देशभक्त दंपत्ति-
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२६ अक्टूबर को अवंतिका बाई अपने कुछ सहकारियों को लेकर जिनमें अधिक संख्या महिलाओं और लड़कियों की ही थी, आजाद मैदान में पहुँची। पुलिस ने उस पर पहले ही अधिकार कर रखा था। सार्जेंटों ने उनके हाथ से झंडा छीनने की बहुत कोशिश की, पर वे सफल न हो सके। हजारों व्यक्तियों के सम्मुख झंडाभिवादन करके तथा स्वयंसेवकों तथा स्वयंसेविकाओं की सलामी लेकर वह घर चली गई। इसके बाद अन्य सब लोग अपने झंडे फहराने लगे। पुलिस वाले झंडे छीनते रहे और नये- नये झंडे निकलते रहे। सार्जेंटों ने अनेक स्वयंसेविकाओं को लारी में भरकर कई मील दूर ले जाकर एक जंगल में छोड़ दिया। वहाँ से बहुत रात बीत जाने पर वे बंबई वापस आईं। उसी दिन शाम को एक मजदूर सभा को भंग करने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज किया। अवंतिका बाई ने पुलिस की बर्बरता के विरूद्ध एक वक्तव्य उसी समय समाचार पत्रों में निकलवाया।
दूसरे दिन दोपहर के बाद पुलिस अफसर अवंतिका बाई की गिरफ्तारी का वारंट लेकर उनके घर पहुँचा। वहाँ पर उपस्थित बबनराव ने कहा- कि वह कॉर्पोरेशन गई हैं। पुलिस वाले ने समझा कि वह उसे बहका रहे हैं, इसलिये उसने पूरे मकान की अच्छी तरह तलाशी ली। जब वहाँ वे न मिली तो कॉर्पोरेशन में रात के आठ बजे उनको गिरफ्तार किया गया।
२८ अक्टूबर को ही अवंतिका बाई के मुकदमे का फैसला कर दिया गया। अवंतिका बाई ने अपने बचाव में कुछ भी कहने से इनकार किया। इस पर मजिस्ट्रेट ने उन्हें ६ माह की कैद और ४०० रू० जुर्माना की सजा दी। पर अवंतिका बाई ने जुर्माना देने के बजाय तीन महीने की सख्त कैद के दंड को पसंद किया। इस प्रकार उनको कुल नौ माह की सजा दी गई। वह इस अवसर पर खूब प्रसन्न थीं और उन्होंने कहा- "जिस जेलखाने में भगवान् श्री कृष्ण का जन्म हुआ और जिसमें आज जगत् पूज्य महात्मा जी बंद हैं, उस पवित्र स्थल में जाकर मैं एक अपूर्व आनंद का अनुभव कर रही हूँ। विलायती कपड़ों तथा शराब की पिकेटिंग का कार्य महात्मा जी ने विशेष रूप से स्त्रियों के सुपुर्द किया है। हमारा कर्तव्य है कि हम उस कार्य को अच्छी तरह पूरा करें और प्रतिदिन एक घंटा सूत भी काता करें।"
अवंतिका बाई को यरवदा जेल भेजने की आज्ञा दी गई बबनराव उस समय उपस्थित थे। यद्यपि वे पिछले ३० वर्षों में कभी पृथक् नहीं हुये थे, पर इस समय देश की पुकार को ध्यान में रखकर, उन्होंने बिना किसी प्रकार के विषाद के इस निर्णय को स्वीकार किया। वास्तव में समाज सेवा और राष्ट्र सेवा का महत्त्व व्यक्तिगत सुख- सौख्य की अपेक्षा कहीं अधिक है। और जब ऐसा अवसर आये तो देश, धर्म और समाज को प्रधानता देना ही हम सबका आदर्श होना चाहिए।
इसके पश्चात् लार्ड इरविन के साथ गाँधी जी का समझौता हो जाने से सभी राजनैतिक कैदियों को छोड़ दिया गया और अवंतिका बाई को लगभग ४१/२ महीना ही जेल में रहना पडा़। बाहर आने पर रचनात्मक कार्यक्रम में उनकी आवश्यकता समझी गई और महात्मा जी ने खादी और साक्षरता के प्रचार का काम विशेष रूप से उनके सुपुर्द किया। इसलिए विभिन्न स्थानों में महिलाओं की गोष्ठियाँ करके खादी के लाभ को समझाया करती थीं। साक्षरता का कार्यक्रम वे पूर्ववत् "हिंद महिला- समाज" के माध्यम से करती रहीं, पर सन् १९३२ में लार्ड विलिंगटन की नीति के कारण सत्याग्रह आंदोलन पुन: उठाया गया। गाँधी जी को तो विलायत में होने वाली "राउंड टेबिल कान्फ्रेन्स" से लौटते ही गिरफ्तार कर लिया गया और ४ जनवरी, १९३३ को ही एक आर्डिनेंस निकालकर कांग्रेस को फिर गैर कानूनी संस्था घोषित कर दिया गया। इसके बाद देशभर के प्रमुख कार्यकर्ता धडा़धड़ गिरफ्तार किये जाने लगे। अवंतिका बाई को भी अपनी गिरफ्तारी का अनुमान हो गया था। इसलिए उन्होंने अपने पति बबनराव की सब व्यवस्था ठीक कर दी और जैसे ही पुलिस की गाडी़ उन्हें गिरफ्तार करने आयी, वे तुरंत चलने को तैयार हो गईं।
इस बार वे नजरबंद के रूप में दो महीने तक जेल में रखी गईं। उसके बाद नजरबंदों को एक शर्तनामे पर दस्तखत कराके छोड़ देने का आदेश था। पर उसकी शर्तें ऐसी खराब थीं कि कोई सच्चा कार्यकर्ता उसके लिए तैयार नहीं होता था। पर अवंतिका बाई को बिना किसी शर्त के ही रिहा कर दिया गया। इस प्रकार इस देशभक्त दंपत्ति ने अपने सुख- दुःख या बिछोह की चिंता न करके राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का यथोचित रूप से पालन किया। उनका कार्य निस्संदेह अनेक दंपत्तियों के लिए प्रेरणादायक है।

