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Books - अवन्तिका बाई गोखले

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


पति की बीमारी कारण कार्यक्रम में परिवर्तन

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First 12 14 Last
सन् १९३३ में बबनराव को हृदय की बीमारी हो गई। इसका आक्रमण आकस्मिक रूप से होता है, इसलिए अवंतिका बाई का उनसे थोडी़ देर भी अलग रहना ठीक न था। इस कारण राजनैतिक आंदोलन में भाग लेना असंभव हो गया और महात्मा जी ने भी उन्हें स्पष्ट रूप से जब तक पति स्वस्थ न हो जाये, पूर्ण रूप से उनकी सेवा में लगे रहने का आदेश दिया। यही कारण था कि सन् १९३७ में देश में कांग्रेसी- सरकार कायम होते समय श्रीमती सरोजिनी नायडू के बहुत जोर पर भी वे विधान सभा की सदस्यता के लिए खडी़ न हुईं। आगे चलकर १९४० के व्यक्तिगत सत्याग्रह और सन् १९४५ के "भारत छोडो़" आन्दोलन में भी भाग ले सकीं। इसके बाद वे १५ वर्ष तक पति की पूरी तरह से देखभाल ही करती रहीं।

पर इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने सार्वजनिक कार्य को छोड़ दिया। महात्मा जी ने उनको खादी और साक्षरता प्रचार का आदेश दिया था। इसे वे 'हिंद महिला समाज' के माध्यम से बराबर करती रहीं। 'समाज' का कार्यालय, एक प्रकार से उनके घर पर ही था। अपनी परिस्थिति को समझकर वे ऐसी व्यवस्था करने लगीं, जिससे धन अथवा कार्यकर्त्रियों के अभाव से उसके मार्ग में रुकावट न पडे़। इसके लिए उन्होंने बहुत से नियमित आर्थिक सहायता देने वाले तैयार किये और बहुत- सी योग्य महिलाओं को 'समाज' का कार्य संचालन करने के लिए प्रशिक्षित किया। पर 'समाज' का कार्य करते हुए उन्होंने अपने को अधिकार और यश की लालसा से सदा दूर रखा। वे उसकी व्यवस्था कैसे करती हैं और उन्हें इसके लिए कितना परिश्रम करना पड़ता है ?? इसकी चर्चा वे कभी किसी के सामने नहीं करती थीं। एक निष्काम कर्मयोगी की तरह वे चुपचाप अपना कर्तव्यपालन करके अलग हट जाती थीं और कार्य का यश दूसरो को ही देना पंसद करती थीं।

बीमारी और अंतिम जीवन-

अवंतिका बाई का स्वास्थ्य पहले काफी अच्छा था और उसी के आधार पर वह राष्ट्रीय महिला आंदोलनों में बहुत अधिक परिश्रम करके उनको सफल बना सकी थीं। पर जेल- जीवन का उनके स्वास्थ्य पर बहुत खराब प्रभाव पडा़। पर घर- गृहस्थी में रहने वालों और स्वास्थ्य के नियमों के अनुसार चलने वाली स्त्री थीं। जेलखाने के कठोर नियमों तथा वहाँ के अस्वास्थ्यकर खान- पान ने उनके स्वास्थ्य को सदा के लिए खराब कर दिया। डॉक्टरों की सलाह से वह स्वास्थ्य- सुधार के लिए कुछ समय के लिए कश्मीर भी गई, पर बिगडा़ हुआ स्वास्थ्य फिर पूर्ववत् दशा में आ आया।

सन् १९४७ में जब उनकी तबियत अधिक खराब रहने लगी तो बडे़ चिकित्सकों से सलाह लेकर ली गई। मालूम हुआ कि उनको कैंसर का रोग हो गया है, जो असाध्य माना जाता है। अवंतिका बाई ने इसकी भी अधिक चिंता न की और होनहार को अनिवार्य समझकर अपने कार्य में लगी रहीं। अब वह ज्यादा चल फिर तो नहीं सकती थी, पर बैठे- बैठे ही हिंद महिला- समाज का कार्य करती रहती थीं। उसी समय बबनराव पर लकवा का आक्रमण हुआ, जिससे उनकी दशा बहुत ही शोचनीय हो गई। अवंतिका बाई अपनी बीमारी को भूलकर, रात- दिन उनकी सेवा में संलग्न रहने लगीं। उनकी सेवा- परिचर्या से बबनराम का प्राण- संकट टल गया और वे स्वस्थ हो गये। पर इस प्रकार बीमार होते हुये भी अतिरिक्त श्रम करने से अवंतिका बाई की हालत खराब हो गई और फिर उसी बीमारी में उनका अंत हो गया।

पर कैंसर जैसी घातक बीमारी में ग्रसित होने पर भी उनको अपने नियम तथा कर्तव्य का कितना ध्यान था ?? इसका पता इस बात से चलता है कि उस दशा में भी उन्होंने महात्मा जी के जन्म दिवस पर सदा की तरह दो धोतियाँ भेजने की पूरी चेष्टा की। उन्होंने सूत तैयार करके बुनने को भी दिया, पर धोतियाँ २ अक्टूबर तक न आ सकीं। महात्मा जी उस समय दिल्ली में थे, इसलिए उन्होंने वही पर पत्र भेजकर इस त्रुटि के लिए क्षमा- प्रार्थना की और अपनी बीमारी का हाल भी लिखा। महात्मा जी ने इस पत्र के उत्तर में कहा- "तुम्हें कैंसर कहाँ से हुआ? मुझे तो तुम्हारे पत्र से ही यह समाचार मालूम हुआ। क्या वह ठीक हो सकता है? पत्र द्वारा पूरी जानकारी देना। अब धोती भेजने का मोह क्यों करती हो? तुमने तो बहुत वर्षों तक इस व्रत का पालन किया। अब यह मोह छोड़ दो।"

इसके चार महीने बाद ही दिल्ली में महात्मा जी की हत्या कर दी गई। अवंतिका बाई पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पडा़। उन्हें अपना जीवन निःसार प्रतीत होने लगा। जहाँ गांधी जी जैसे विश्व- हित के उपासक के प्रति ऐसा वीभत्स व्यवहार किया जा सकता है, वैसी दुनिया में रहने से ही क्या? उन्होंने अपनी दवा करनी भी छोड़ दी और यह कामना करने लगी कि मृत्यु शीघ्र ही आकर इस नश्वर जीवन का अंत कर दे। मृत्यु के कुछ दिन पहले तो उनकी यह हालत हो गई कि कभी- कभी एकाएक चिल्ला उठती- "बापू मुझे बुला रहे हैं।" इस पर बबनराव उनसे कहते कि "बापू जी ने हम दोनों को हमेशा साथ देखा है। वह तुम्हें अकेली कैसे बुलायेंगे?" अवंतिका बाई कहती- "हाँ यह भी ठीक है, लेकिन मेरे जाने के बाद कुछ महीनों में आप भी वहाँ आ जायेंगे।" इसी प्रकार की भावना करते- करते २६ मार्च १९४९ को उनका देहावसान हो गया।

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