अवंतिका बाई की विशेषताएँ-
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अवंतिका बाई ने केवल खादी और सत्याग्रह के विषय में ही गाँधी जी का अनुसरण नहीं किया, वरन् वह निजी जीवन में भी उनके पद चिंहो पर चलना चाहती थी। जब बबनराव की आयु ५० वर्ष की हो गई तो अवंतिका बाई ने उनसे प्रस्ताव किया कि "अब हम दोनों ब्रह्मचर्य का पालन करें।" बबनराव ने कहा की "५० वर्ष की आयु कोई ऐसी नहीं होती कि मनुष्य वैवाहिक- जीवन की प्रवृत्तियों का त्याग कर दे ।" अवंतिका बाई ने उन्हें समझाया कि गांधी जी तो ३५ वर्ष की आयु से ही ब्रह्मचर्य का पालन करने लग गये थे आपको ५० वर्ष की आयु में तो कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। विलायत में शराब पीने की आदत को जब आपने सहज में ही छोड़ दिया था, तो इस तरह का संयम रखना आपके लिए साधारण बात है।" अंत में बबनराव भी उससे सहमत हो गये और वे घर में भाई- बहिन की तरह रहने लगे।
अवंतिका बाई एक नये विचारों की स्त्री थी और धार्मिक अंधविश्वासों से सर्वथा दूर ही रहती थी, पर पति सेवा के मामले में वह अंत समय तक पुराने आदर्श की ही अनुयायी बनी रही। उसके पति के दोनों हाथ युवावस्था में जाते रहे थे, पर उन्होंने उनकी आवश्यकताओं की सदैव इस प्रकार पूर्ति की कि बबनराव को कभी अपने असहाय अवस्था का ख्याल नहीं आया। वह उनके छोटे- बडे़ सभी कामों को पहले से ही पूरा करके रखती थीं।पति के संबंध में वह इतनी भावुक थी कि उनसे संबंधित सभी परंपरागत रूढि़यों का वह पालन करती रहती थी। महाराष्ट्र की सुहागिन स्त्रियों में काले काँच के दानों की एक माला गले में पहिनने का रिवाज है। इस सुहाग चिह्म का वह मरते समय तक परित्याग न कर सकी। जेल जाते समय वहाँ के कर्मचारी तमाम गहने उतरवा देते हैं। इस सुहाग- चिह्म को भी किसी के पास शेष नहीं रहने देते। इस बात को समझकर अवंतिका बाई ने केवल पाँच दानों की छोटी- सी माला बनाकर छुपाकर रख ली थी। इस प्रकार पति प्रेम वशीभूत होकर उन्होंने सत्यवादिता के नियम की भी अवहेलना कर दी और अपनी इस कमजोरी को महात्मा जी के सामने स्वीकार भी कर लिया।
हो सकता है कुछ लोग इसे वास्तव में अवंतिका बाई की दुर्बलता और रूढि़वादिता ही समझें, पर जीवन में ऐसे भी प्रसंग आते हैं, जब मनुष्य जानबूझ कर भी एकाध त्रुटी कर देता है। पर इसका संबंध व्यक्तिगत जीवन से होता है और वह एक ऐसा गुप्त और पवित्र रहस्य होता है, जिसे प्रायः दूसरों के समक्ष प्रकट भी नहीं किया जाता। समाज की उससे कोई हानि- लाभ नहीं होती। इस काले दानों की माला वाली बात को यदि अवंतिका बाई आत्मशुद्धि की दृष्टि से अपने "गुरु" महात्मा गाँधी से न कहती तो कभी उसकी चर्चा भी सुनने में न आती। पर अब जबकि वह किसी प्रकार प्रकाश में आ गई, तब भी हम अवंतिका बाई की प्रेम- प्रवणता की प्रशंसा ही कर सकते हैं। ऐसी छोटी- छोटी बातों से व्यक्ति के अंतरतम प्रदेश का दर्शन हो जाता है।
योरोप- यात्रा के कारण उन्हें हर प्रकार के वातावरण में रहने का अवसर प्राप्त हुआ था। आंदोलन में भाग लेने के कारण भारतवर्ष के प्रत्येक प्रदेश में भी वे अच्छी तरह घूम चुकी थीं। पर सब प्रकार के लोगों के संसर्ग में आने पर भी वह शाकाहारी ही बनी रही। पर उसके पति योरोप चीन में सात वर्ष रहने के प्रभाव से अंतिम वर्षों में मास खाने लगे थे। अवंतिका बाई ने उनसे कहा कि अगर आप आदेश देंगे तो मैं आपको मांस का भोजन बनाकर भी दे सकती हूँ, चाहे स्वयं कभी उनका व्यवहार न करूँ। पर कुछ समय बाद बबनराव ने स्वयं मांसाहार का त्याग कर दिया और इस संबंध में अवंतिका बाई की परीक्षा का कोई अवसर ही नहीं आया।
