समाज- सेवा का व्रत-
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सेवा- सदन में सबसे पहले वह स्त्री- शिक्षा का कार्य करने लगी। पढा़ने की विधी उन्होंने देवधर जी से ही सीखी और कुछ समय बाद स्वतंत्र रूप से स्त्रियों को अंग्रेजी पढा़ने लगी। पर उनका विशेष ध्यान मजदूरों की तरफ था। उन्होंने विलायत की मजदूर बस्तियों में इस प्रकार के सेवाकार्य को देखा था, इसलिए वे भी प्रति सप्ताह बंबई की लाल बाग स्थित मजदूर बस्ती में जाकर तीन घंटे मजदूरों को सफाई और स्वास्थ्यप्रद रहन- सहन की शिक्षा देती थी। वे स्त्रियों को शिशुपालन का सही तरीका समझाती। अछूतों की दुर्दशा उनको बडी़दुःखदायी प्रतीत होती थी। इसलिए प्रायः उनके मुहल्ले में जाकर उनकी दशा का अवलोकन करती और जिस प्रकार होता उनकी सहायता को तत्पर रहती। मकर संक्रांति के त्यौहार पर, जिसे महाराष्ट्र में "हल्दी कूँक" कहते हैं, वे हरिजनों के मुहल्ले में जाकर उनकी स्त्रियों को "हल्दी- रोरी" देती और सबको तिल के लड्डू बाटँती।
अछूतों की समस्या अभी तक सुलझ नहीं रही है। महात्मा गाँधी के अपार त्याग और कष्ट सहन के परिणाम स्वरूप आजकल अछूतों को कुछ कानूनी अधिकार मिल गये हैं और छोटी- बडी़ सरकारी नौकरियों में भी वे कुछ स्थान पा जाते हैं, पर अभी तक सामाजिक भेदभाव के व्यवहार में, जो उनके साथ पुराने समय से होता आया है, अधिक अंतर नहीं पडा़ है। शिक्षितजनों का एक भाग चाहे छुआछूत की व्याधि से कुछ मुक्त हो गया है, ग्रामीण और अशिक्षित जनता जिसकी संख्या सौ में से अस्सी के लगभग है, अभी तक बहुत कम बदली हैं। अवंतिका बाई के लिए यह बडे़ गौरव की बात थी कि उसने आज से ९०- ९५ वर्ष पहले अछूतों के साथ भाईचारे का व्यवहार करके, लोगों का ध्यान इस महत्वपूर्ण समस्या की तरफ आकर्षित किया।

