पति की सेवा
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बबनराव ने डाइनामाइट का विस्फोट करके मछलियों को पकड़ने का एक नया तरीका निकाला था। एक दिन उसका प्रयोग करते हुए, उनका हाथ बहुत घायल हो गया। खबर मिलते ही अवंतिका बाई उनके पास पहुँची और उसी समय अपनी साडी़ में से कपडा़ फाड़कर घाव को बाँध दिया, जिससे खून का बहना बंद हो गया। फिर वह उनको लेकर सूरत गई और एक प्रसिद्ध डॉक्टर से हाथ का ऑपरेशन कराया। डॉक्टर ने अवंतिका बाई की कम उम्र को देखकर (वह उस समय लगभग २० वर्ष की ही थी) ख्याल किया कि यह ऑपरेशन होते देखकर घबडा़ जायगी। इसलिए उन्होंने कहा कि आप इस समय बाहर जाकर बैठ जायें। पर अवंतिका बाई ने उत्तर दिया- "डॉक्टर, आप इसके लिए चिंता न कीजिये। मैंने नर्सिंग- कोर्स पूरा किया है। पिछले ४८ घंटों में मैंने ही उनकी मरहम पट्टी की है। आप ऑपरेशन का काम कीजिये, मैं इनकी नाडी़ देखतीरहूँगी।"
ऑपरेशन के बाद जब सब कोई घर आये और पहली बार अवंतिका बाई ने अपने हाथ से बनबराव को बच्चे की तरह खाना खिलाया, तो उनको यह ख्याल आया कि अब मैं कितना पराश्रित हो गया। चीन में हाथ कीअँगुललियाँ कट गई और अब दाहिना हाथ कलाई पर से अलग हो गया। इस पर अवंतिका बाई ने कहा- आपकी अँगुलियाँ चली गई तो क्या हुआ, मेरी तो दसों अँगुलियाँ मौजूद हैं। मेरे रहते आपको किसी तरह की तकलीफ नहीं हो सकेगी।"
हमारे देश के पुराने ख्यालात के लोग प्रायः कहा करते हैं कि अंग्रेजी पढ़- लिखकर स्त्रियाँ स्वच्छंद हो जाती हैं और पतियों की परवाह नहीं करती। पश्चिमीय औरतों की तो वे सदा बुराई किया ही करते हैं। उनके कथनानुसार अंग्रेजी ढ़ग की पढा़ई से स्त्रियों में से श्रद्धा, भक्ति, पति सेवा आदि का भाव मिट जाता हैं और वे भारतीय आदर्श से गिर जाती हैं। पर अवंतिका बाई ने अपने उदाहरण से यह सिद्ध कर दिया कि इस प्रकार का आक्षेप निराधार है। अंग्रेजी पढ़कर और विलायत जाकर भी स्त्री पूरी तरह पतिव्रता रह सकती है, और अपने सेवा भाव से घर के सब लोगों को संतुष्ट कर सकती है। शिक्षा और अनुभव के द्वारा किसी का पतन नहीं हो सकता। यदि कोई अनुचित मार्ग पर चलता है तो इसे व्यक्तिगत दोष ही समझना चाहिए।
आगे चलकर जब दियासलाई का कारखाना बंद करके बबनराव बंबई चले गये, तब अवंतिका बाई ने डेढ़ वर्ष तक नर्सिंग का कार्य करके उनकी आर्थिक चिंताओं को भी मिटाया। उस समय उनकी आमदनी ३०० रू॰मासिक थी, जिसे आजकल के भावों से दस हजार तो माना ही जा सकता है। जीवन के अंतिम समय तक वे पति को अपने हाथ का भोजन बनाकर खिलाती रही। मृत्यु के कुछ समय पहले कैंसर के कारण रोग शैय्या पर पड़ जाने पर ही उनका यह कार्य बंद हुआ।

