हिंद महिला समाज-
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यद्यपि वे आरंभ से ही गरीबों की सेवा की अभिलाषा रखती थी, क्योंकि सेवा के वास्तविक पात्र वे ही होते हैं। पर जिन संस्थाओं से वे संबंधित थी, उनकी अन्य सदस्याओं का दृष्टिकोण कुछ भिन्न था। उनमें से अधिकांश धनिक वर्ग की ही थी और वे इस "सेवा कार्य" को कुछ अंशों में एक फैशन के ढंग पर करती थी। जिस प्रकार इंगलैंड के महिला क्लबों में धनी घरों की स्त्रियाँ तरह- तरह के मनोरंजनों, खेल- कूद और गप्पेलडा़ने में समय बिताया करती हैं, वही हालत प्रायः बंबई की सेवा संस्थाओं की थी। गरीबों की तो बात क्या, मध्यम श्रेणी की स्त्रियाँ भी उनकी सदस्या नहीं बन सकती थी।
यह देखकर चंपारन से वापस आते ही सन् १९१८ में अवंतिका बाई ने उद्योग करके "हिंद महिला समाज" के नाम से एक नई संस्था की स्थापना की, जिसका उद्देश्य मध्यम श्रेणी की महिलाओं को कार्य क्षेत्र में लाना था। चंपारन की किसान और बंबई के मजदूर- वर्ग की स्त्रियों में काम करने से उन्हें यह अनुभव हुआ कि यहाँ की सामान्य स्त्रियों का स्वभाव अपने परिवार और जाति के स्वार्थ तक सीमित रहता है। इससे आगे बढ़कर समाज और देश की समस्याओं को समझने या इसके लिए कुछ कर सकने की रुचि उनमें नहीं पायी जाती। इसलिए उन्होंने 'हिंद महिला समाज' का संगठन इस तरह तैयार किया कि सभी वर्ग की महिलायें उसमें भाग ले सकें। जिस दिन इस संस्था की स्थापना की गई उसी दिन बंबई की कई हजार मध्यम श्रेणी की महिलायें उसमें उपस्थित हुई और उन्होंने उसके कार्यों में सब तरह से सहायता देने की अभिलाषा प्रकट की। अवंतिका बाई ने श्री जयकर की माता सोनाबाई को 'समाज' की अध्यक्षा बनाने का विचार प्रकट किया, पर सोनाबाई ने कहा कि- "मेरे जैसी वृद्धा से यह काम ठीक ढंग से नहीं चलाया जा सकेगा। इसके लिए किसी कर्मठ और उत्साही युवती को ही चुनना चाहिए।" उसने स्वयं अवंतिका बाई को ही अध्यक्ष बनाने का सुझाव दिया और सभा ने सर्व सम्मति से उसे स्वीकार किया। तब से जीवन के अंतिम दिन तक वे ही उस पद पर काम करती रही। इस 'समाज' के कार्यक्रम का सारांश इन शब्दों में मिल सकता है-
"स्त्री- समाज में परस्पर स्नेह और सहयोग की भावना उत्पन्न करना, शिक्षा का प्रचार, स्त्री जाति के सम्मुख पारस्परिक सहायता तथा सद्भावना का आदर्श उपस्थित करना, महिलाओं में साहित्य के लिए प्रेमबढा़ना और इसके लिए पुस्तकालय तथा वाचनालय खोलना, विद्वान वक्ताओं के व्याख्यान कराना, प्रवचन, कीर्तन आदि द्वारा ज्ञान का प्रसार करना, वाद- विवाद (डिबेट) की प्रतियोगिता की व्यवस्था करना, विविध कलायें सिखाना, स्वदेशी अर्थशास्त्र समझाना इत्यादि।"
पर जब 'समाज' की तरफ से एक वाचनालय खोला गया, तो उसमें समाचार पत्र तथा पुस्तकें पढ़ने कोई स्त्री नहीं आती थी। उस समय यह एक निराली बात समझी जाती थी कि स्त्रियाँ वाचनालय में जाकर अखबारपढे़ ।। उनके पति भी इसके विरुद्ध थे। अगर कोई स्त्री संयोगवश वहाँ चली जाती तो उस पर डाँट- फटकार पड़ती थी। यह देखकर अवंतिका बाई ने एक नया तरीका यह निकाला कि वह मिशनरी महिलाओं की तरह 'चालों' (सामूहिक निवास स्थानों) में अखबार और पुस्तकें लेकर घूमती और स्त्रियों को पढ़ने को दे आती अथवा किसी कमरे में बैठकर, आसपास की दस- बीस स्त्रियों को इकट्ठा कर लेती और उनको अखबार और पुस्तकें पढ़कर सुनाती। इस प्रकार जो कार्य हम "झोला पुस्तकालयों" द्वारा आज कर रहे हैं, वैसी ही कार्य प्रणाली अवंतिका बाई ने सौ वर्ष पहले अपनाई थी और आरंभ में निराशा हाथ लगने पर भी छह महीने में उसे सफल बनाकर दिखा दिया था।
फिर एक "व्याख्यान माला" की योजना की गई, उसमें स्त्रियों द्वारा राष्ट्रीय कार्य किये जाने के संबंध में, प्रतिमास किसी बहुत बडे़ विद्वान् का भाषण कराया जाता था। इसमें लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, मालवीय जी जैसे महान् नेताओं के भी भाषण हुए। इनका प्रभाव महिलाओं पर बहुत अधिक पडा़ और उनमें से आगे बढ़कर असहयोग तथा सत्याग्रह आंदोलनों में भाग लेने लगी। सन् १९३० के कानून- भंग आंदोलन में तो उन्होंने इतना काम किया कि देश में चारों ओर उनकी प्रशंसा होने लगी। इस दृष्टी से अवंतिका बाई का कार्यक्रम भी महात्मा गाँधी के स्वतंत्रता- संग्राम का एक महत्वपूर्ण अंग बन गया।
जब कांग्रेस की तरफ से लोकमान्य तिलक के स्मारक के रूप में एक फंड जमा किया जाने लगा, तो 'समाज' की सदस्याओं ने ३९०० रू॰ जमा करके महात्मा जी को दिया। उस समय गाँधी जी ने कहा कि- "इस ३९०० रू॰ में से १६०० रू॰) तो मेरी बहन अवंतिका बाई ने ही दिए हैं। दानदाताओं की सूची में १००रू० देने वाले के नाम भी बहुत कम दिखाई पड़ते हैं। मैने यह कभी नहीं सोचा था कि लोकमान्य के प्रति महाराष्ट्र में इतनी उदासीनता होगी।" महात्मा जी के इतना कहते ही महिलाओं की तरफ से नोट और गहनों की वर्षा होने लगी और कुछ ही मिनटों में ४००० रू॰ और इकट्ठा हो गया।
"हिंद महिला समाज" ने कांग्रेस के सूत कातने तथा खादी बुनने के कार्य में भी अच्छी प्रगति करके दिखाई। इसमें कुछ सूत
कातकर तैयार किया जाता था और साबरमती तथा बेलगाँव आदि से भी मँगाया जाता था। अवंतिका बाई ने आरंभ में दो तीन बुनाई के करघे स्वयं चलाये। बंबई के कितने ही मुहल्लों में फेरी लगाकर खादी का प्रचार भी किया।