पर उसके पति- प्रेम संबंधी ये दो- चार उदाहरण अवंतिका बाई की गंभीर भावुकता का प्रदर्शन करने के साथ ही उन लोगों की आँखे खोलने वाले हैं, जो विदेशी शिक्षा प्राप्त महिलाओं को एक सिरे से पति की परवाह न करने वाली अथवा पतिव्रत से च्युत समझा करते हैं। विदेशों में भी ऐसी बहुसंख्यक महिलायें होती हैं, जो कठिन से कठिन प्रसंग आने पर भी पति का साथ देती हैं और अपने प्राणों का अर्पण कर देती हैं। इटली के प्रसिद्ध देशभक्त सेनानायक गैरीवाल्डी की पत्नी युद्ध क्षेत्र में भी सदा उसका साथ देती रही और उसने इसके लिए इतने संकट सहन किये कि उसका देहावसान अल्प आयु में ही हो गया। इसी प्रकार कहा जाता है कि सन् १९१२ में जब "टाईटैनिक" नामक सुप्रसिद्ध जहाज बर्फ के पहाड़ से टकरा कर समुद्र में डूब रहा था तो पहले स्त्री और बच्चों को "लाइफ बोटों" (प्राण बचाने वाली नावों) में बैठाया गया। एक पति ने अपनी पत्नी को, जो राजी से नाव में नहीं बैठ रही थी, गोद में उठाकर लाइफ बोट में पहुँचा दिया। पर जैसे ही लाइफ बोट चलने को तैयार हुई वह स्त्री उछलकर पुनः जहाज पर आ गई और पति से लिपट कर कहने लगी कि आप और मैं जन्म भर एक साथ रहे, तो अब अंतिम समय में बिछुड़ने की क्या आवश्यकता है? वे चुपचाप अपने कमरे में चले गये और वहीं शांतिपूर्वक उन्होंने सम्मिलित ही जल समाधि ले ली।
अवंतिका बाई भी इसी श्रेणी की प्रेमिका महिला थीं। उनके पति जिस प्रकार से अपाहिज हो गये थे, उस दशा में अनेक स्त्रियाँ उनकी अवज्ञा करने लग जातीं अथवा स्वच्छंदता का कोई मार्ग अपना लेतीं। पर अवंतिका बाई ने इसके विपरीत, जैसे- जैसे दुर्घटना ग्रस्त होकर बबनराव विकलांग होते गये, वह उनसे अधिक प्रेम और सेवा करती गई। ऐसे सच्चे प्रेमी जीव ही निजी परिवार की सीमा से आगे बढ़कर समाज और देश के सच्चे सेवक और स्वार्थत्यागी सहायक बनते हैं।
अनुशासन संबंधी कडा़ई और कर्तव्यपालन-
विदेशों के उदाहरणों को देखकर अवंतिका बाई को अनुशासन का महत्त्व अच्छी तरह समझ में आ गया था और भारतवर्ष की उन्नति के लिए तरह उन्होंने उसका यथाशक्ति प्रयोग भी किया था। 'हिन्द महिला समाज' से संबंधित शिक्षा संस्थाओं तथा अन्य कार्यों में वह सख्ती से ही काम लेती थीं, जिससे अनेक बहिनें असंतुष्ट भी हो जाती थीं, पर अवंतिकाबाई ने अंत तक स्वयं अनुशासन का पालन किया और दूसरों से भी कराया। इसका अंतिम परिणाम किस प्रकार शुभ सिद्ध हुआ, इस संबंध में उनकी एक प्रमुख सहकारी श्रीमती कमलिनी गोखले ने अपने संस्मरणों में लिखा है- "सन् १९३७ के जून मास में मैंने पहली बार "हिंद महिला- समाज" में अंग्रेजी पढा़ने के लिए आना आरंभ किया। इस कारण अवंतिका बाई के साथ मेरा नित्य का संबंध रहने लगा। और मैं उनको अपना गुरु मानने लगी। शुरू में तो मैं आशंकित थी, क्योकिं मैंने सुना था कि उनका अनुशासन बहुत कठोर है। किंतु ज्यों- ज्यों मेरा परिचय बढ़ता गया, मुझे अनुभव हुआ कि अनुशासन के कठोर होते हुये भी वे प्रेम और आत्मीयता का व्यवहार करती हैं।"
