखाने के विषय में अनेक शिकायतें सुनने में आती थी। अवंतिका बाई ने स्वयं उनकी जांच- पड़ताल करके उनको दूर कराया। <p><p>
     अवंतिका बाई को मातृभाषा के गौरव का भी सदा ध्यान रहता था। इसलिए जब उन्होंने देखा कि कार्पोरेशन के विधान में अंग्रेजी में ही भाषण करने का कोई नियम नहीं है, तो उसकी बैठकों में मराठी में ही भाषण करना आरंभ कर दिया। यह देखकर कई पारसी और गुजराती सदस्यों ने भी अपनी भाषा में भाषण करना आरंभ किया, जिससे कई सदस्यों को उनके समझने में कठिनाई होने लगी। कुछ समय बाद कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष श्री जोसेफ बैप्टिस्ट चुने गये। उनका अवंतिका बाई के साथ स्नेहपूर्ण संबंध था और वे जानते थे कि वह अच्छी तरह अंग्रेजी बोल सकती हैं ।। इसलिए उन्होंने अवंतिका बाई से अंग्रेजी में ही बोलने का आग्रह किया। एक बार तो अवंतिका बाई ने यही उत्तर दिया कि मराठी में बोलने का उनका अधिकार है। पर जब बैप्टिस्ट साहब ने हँसते हुए उनसे कहा- "यू मस्ट रिस्पेक्ट दि चेयर" (अर्थात् आपको अध्यक्ष की बात का आदर करना चाहिए), तो उन्होंने अधिक हठ न की और तब से बराबर अंग्रेजी में भाषण करती रहीं। <p><p>
      जब उन्हें स्थायी समिति का सदस्य नियुक्त किया गया, तो नियमानुसार प्रत्येक बैठक का ३० रू॰ भत्ता मिलने लगा। पहली बार जब इसके लिए उनके पास ३० रू॰ का चैक आया, तो वे उसे लेकर बिट्ठल भाई पटेल के पास गई और रूपया लेने से इनकार किया। बिट्ठल भाई ने उनको समझाया कि, सर जमशेद जी जीजाबाई जैसे करोड़पति भी भत्ता का रूपया ले लेते हैं, तब आप उसे अस्वीकार क्यों करती हैं? आप उसका उपयोग किसी भी अच्छे काम में कर सकती हैं। इस पर अवंतिका बाई रूपया लेकर उसे किसी सार्वजनिक संस्था को दान करने लगी। <p><p>
       स्वदेशी- प्रेम से प्रेरित होकर अवंतिका बाई ने यह प्रस्ताव पास कराया कि म्युनिसिपल स्कूलों में तकली पर सूत कातना सिखाया जाय। नियमानुसार इसे स्कूल कमेटी में विचारार्थ भेज दिया गया। दूसरा प्रस्ताव यह रखा कि कॉर्पोरेशन के सब कर्मचारी स्वदेशी का वस्त्र व्यवहार करें। अवंतिका बाई जानती थी कि कर्मचारियों से इसका पालन करा सकना बहुत कम संभव हैं, तब भी जब वह कुछ संशोधनों के साथ पास हो गया तो उनको बडी़ प्रसन्न्ता हुई, क्योंकि इस प्रकार कॉर्पोरेशन ने स्वदेशी का सिद्धांत स्वीकार कर लिया, जो अंग्रेजी शासन के जमाने में एक कठिन बात थी। <p><p>
     कॉर्पोरेशन में योग्यतापूर्वक कार्य करने का एक परिणाम यह हुआ कि सरकार की तरफ से उनको जे० पी० की उपाधि देकर आनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाने का निर्णय लिया गया। पर अवंतिका बाई जानती थी कि चाहे यह कार्य बिना वेतन के (आनरेरी) ही किया जायेगा, तो भी उन्हें सरकारी नियमों का पालन करना ही पडे़गा और वे राष्ट्रीय आंदोलन का कार्य स्वतंत्रतापूर्वक न कर सकेंगी। इसलिए उन्होंने बंबई के पुलिस कमिश्नर मि० हेली को लिख भेजा कि वे इस सम्मान को स्वीकार करने में असमर्थ हैं।
      बंबई कॉर्पोरेशन भारत की सबसे बडी़ नगरपालिका थी, जिसकी आय और खर्च करोडो़ का था। इसलिए जो लोग उसके सदस्य चुन लिए जाते थे, वे अपने को बडा़ सौभाग्यशाली समझते थे और किसी न किसी रूप में उसका लाभ उठाते ही थे। पर अवंतिका बाई ने अपनी सदस्यता के आठ वर्षो में जितने प्रस्ताव पेश किये और वक्तव्य दिये, वे सब जनसेवा की भावना से ही होते थे। जिस प्रकार अन्य सदस्य अपने संबंधियों या मित्रों की सिफारिशें लेकर उच्च अधिकारियों के पास जाते हैं, वैसा उन्होंने कभी नहीं किया। किसी अवसर पर म्युनिसिपल कमिश्नर मि० क्लेटन ने अपने भाषण में यह कहा था कि- "इस कॉर्पोरेशन का एक भी सदस्य ऐसा नहीं है, जो किसी न किसी से सिफारिश के साथ मेरे पास न आया हो।" यह सुनते ही अवंतिका बाई इसका प्रतिवाद करने को खडी़ हो गई। तब क्लेटन साहब ने कहा- "अवंतिका बाई, आप ही एक अपवाद हैं। क्लेटन साहब ने एक अन्य अवसर पर भी कॉर्पोरेशन की बैठक में कहा था- "अवंतिका बाई के कारण यहाँ का वातावरण गंभीर रहता है और समस्त चर्चा ऊँचे दर्जे की होती है। उनकी ईमानदारी और स्पष्टता लाजवाब है।" <p><p>

     यद्यपि कांग्रेस के कानून भंग आंदोलन में भाग लेने और ६ महीने की सजा दिये जाने के अधार पर सन् १९३१ में अवंतिका बाई को कॉर्पोरेशन की सदस्यता से हटा दिया गया, पर उसके सदस्य तथा अधिकारी सैदेव उनका आदर करते रहे। सन् १९४९ में उनका देहांत हो जाने पर, उसके अध्यक्ष डॉ० भास्करेन्हास ने शोक- प्रस्ताव उपस्थित किया। स्थायी समिति और स्वास्थ्य समिति ने शोक के प्रस्ताव पास किये। इस प्रकार अवंतिका बाई ने अपने व्यावहारिक आचरण से यह सिद्ध कर दिया कि यदि हम ईमानदारी और सच्चाई से काम लें तो हमारे विरोधियों को भी हमारी प्रशंसा करनी पडे़गी।


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