निरक्षर से विदुषी कैसे बनी
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जिस समय अवंतिका बाई 'नर्सिंग' का कोर्स पढ़ रही थी, उस समय बात- चीत होते- होते किसी डॉक्टर ने कहा कि "नर्सिंग" कार्य में योरोपियन महिलायें जितनी कुशल, साहसी और संलग्नता से कार्य करने वाली होती हैं, इतनी हिंदू स्त्रियाँ हो ही नहीं सकती।" अवंतिका बाई ने उसी समय उत्तर दिया कि यदि कोई अवसर आया तो मैं सिद्ध कर दूँगी कि इस दृष्टि से भारतीय महिलायें किसी प्रकार कम नहीं है। संयोग से एक ही वर्ष बाद बंबईमें चेचक की बीमारी बडे़ भयंकर रूप से फैली और सैकडों मौतें होने लगी। अस्पताल रोगियों से भर गये। अवंतिका बाई उस समय व्यारा नामक स्थान में जो बडौ़दा (गुजरात) में है, अपने पति के साथ दियासलाई के सर्वप्रथम भारतीय कारखाने का संचालन कर रही थी। उस डॉक्टर ने वहीं पत्र भेजकर अवंतिका बाई को बंबईआने और चेचक के मरीजों की सेवा करके अपने शब्दों को चरितार्थ करने के लिए सूचित किया। यद्यपि उस समय बंबई में चेचक ने बडा़ भंयकर और घातक रूप धारण कर रखा था और उसकी छूत से बडे़- बडे़ डॉक्टर घबराने लगे थे। पर अवंतिका बाई निर्भय होकर कार्यक्षेत्र में पहुँच गई और छह महीने तक ऐसी तत्परता से चेचक के मरणासन्न रोगियों की सेवा करती रही कि अस्पताल के बडे़ डॉक्टर भी दंग रह गये। उनके परिश्रम और कुशलता से बहुसंख्यक व्यक्तियों की प्राण रक्षा हो सकी। उसको चुनौती देने वाले डॉक्टर साहब का तो कहना ही क्या? उन्होंने मुक्त- कंठ से अपनी भूल और अवंतिका बाई की श्रेष्ठता स्वीकार की। इस प्रकार उन्होंने स्वयं अपने को संकट में डालकर भी भारतीय महिलाओं की कीर्ति को बढा़या।