"हिंद महिला समाज" के लिए उन्होंने अपनी देह को अंत तक खपाया। जब उनकों कैंसर हो गया, तो महिला- समाज संबंधी उनके कार्यक्रम में बाधा पडी़। पर वे शय्या पर पडे़- पडे़ भी "समाज" के कार्यों का निरीक्षण करती रहती थीं। उनकी हालत ज्यादा खराब हो जाने पर उन्हें तलगाँव के अस्पताल में ले जाने का विचार किया गया, क्योंकि वहाँ सब प्रकार की चिकित्सा संबंधी सुविधायें थीं। परंतु वे जाने को तैयार नहीं हुई "समाज" में रहते हुए भी मृत्यु की इच्छा उन्होंने प्रकट की। वास्तव में उनकी ध्येयनिष्ठा असाधारण थी।
बंबई की एक प्रसिद्ध सार्वजनिक कार्यकर्त्री श्रीमती सोफिया वाडिया ने भी अपना अनुभव बतलाते हुए यही कहा था कि "वे स्वयं उत्साही और निश्चयात्मक वृत्ति की महिला थीं। अतः अपने सहकारियों से काम लेने में कठोर थीं। किंतु उनके न्यायप्रिय और दयालु स्वभाव का परिचय उनके सहयोगियों को सदा ही मिलता रहता था।"
बंबई के मुख्यमंत्री श्री बाला साहब खेर ने कहा कि "कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि उनकी आकृति से ही देखने वाले पर अनुकूल छाप पड़ती है। अवंतिका बाई उन्हीं में से एक थीं। "यह कौन है?" यह जानने की सहज इच्छा होती थी। उनकी वृत्ति शुरू से राष्ट्रीय थी। वह चंपारन गई और तभी से सार्वजनिक कार्यों में प्रमुख रूप से भाग लेने लगीं। श्री बबन राव गोखले ने उनके सकार्यों में सदैव उनकी सहायता की। इन दोनों का मुख्य धंधा देश सेवा ही था।"
समाज और व्यक्ति के उत्थान के लिए इन्हीं गुणों की आवश्यकता होती है। यद्यपि हमारे और योरोपियन समाज के रहन- सहन तथा आचार- विचार में बहुत कुछ अंतर है, तो भी अनुशासन, कर्तव्यपालन और समाज- सेवा आदि ऐसे गुण हैं, जिनका महत्त्व सर्वत्र एक समान है और जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। प्राचीन भारत में भी यह भावना पूर्ण रूप से मौजूद थी, चाहे उसका बाह्य रूप कुछ भिन्न प्रकार का था। उस समय इस देश में कर्तव्यपालन और परोपकार की भावना इतनी प्रबल थी कि अपना प्राण और सर्वस्व त्याग करने से भी लोग पीछे नहीं हटते थे। श्रीमती अवंतिका बाई में प्रचीन और नवीन भावनाओं का इस प्रकार का मिश्रण हुआ था, जिससे उनका व्यक्तित्व बहुत अधिक आकर्षक और कल्याणकारी बन गया था। उन्होंने सब प्रकार के सांसारिक प्रलोभनों और तृष्णाओं को त्यागकर, अपना तन- मन समाज- सेवा और परहित साधना में लगा दिया और इसके लिए अनेक प्रकार के कष्ट सहन किये और हानियाँ उठाईं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अपने स्वास्थ्य और प्राणों की भी परवाह न की।
वास्तव में अवंतिका बाई का जीवन प्रत्येक भारतीय स्त्री- पुरूष के लिए मार्गदर्शक है। जो लोग इन बातों को साधुओं और त्यागियों का ही कर्तव्य समझते हैं, वे अवंतिका बाई के जीवन से शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं कि किस प्रकार अपने गार्हस्थ्य- जीवन की उपेक्षा न करते हुए, समाज- सेवा का इतना अधिक कार्य कर दिखाया। अवंतिका बाई के पति बबनराव तो संयोगवश ऐसी स्थिति को प्राप्त हो गये थे कि वे स्वयं समाज द्वारा सेवा किये जाने के अधिकारी थे। पर अपनी उद्योगशीलता और कर्तव्यपरायणता के आधार पर उन्होंने अपने जीवन को बदल डाला और आजन्म समाज की उपयोगी सेवा करते रहे। जीवन को धन्य और सार्थक बनाने का यही मार्ग है।

