शिशु पालन गृह की स्थापना-
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कारखानों में जाने वाली मजदूर स्त्रियाँ काम पर जाते हुए अपने छोटे बच्चों को अफीम खिलाकर घरों में बंद कर जाती थी जिससे वे बीच में उठकर रोयें नहीं। यह प्रथा बडी़ हानिकारक थी और इससे बच्चे आरंभ से ही सुस्त, निस्तेज और अकर्मण्य से हो जाते थे। अवंतिका बाई ने मजदूर स्त्रियों को समझाया कि इस प्रकार अपने हाथ से अपनी संतान का अनहित करना बडा़ अनुचित है। वे स्त्रियाँ भी इस बात को मान गई, पर प्रश्न था कि वे यदि अफीम न दें, तो पीछे से बच्चों की देखभाल कौन करे? अवंतिका बाई ने इसका भार अपने ऊपर लिया और कुछ उदार सज्जनों की सहायता से एक शिशुपालन- गृह स्थापित कर दिया। अनेक उच्च पदाधिकारी अंग्रेज महिलायें भी इस कार्य में सहयोग देती थी। ऐसे "शिशुपालन गृहों" को अंग्रेजी में "क्रेश" कहते हैं और विदेशों में सभी बडे़ कारखानों में, जहाँ स्त्रियाँ मजदूरी करती हैं, इस प्रकार की व्यवस्था रहती है। यद्यपि अवंतिका बाई की योजना कुछ वर्ष ही चल सकी, फिर गाँधी जी के आंदोलन में कूद पड़ने के कारण, उसे बंद कर देना पडा़। पर इसने अन्य कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया और अब देश के बडे़ कारखानों में ऐसे "शिशुपालन- गृह" कारखानेदारों की तरफ से ही खोल दिये दिये गये हैं। इनमें माताओं के काम पर चले जाने पर बच्चों की देखभाल, सफाई, खिलाना, पिलाना, उसके वस्त्रों को धोकर ठीक कर देना आदि सब कार्य वहाँ के कार्यकर्ताओं द्वारा ही किये जाते हैं। मजदूरों तथा अछूतों आदि के लिए छोटे नगरों में इस तरह के सहायता कार्य करने की अब भी बडी़ आवश्यकता है और सेवाभावी स्त्री- पुरूष इस पुण्य- कार्य में सहयोग देकर अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं।

